देश का आम बजट एक फरवरी 2026 को पेश होने जा रहा है। इस दिन संडे है, पर बजट उसी दिन पेश होगा, यह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का संकल्प है। लेकिन असली चुनौती रविवार को बजट पेश करना नहीं, इन हालात में बजट पेश करना है। वित्त मंत्री के लिए यह बजट सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने वाला है क्योंकि कई आर्थिक मोर्चों पर चुनौतियां खड़ी हैं। 2026 असल में स्ट्रेस टेस्ट होगा – अगर निर्यात रिकवर नहीं हुआ और जॉब्स नहीं बने, तो ग्रोथ की गुणवत्ता प्रभावित होगी।

बजट कोई टैक्स लगाने का त्यौहार नहीं है, यह कोई फोटो सेशन अपॉर्चुनिटी नहीं है। बजट का अर्थ टैक्स घटाना और बढ़ाना भी नहीं होता, जिससे चीज़ें महँगी या सस्ती होती हैं। बजट का अर्थ है देश की इकोनॉमी पर नियंत्रण ताकि वह बेलगाम नहीं हो । इसके लिए बहुत बड़ा मैकेनिज़्म देश के भीतर ही होता है। बजट का अर्थ है अर्थ व्यवस्था के उस मैकेनिज़्म को समझकर सही दिशा में ले जाना।
इस बार बजट की मुख्य चुनौतियां हैं वैश्विक व्यापार युद्ध और अमेरिकी टैरिफ्स, यूरोपीय संघ का कॉर्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म, कमजोर रोजगार सृजन और असमान विकास, मुद्रास्फीति का रिटर्न और रुपए का दबाव, एमएसएमई की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा की कमी और संरचनात्मक चुनौतियाँ आदि।
ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ्स (जिनमें रूसी तेल आयात के कारण पेनल्टी शामिल है। भारतीय निर्यातकों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जिससे टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, सीफूड और अन्य लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। निर्यात में धीमापन आ गया है और वह दिनोंदिन बढ़ रहा है , खासकरअमेरिकी बाजार में। भारत-अमेरिका में ट्रेड डील की देरी से अनिश्चितता बढ़ी है। इस साल कुल निर्यात सिर्फ मामूली बढ़ोतरी के साथ $850 बिलियन तक ही पहुँच सकता है। यह चुनौती निर्यात-आधारित मैन्युफैक्चरिंग को धीमा कर रही है।

और फिर ऊपर से यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म भी है जो चुनौती दे रहा है। 1 जनवरी 2026 से यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर टैक्स पूरी तरह लागू हो गया है, जो स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट, फर्टिलाइजर आदि पर लागू होता है। इस कारण भारतीय निर्यातकों को 15 से 22% तक कीमतें घटानी पड़ सकती हैं ताकि EU बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहें। पहले ही स्टील निर्यात में 24% की गिरावट देखी गई है। यह ग्रीन ट्रेड बैरियर जैसा काम कर रहा है, क्योंकि भारत की कोयला-आधारित उत्पादन प्रक्रिया ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाली है। इससे छोटे-मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
नीति आयोग वाले ऊँची जीडीपी की कितनी भी बातें कर लें, सच्चाई यही है कि कमजोर रोजगार सृजन और असमान विकास और रोजगार की समस्या गंभीर है। युवा बेरोजगारी, महिलाओं की वर्कफोर्स पार्टिसिपेशन रेट करीब 18-20% पर ही अटका हुआ है। ग्रोथ मुख्य रूप से सर्विसेज और कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर्स से आ रही है, जबकि लेबर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग पीछे है। असमानता बढ़ रही है – अमीर और गरीब के बीच की खाई, ग्रामीण-शहरी असंतुलन। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि जॉब्स भारत की सबसे बड़ी संरचनात्मक चुनौती है। हमारी 90%+ वर्कफोर्स इंफॉर्मल में है। कम सिक्योरिटी, कम वेतन, कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं।
2025 में इन्फ्लेशन बहुत कम 2% के आसपास, कभी-कभी 1.7% तक ही रहा, लेकिन 2026-27 में यह 4% के आसपास वापस आने का अनुमान है। फूड प्राइसेज में बेस इफेक्ट से बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। रुपया पहले ही कमजोर है , डॉलर के मुकाबले दबाव में है और रुपया लगातार रिस्क ज़ोन में है। विदेशी संस्थागत निवेशक यानी एफआईआई के आउटफ्लो (शेयर बाजार से रिकॉर्ड निकासी) से कैपिटल आउटफ्लो का खतरा भी मंडरा रहा है। रिज़र्व बैंक ने ने रेपो रेट घटाकर 5.25% कर दिया है, और 2026 में और कट्स संभव हैं, लेकिन ज्यादा कट्स से रुपया और कमजोर हो सकता है।

