मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से पिछले 12 साल में भारत में पूंजी के कुछ खास उद्योगपतियों तक सिमट जाने के आरोप लगते रहे हैं और यदि फोर्ब्स की ताजा रिपोर्ट को देखें तो यह संदेह और बढ़ता है।
यह रिपोर्ट बता रही है कि वैश्विक स्तर पर मान्य अरबपति की परिभाषा के मुताबिक न केवल देश में अरबपतियों की संख्या पिछले साल के 205 से बढ़कर 229 हो गई है, बल्कि उनकी कुल संपत्ति ने एक ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर लिया है। अचरज नहीं कि यह रिपोर्ट पिछले हफ्ते तब आई जब प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से उपजे विकट हालात में देश वासियों से पेट्रोल-डीजल और खाने के तेल में कटौती सहित कई तरह की किफायत बरतने की अपील की है। उन्होंने जो नहीं कहा वह फोर्ब्स की रिपोर्ट में पढ़ा जा सकता है, जिसके मुताबिक मुकेश अंबानी देश के सबसे अमीर उद्योगपति हैं और उनके बाद गौतम अडानी है।
दरअसस मोदी पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी जब यह आरोप लगाते हैं कि वे अपने उद्योगपति मित्रों का खयाल रखते हैं, तो ऐसी रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती ही दिखती है। ऐसे समय जब ईरान पर इस्राइल और अमेरिका के हमले ने सारी दुनिया को गंभीर संकट में डाल दिया है, जब आम आदमी के लिए संकट बढ़ता जा रहा है, देश के चुनींदा अरबपतियों की संपत्ति में खासा इजाफा कल्याणाकारी माने जाने वाले भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में किसी विद्रूप से कम नहीं है। हैरत नहीं, कोरोना महामारी और मनमाने ढंग से देशभर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान भी देश के अरबपतियों की संपत्ति बढ़ गई थी, जबकि उस दौरान करोड़ों प्रवासी मजदूरों के सामने जीवन मरण का सवाल खड़ा हो गया था।
बेशक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद निजी क्षेत्र ने देश की आर्थिक तरक्की में नया आयाम जोड़ा है, लेकिन पिछले कुछ बरसों के दौरान जिस तरह से कुछ चुनींदा अरबपतियों के पास देश की कुल संपत्ति का अधिकांश हिस्सा सिमटता जा रहा है, वह चिंता का कारण होना ही चाहिए।
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