रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में बीते 27 महीनों में 607 लोग मारे गए, 487 गिरफ्तार हुए और 1,496 ने आत्मसमर्पण किया — लेकिन इनमें से किसी एक गिरफ्तारी का भी न तो स्थान दर्ज है, न परिस्थिति, न एफआईआर नंबर। यह दावा पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) ने अपनी एक रिपोर्ट में किया है। यह रिपोर्ट कुछ दिनों पहले जारी की गई थी जो जनवरी 2024 से मार्च 2026 तक चले ऑपरेशन कगार का लेखा-जोखा पेश करती है।
‘कगार’ यानी किसी चीज़ को उसकी अंतिम सीमा तक पहुंचा देना। PUDR का कहना है कि यही इस अभियान का मकसद रहा — ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से नक्सलवाद का पूर्ण सफाया। रिपोर्ट का दायरा बस्तर के सात जिलों तक सीमित है, जहां केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर सबसे बड़ा सुरक्षा अभियान चलाया।
607 मौतें, हिसाब किसी के पास नहीं
रिपोर्ट दावा करती है कि इस अवधि में 607 मौतें हुईं और इनमें 516 कथित माओवादी, 36 सुरक्षा जवान और 55 आम नागरिक शामिल हैं।रिपोर्ट 516 मारे गए लोगों को सीधे माओवादी ना लिखते हुए कथित माओवादी लिखती है लेकिन इसमें कहीं भी फर्जी एनकाउंटर के आरोप नहीं लगाए गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन आंकड़ों का स्रोत लगभग पूरी तरह पुलिस और सरकार के बयान हैं — PUDR का कहना है कि घटनास्थल पर वास्तव में क्या हुआ, इसका कोई स्वतंत्र विवरण मौजूद नहीं।
लेकिन PUDR की रिपोर्ट यह जरूर कहती है कि सबसे बड़ा सवाल पहचान का है: जिन्हें माओवादी बताकर मारा गया, उनकी पहचान किस आधार पर हुई, यह रिपोर्ट में कहीं दर्ज नहीं। जहां हथियार बरामद होने का दावा है, वहां यह रिपोर्ट गहन जांच की मांग करती है।
PUDR के अनुसार हिरासत में मौत का सिर्फ एक मामला सामने आया। जांच के आदेश हुए, पर नतीजा आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ।
गिरफ्तारी का कोई रिकॉर्ड नहीं, सुप्रीम कोर्ट के नियमों की अनदेखी
487 गिरफ्तारियों में से किसी की भी जगह, परिस्थिति या एफआईआर संख्या दर्ज नहीं — यानी आम इंसान के लिए यह पता लगाना लगभग असंभव है कि किसे, कब, कहां और किस आधार पर उठाया गया।
यह चुप्पी सुप्रीम कोर्ट के 2014 के पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र फैसले की सीधी अनदेखी है, जिसमें अदालत ने मुठभेड़ मौतों की स्वतंत्र जांच अनिवार्य की थी — खुफिया सूचना का रिकॉर्ड, सीआईडी या दूसरे थाने से जांच, मजिस्ट्रियल रिपोर्ट, परिजनों को सूचना, मुआवजा, और वीरता सिद्ध होने पर ही पदोन्नति।
PUDR का कहना है कि बस्तर में यह जांचने का कोई ज़रिया ही नहीं कि इन शर्तों का पालन हुआ या नहीं।
इसका सीधा असर आम आदिवासी पर पड़ता है। यूएपीए की व्यापक धाराएं — जो आतंकी संगठनों से ‘संबंध’ या ‘समर्थन’ को अपराध मानती हैं — कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और यहां तक कि आरोपियों के वकीलों तक को अपनी चपेट में ले सकती हैं।
‘माओवादी साहित्य’ रखने भर को भी सबूत बना दिया जाता है, जबकि ऐसा कोई कानून नहीं जो इसे रखना प्रतिबंधित करता हो।
