आखिरकार कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को हटाकर उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार को राज्य की कमान सौंपने का फैसला कर लिया है। इस फैसले तक आते आते कांग्रेस आलाकमान को लंबा वक्त लगा है, क्योंकि लंबे समय से सिद्धरमैया और डी के शिवकुमार के बीच की प्रतिद्वद्विता चर्चा में रही थी।
ऐसा लगता है कि शायद कांग्रेस आलाकमान दक्षिण के इस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी सरकार को बचाए रखने के लिए कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था, इसलिए उसने लंबे समय तक यथास्थिति को बनाए रखा था।
दो साल बाद कर्नाटक में विधानसभा के चुनाव हैं, और ऐसे में अपेक्षाकृत युवा डी के शिवकुमार को सत्ता सौंप कर पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह अगला चुनाव नए नेतृत्व में लड़ना चाहती है।
यह बताने की जरूरत नहीं है कि डी के शिवकुमार रणनीतिक रूप से पार्टी के लिए कई बार उपयोगी साबित हुए हैं और जब जब दूसरे राज्यों में पार्टी में संकट आया है, वहां के विधायकों की उन्होंने कर्नाटक में मेजबानी की है। जाहिर है, राजनीतिक प्रबंधन में वह माहिर हैं। दूसरी ओर समाजवादी पृष्ठभूमि के सिद्धरमैया राजनीति के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं और उन्होंने विभिन्न पंथीय और जाति समूहों में संतुलन साधते हुए दो बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली है।
दरअसल कर्नाटक में जो कुछ हुआ है, वह कांग्रेस आलाकमान के इकबाल का भी मामला है। इस फैसले से उसने यह दिखाने की कोशिश की है, कि वह साहसिक फैसले लेने से गुरेज नहीं कर रहा है।
यह इसलिए भी अहम है, क्योंकि 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव जीतने के कुछ महीनों बाद ही इन राज्यों में भी तत्कालीन मुख्यमंत्रियों, कमलनाथ, अशोक गहलोत और भूपेश बघेल को स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों क्रमशः ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और टीएस बाबा से चुनौती मिली थी।
कमलनाथ और सिंधिया की खींचतान में मध्य प्रदेश की सत्ता चली ही गई। राजस्थान में पायलट के टूटने की खबरें थीं, लेकिन अंततः वह कायम रहे और छत्तीसगढ़ में टीएस बाबा को उपमुख्यमंत्री बना दिया गया। हालांकि यह भी साफ है कि टीएस बाबा ने भले ही असंतोष जताया, लेकिन पार्टी के प्रति अपनी वफादारी पर आंच नहीं आने दी।
यह सवाल अब मायने नहीं रखता कि क्या राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस आलाकमान ने 2023 के विधानसभा चुनाव से डेढ़ दौ साल पहले कर्नाटक जैसा प्रयोग किया होता तो क्या उसके नतीजे अलग होते? दरअसल इसी से जुड़ा सवाल कांग्रेस आलाकमान के इकबाल का भी है। क्या उसने तदर्थवाद से छुटकारा पा लिया है?
बहरहाल, कर्नाटक को डी के शिवकुमार के रूप में नया मुख्यमंत्री मिल रहा है और ऐसे में सबसे पहले यह देखना होगा कि क्या वह निवृतमान मुख्यमंत्री सिद्धरमैया द्वारा कराई गई जाति जनगणना की रिपोर्ट को सार्वजनिक करेंगे?
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