हमारे एमएसएमई सेक्टर की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा कम है। ये भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उत्पादकता गैप बहुत बड़ा है। यहाँ क्रेडिट एक्सेस, टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन और ग्लोबल वैल्यू चेन में इंटीग्रेशन की कमी। वैश्विक प्रतिस्पर्धा (खासकर सस्ते चाइनीज सामान से) बढ़ रही है।
तकनीकी क्षेत्र में भी भारत बहुत तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। भारत में एआई की विकास गति कमजोर दिख रही है। पब्लिक हेल्थ क्राइसिस तो है ही। देश के सबसे स्वच्छ शहर में लोग गटर का पानी पेय जल की लाइन में मिल जाने के कारण मर रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली की वायु में ज़हर है। एयर पॉल्यूशन से स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। ऐसे में प्रोडक्टिविटी बढ़ने की बात बेमानी हैं। अर्थ व्यवस्था पर फिस्कल प्रेशर तो है ही। सरकार का कैपिटल एक्सपेंडिचर जारी रखना, लेकिन टैक्स कलेक्शन और डेब्ट मैनेजमेंट का बैलेंस बिगड़ गया है। साइबर सिक्योरिटी कमजोर है और डिजिटल फ्रॉड के कारण अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है।
पिछले बजट में इनकम टैक्स में राहत मिली, लेकिन अब मिडिल क्लास फिर उम्मीद में है। बेसिक एक्जेम्प्शन लिमिट बढ़े? 80C लिमिट? कैपिटल गेंस टैक्स रेशनलाइजेशन हो? ग्रोथ ब्रॉड-बेस्ड बनाने के लिए एमएसएमई , जॉब्स, स्किलिंग पर फोकस जरूरी है। युवा बेरोजगारी, महिलाओं की वर्कफोर्स पार्टिसिपेशन (18% पर अटकी), और एआई तथ टेक जॉब्स में भारत का पिछड़ना – ये सब चुनौतियां हैं। बजट में एआई इंसेंटिव, ग्लोबल टेक जायंट्स को आकर्षित करने की बात हो सकती है। लेकिन अगर कंजम्पशन नहीं बढ़ा, तो प्राइवेट इन्वेस्टमेंट रुक सकता है।
किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य भी अभी अधूरा ही है। राइस एक्सपोर्टर्स, एग्री लोन बढ़ोतरी की मांग उठ रही है। इकोलॉजिकल स्ट्रेस, मार्केट वोलेटिलिटी, ग्रीन लेंडिंग, ईवी , रिन्यूएबल एनर्जी पर फोकस हो सकता है। हेल्थकेयर इंफ्रा को ठीक करना भी चुनौती है। कुल मिलाकर, वित्त मंत्री को ‘जादूगरी’ दिखानी होगी। यह बजट संतुलन का जादू होगा – ग्रोथ, फिस्कल डिसिप्लिन, और लोगों की उम्मीदों का। रविवार 1 फरवरी को जब वो डायरी या टैबलेट खोलेंगी, तो पूरा देश देखेगा कि क्या भारत ‘फास्टेस्ट ग्रोइंग मेजर इकोनॉमी’ बनेगा?