नतीजा गढ़चिरौली के आंकड़ों में दिखता है — क्विल फाउंडेशन की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक 141 में से 140 मामलों में आरोपी बरी हुए। वजह–एफआईआर अक्सर ‘अज्ञात नक्सलियों’ के खिलाफ दर्ज होती है, और जहां नाम हों, वहां गांव में उसी नाम के कई लोग मिल जाते हैं।
PUDR की इस रिपोर्ट के मुताबिक आत्मसमर्पण करने वालों का हाल भी बेहतर नहीं। पुनर्वास सहायता ‘टाली गई और दूर की’ बताई गई है, साथ में ‘अच्छे आचरण’ के प्रमाणपत्र की शर्त भी रखी गई। मीडिया रिपोर्टों के हवाले से बताया गया कि इन केंद्रों को ‘नजरबंदी केंद्र’ तक कहा गया है — परिवारों को मिलने की इजाज़त नहीं, महीनों रोका जाता है, सफाई-निर्माण के काम कराए जाते हैं, पर आगे की ज़िंदगी के लिए कोई हुनर नहीं सिखाया जाता।
बंदूक थमी तो खनन तेज हुआ
PUDR का कहना है कि माओवाद के ‘खात्मे’ के दावे के साथ ही बस्तर में एक नई लड़ाई शुरू हो गई है — जमीन और जंगल पर कब्जे की।
छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नीति 2024-30 में फार्मा, वस्त्र, आईटी, रक्षा को प्राथमिकता की बात है, लेकिन सरकारी योजनाओं में 98 प्रतिशत निवेश खनन और उससे जुड़े क्षेत्रों में जा रहा है, जिसमें एनएमडीसी की प्रमुख भूमिका है।
बैलाडीला की पहाड़ियां, जो कभी निजी कंपनियों की पहुंच से बाहर थीं, अब खनन पट्टों के ज़रिए खोल दी गई हैं। दशकों से लौह अयस्क का काला अपशिष्ट इंद्रावती नदी की सहायक धाराओं में बहता रहा है — अब यह खतरा आदिवासियों की खेती और पीने के पानी तक पहुंच रहा है।
यह भी कहा गया कि 2025 के खान एवं खनिज संशोधन कानून ने खनन पट्टों की अधिकतम सीमा हटा दी और अवधि 20-30 साल से बढ़ाकर उसमें 20 साल और जोड़ दिए। स्थानीय समुदाय को कंपनी में 26 प्रतिशत हिस्सेदारी देने का पुराना प्रस्ताव बदलकर अब सिर्फ 33 प्रतिशत रॉयल्टी सीधे जिला खनिज कोष को दी जाती है — यानी असली हकदार आदिवासी समुदाय को फैसले की मेज से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है
2023 में वन संरक्षण अधिनियम में हुए बदलाव ने 1996 के गोदावर्मन फैसले की ‘वन’ की व्यापक परिभाषा को भी सीमित कर दिया — अब सिर्फ आधिकारिक रूप से अधिसूचित वन ही इस दायरे में आते हैं।
‘जीत’ के बावजूद छावनियां बढ़ती जा रही हैं
PUDR का कहना है कि नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे के दावे के उलट, सुरक्षा ढांचा सिकुड़ने की बजाय फैल रहा है।
बीजापुर में 700 हेक्टेयर वन भूमि पर सीआरपीएफ का बटालियन-स्तरीय ट्रेनिंग सेंटर बन रहा है। नारायणपुर के अबूझमाड़ में करीब 53,000 हेक्टेयर जंगल सेना को दिए जाने की तैयारी है — जिससे करीब 9,000 ग्रामीणों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है।
रिपोर्ट का इशारा साफ है — सैन्य जीत के इस दावे के पीछे ‘जल, जंगल, ज़मीन’ के वही पुराने सवाल दबे पड़े हैं, जिन्होंने कभी इस संघर्ष को जन्म दिया था। और संविधान के अनुच्छेद 243 व पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासी समुदायों को असली स्वशासन देने की परियोजना आज भी अधूरी है।











