तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के तीन बाद भी वहां नई सरकार की कोई सूरत नहीं बन पाई है। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उनसे मिलने आए सबसे बड़े दल टीवीके के नेता विजय से कहा है कि वे बहुमत के लिए जरूरी विधायकों के समर्थन के साथ आएं। यह स्थिति इसलिए बन गई है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को 234 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी सीटें नहीं मिली हैं। विजय की तमिलगा वेट्री कषगम यानी टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन वह बहुमत से दस सीटें पीछे है। हालांकि पांच सीटों वाली कांग्रेस ने द्रमुक के साथ अपना दो दशक पुराना गठबंधन तोड़कर विजय को समर्थन देने का ऐलान किया है।
बेशक विजय की पार्टी टीवीके बहुमत से दूर है, लेकिन ध्यान रहे कि वहां दूसरे और तीसरे नंबर पर आई द्रमुक तथा अन्नाद्रमुक उससे काफी पीछे हैं। तमिलनाडु में दलीय स्थिति पर गौर किया जा सकता हैः टीवीके-108, द्रमुक 59, अन्नाद्रमुक 47, कांग्रेस 5, पीएमके 4, आईयूएमएल 2, सीपीआई 2, वीसीके 2, सीपीएम 2, डीएमडीके 1, एएमएमके 1 और भाजपा 1।
जाहिर है, जनादेश एम के स्टालिन की अगुआई वाली द्रमुक सरकार के खिलाफ और विजय की टीवीके के पक्ष में है। तकनीकी कारण भले ही टीवीके के साथ न हों, लेकिन संवैधानिक कायदे और सुप्रीम कोर्ट के अतीत के कई फैसलों को देखें तो राज्यपाल को सबसे बड़ा दल होने के नाते विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए और एक निश्चिय समय में सदन में बहुमत साबित करने के निर्देश देने चाहिए।
इस सिलसिले में खासतौर से 1994 के बहुचर्चित एस आर बोम्मई मामले का जिक्र किया जा सकता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि बहुमत का फैसला सदन के भीतर ही हो सकता है।
तमिलनाडु के घटनाक्रम में संविधान के अनुच्छेद 162 (2) का भी जिक्र किया जा सकता है और जैसा कि अनेक विशेषज्ञों ने तर्क भी दिया है, इस अनुच्छेद के मुताबिक मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी। इसका अर्थ है कि सरकार तब तक बनी रह सकती है, जब तक सदन उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित न करे।
इसका मतलब भी यही है कि बहुमत का फैसला सदन के भीतर ही हो सकता है। ऐसा लगता है कि राज्यपाल अल्पमत सरकारों की अवधारणा को ही नकार रहे हैं, जबकि देश में अल्पमत सरकारों का लंबा इतिहास है, जिनमें पी वी नरसिंह राव से लेकर देवगौड़ा तक की सरकारें शामिल रही हैं।
बेशक अतीत में ऐसे उदाहरण भी हैं, जिनमें राज्यपालों ने आनन फानन में सरकारें बनवा दीं, लेकिन बहुमत साबित नहीं करने की वजह से ये सरकारें जल्द ही गिर गईं। इस सिलसिले में महाराष्ट्र के 2019 के चुनाव के बाद के घटनाक्रम को देखा जा सकता है, जब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने रातोंरात देवेंद्र फड़नवीस की सरकार बनवा दी थी, लेकिन वह बहुमत साबित नहीं कर सके। लेकिन क्या यह बताने की जरूरत है कि यह खेल ही अलग था। क्या यह किसी से छिपा है कि केंद्र की भाजपा सरकार की इसमें कैसी भूमिका थी, जो किसी भी कीमत पर वहां भाजपा की सरकार चाहती थी।
केंद्र की मोदी सरकार ने राजभवन का नाम लोकभवन कर दिया है, लेकिन तमिलनाडु को देखकर लगता है कि नाम भले बदल दिया गया है, फैसले तो राजभवन वाली मानसिकता से ही लिए जा रहे हैं। वहां नई सरकार के गठन में जितनी देरी होगी, वहां उतनी ही जोड़तोड़ शुरू हो जाएगी। जनादेश का तकाजा तो यही है कि राज्यपाल विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें और बहुमत साबित करने का मौका दें। इस समय सबसे बड़ी संवैधानिक चिंता यह भी है कि क्या राज्यपाल राष्ट्रपति शासन जैसी सिफारिश के विकल्प पर तो विचार नहीं कर रहे हैं; और यदि ऐसा होगा, तो इसे तमिलनाडु की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का अनादर ही कहा जाएगा।











