बकरीद पर बंगाल सरकार का फरमानः उन्माद का अर्थशास्त्र

Bengal government

पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार के बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी से संबंधित फरमान ने राज्य में एक नया संकट पैदा कर दिया है। वैसे तो शुभेंदु अधिकारी की अगुआई वाली भाजपा सरकार ने पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 के प्रावधानों पर ही अमल किया है, लेकिन इससे सबसे ज्यादा मुश्किल में राज्य के हिंदू मवेशी व्यापारी पड़ गए हैं, क्योंकि मौलवियों ने मुस्लिम समुदाय से अपील की है कि वे हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए गाय की कुर्बानी न दें!

हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में बनी भाजपा सरकार के लिए वास्तव में यह जमीनी स्तर पर पहला वैचारिक परीक्षण है। पूरे चुनाव के दौरान भाजपा के शीर्ष नेताओं ने मुस्लिमों को निशाना बनाया था। घुसपैठियों और बांग्लादेशियों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से लेकर शुभेंदू अधिकारी तक के निशाने पर मुस्लिम समुदाय और उनका खानपान तक था।

दिलचस्प यह है कि जिस कानून पर शुभेंदू सरकार ने अमल किया है, वह दशकों पुराना है। इसके प्रावधानों के तहत सरकार ने पशुओं की खरीद और पशुओं की कुर्बानी को लेकर सख्त पाबंदियां लगा दी हैं। इसके मुताबिक 14 साल से अधिक उम्र के ही जानवरों की बिक्री हो सकती है, वह भी स्वास्थ्य विभाग से स्वास्थ्य प्रमाण पत्र मिलने के बाद।

राज्य सरकार के इस फरमान के बाद कोलकाता के नाखौदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी सहित अनेक मौलवियों ने मुस्लिमों से अपील की है कि वे हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए कुर्बानी के लिए गाय न खरीदें। कासमी ने सरकार से गोवध पर पूरी तरह से रोक लगाने तक की अपील कर दी है। उनकी इस अपील का असर यह हुआ है कि मुस्लिम कुर्बानी के लिए गाय नहीं खरीद रहे हैं और इसका खामियाजा बड़े पैमाने पर हिंदुओं व्यापारियों को हो रहा है। राज्य के विभिन्न इलाकों से आ रही खबरों से पता चल रहा है कि कैसे बकरीद के समय सजने वाले कुर्बानी के पशुओं के बाजार में गायों और बछड़ों की बिक्री ठप हो गई है, जबकि वहां ऐसे मौकों पर रोजाना दो हजार जानवरों की बिक्री आम थी।

दरअसल जिस कानून के तहत यह कदम उठाया गया है, उसे लेकर अतीत की सरकारों ने, चाहे वह पिछली ममता बनर्जी की सरकार रही हो या वाम मोर्चे की या फिर उससे पहले की कांग्रेस सरकार, उन्होंने इतनी कड़ाई नहीं बरती थीं। इसका अंदाजा तो ममता सरकार में मंत्री रहे शुभेंदु अधिकारी को भी होगा।

इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि समय के साथ खेती पर पशुओं की निर्भरता कम होती गई है, लिहाजा पशुओं को बूचड़खाने में भेजे जाने के लिए बेच दिया जाता है। कोलकाता हाईकोर्ट में इस कानून के प्रावधानों में छूट की मांग को लेकर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान भी यही तर्क दिया गया है कि 1950 का कानून जब बनाया गया था, तब खेती घरेलू पशुओं पर निर्भर थी। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को राहत दे दी है कि वह बकरीद से पहले कोई फैसला कर ले।

वजह जो भी हो, मुस्लिम समाज के भीतर गोवध के खिलाफ उठी आवाजों ने भाजपा के वैचारिक पाखंड को उजागर कर दिया है।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से पिछले 12 सालों में गोवध पर रोक के नाम पर एक तरह का उन्माद पैदा कर दिया गया है। ऐसी कितनी घटनाएं हैं, जब गोवध के नाम पर मुस्लिमों को निशाना बनाया गया है। वहीं दूसरी तरफ हकीकत यह है कि मांस के व्यापार से हिंदू भी अच्छा खासा जुड़े हुए हैं।

सरकार का आंकड़ा दिखाता है कि बीते पांच साल में भारत से मीट का एक्सपोर्ट 3.22 अरब डॉलर से बढ़कर 4.16 अरब डॉलर हो गया है। यही नहीं, भारत के अग्रणी मीट के एक्सपोर्टर अल्लाना ग्रुप ने भाजपा को 30 करोड़ रुपये का चंदा दिया था !

वास्तव में गोवध का मुद्दा कोई आज का मुद्दा नहीं है। अनेक भाजपा शासित राज्यों में यह लागू है, लेकिन उन राज्यों में जहां बीफ यानी गोमांस खानपान की परंपरा का हिस्सा है, वहां उस पर रोक नहीं है।

असल में पहली बार भाजपा दुविधा में है। लाख टके का सवाल है कि क्या वह अपने वृहत संघ परिवार के स्वयंभू निगरानीतंत्र को मनमानी करने से रोक पाएगी, जाने-अनजाने में जिसके निशाने पर हिंदुओं की रोजी-रोटी भी आ गई है।

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