लोकतंत्र का ‘एनकाउंटर’ कर रहे हैं वर्दीवालों को ‘हत्यारा’ बनाते राजनेता!

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‘मैं जिम्मेदारी के सभी अर्थों के साथ कहता हूं, पूरे देश में एक भी कानून-विहीन समूह नहीं है जिसका अपराध का रिकॉर्ड अपराधियों के संगठित गिरोह भारतीय पुलिस बल की तुलना में कहीं ठहरता हो’ – जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला

1961 में एक मुकदमे के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला की इस टिप्पणी ने सामाजिक-राजनीतिक हलकों में खासा तूफान पैदा किया था। एक पुलिसवाले ने एफआईआर के समय और रिकॉर्ड में हेरफेर किया था जिस पर जस्टिस मुल्ला का ये ग़ुस्सा फूटा था। उन्होंने यूपी पुलिस को ‘Augean stable’ यानी ‘गंदगी से भरा अस्तबल’ तक कह दिया था। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार इन टिप्पणियों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची जिसने माना कि इतनी ‘व्यापक टिप्पणी’ के लिए पर्याप्त रिकॉर्ड मौजूद नहीं था और उसने इन टिप्पणियों को फैसले से हटवा दिया।

बहरहाल, जस्टिस मुल्ला की इस टिप्पणी की गूंज दूर तक गयी। जब भी पुलिस के अत्याचार का मसला उठा, यह टिप्पणी भी चर्चा में आती रही। लेकिन इस ‘हिंदुत्ववादी समय’ में ऐसी सरकारें सामने हैं जो वर्दीवालों को ‘गुंडा’ कहे जाने से आहत नहीं हैं, उल्टा उन्हें ‘हत्यारा’ बन जाने को प्रेरित कर रही हैं। हैरानी की बात ये है कि अब किसी न्यायाधीश में उस बेचैनी का शतांश भी नहीं दिखता जो जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला की टिप्पणियों में झलका था।

पिछले दिनों बिहार के नये मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि ‘पुलिस को जाति पूछकर गोली चलानी चाहिए!’ यह कोई निर्देश नहीं था, बल्कि विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव के इस आरोप पर व्यंग्य था कि बिहार पुलिस ‘जाति देखकर एन्काउंटर’ कर रही है। लेकिन इस वार-पलटवार के बीच यह मसला कहीं खो गया कि पुलिस अपराध पर नियंत्रण के नाम पर अदालत से सज़ा दिलवाने की जगह अपराधियों को गोली मार रही है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में पुलिस मुठभेड़ की तादाद एकाएक बढ़ गयी है।

‘एनकाउंटर’ यानी मुठभेड़ का अर्थ है कि अपराधियों को पकड़ने के क्रम में जब पुलिस पर हमला हो तो वह आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई करे, जिसमें किसी की जान भी जा सकती है। लेकिन सरकार ही नहीं, जनता के बीच भी एनकाउंटर का एक ही मतलब है- सरकार जिसे अपराधी माने उसे पकड़कर गोली मार दो। यह अदालती कार्रवाई पर जनता ही नहीं सरकार के भी अविश्वास का सबूत है।

वैसे आजकल एनकाउंटर ही नहीं, ‘हॉफ़ एनकाउंटर’ भी चलन है जिसकी सबसे बड़ी प्रयोगभूमि उत्तर प्रदेश है। मुख्यमंत्री बनते ही योगी आदित्यनाथ ने ‘ठोंक दो’ की नीति का ऐलान किया था। यूपी में योगी शासन (मार्च 2017 से अप्रैल 2026) के बीच कुल 17,043 एन्काउंटर हुए जिसमें 289 कथित अपराधी मारे गए, इसके अलावा 11 हजार से ज्यादा घायल हुए। इन मुठभेड़ों में 18 पुलिसकर्मियों की भी जान गयी।

जनवरी 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की ‘हाफ एन्काउंटर’ (टांग में गोली मारकर घायल करने) की प्रथा पर सवाल उठाये। कोर्ट ने कहा कि ‘यह रूटीन हो गया है, अधिकारी सोशल मीडिया फेम या प्रमोशन के लिए ऐसा कर रहे हैं। पुलिस को ‘सजा देने’ का अधिकार नहीं है — वह सिर्फ अदालत का काम है।’ कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स का सख़्ती से पालन करने का निर्देश दिया और पुलिस प्रमुख को चेतावनी दी कि उल्लंघन पर अदालत की मानहानि की कार्रवाई हो सकती है।

यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है। संविधान कहता है कि अपराध तय करने का अधिकार अदालत का है। पुलिस का काम जाँच करना है, फैसला सुनाना नहीं। लेकिन जब सत्ता खुद पुलिस को संदेश देने लगे कि ‘ठोंक दो’, तब कानून की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ने लगती है। पुलिस यह मानने लगती है कि राजनीतिक संरक्षण उसे किसी भी कार्रवाई की छूट देता है। यूपी के मुख्यमंत्री दावा करते हैं कि कानून-व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधार हुआ है, लेकिन एनकाउंटर की पुलिसिया कहानियों पर यक़ीन किया जाये तो यूपी में अपराधी आये दिन पुलिस पर हमला करते हैं जिसके जवाब में पुलिस को ‘मजबूरन’ गोली चलानी पड़ती है। यह तो अपराधियों का हौसला बढ़ने का सबूत है, न कि पस्त होने का।

ऐसा नहीं है कि हत्या करने वाले वर्दीधारियों पर इसका असर नहीं पड़ता। पिछले दिनों 22 साल बाद फ़र्ज़ी मुठभेड़ के एक मामले पुलिस वालों को हुई सज़ा का हवाला देते हुए यूपी के पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि ‘जो सरकारें और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, अपने अधीनस्थों पर नाजायज दबाव डालकर फर्जी मुठभेड़ करवाते हैं, वे फंसने पर कोई मदद नहीं करते। जब मुकदमा सजा के लेवल पर आता है तब तक ये पुलिस अधिकारी बूढ़े और रिटायर हो चुके होते हैं। कोई आगे पीछे नहीं होता। उन्हें उनी क़िस्मत के भरोसे छोड़ दिया जाता है। पुलिस अधिकारी अभी भी नहीं चेते तो बाल-बच्चे तक रोयेंगे। नैतिकता का तकाजा है कि पुलिस स्वयं अपराधी न बने।’

यानी ‘एन्काउंटर संस्कृति’ सिर्फ नागरिकों के लिए नहीं बल्कि खुद पुलिसकर्मियों के लिए भी खतरनाक है। सत्ता अपने राजनीतिक फायदे के लिए पुलिस को इस्तेमाल करती है। तत्कालीन माहौल में पुलिसवालों को वीरता का प्रतीक बनाया जाता है, लेकिन जब अदालतें हस्तक्षेप करती हैं तो वही पुलिसकर्मी अकेले अपराधी घोषित कर दिये जाते हैं।

दरअसल, एनन्काउंटर की राजनीति जनता की भावनाओं से खेलती है। अपराध और असुरक्षा से परेशान समाज त्वरित न्याय चाहता है। सरकारें इसी मनोविज्ञान का फायदा उठाती हैं। अदालतों की लंबी प्रक्रिया, कमजोर जांच और धीमी न्याय व्यवस्था के कारण लोग पुलिसिया हिंसा का समर्थन करने लगते हैं।

1993 में हिंदी में जासूसी नावेल लिखने वाले वेदप्रकाश शर्मा का एक उपन्यास काफ़ी लोकप्रिय हुआ था जिसका शीर्षक था- ‘वर्दीवाला गुंडा।’ कहते हैं कि इस उपन्यास की एक करोड़ प्रतियाँ बिकी थीं जो एक रिकॉर्ड है। समय-समय पर ऐसी तमाम फ़िल्में भी बनती रहीं जिसमें दबंग पुलिस वाले अपराधियों का मौके पर हिसाब कर देते हैं। ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ नाम की एक नयी प्रजाति सामने आ गयी। ये अदालतों के बेमानी हो जाने की मुनादी थी।

अफसोस कि हम ऐसे तमाम मुख्यमंत्रियों को देख रहे है जो ख़ुद एनकाउंटर स्पेशलिस्ट जैसे डॉयलॉग बोलकर ताली बजवाने लगे हैं। वे भूल गये कि उनकी इस अदा ने लोकतंत्र की राह में कितना बड़ा रोड़ा खड़ा कर दिया है। वर्दी वालों को ‘गुंडों से हत्यारा’ बनाने की इस मुहिम में एक आधुनिक समाज को कबायली बना देने का अभियान नजर आ रहा है जिसके लिए इतिहास में तालियाँ नहीं गालियाँ ही नसीब होंगी।

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