– S. Vikram
Political commentator
एक आंदोलन की संरचना
पिछले कुछ महीनों में भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कुछ ऐसा घटित हुआ है, जो अभूतपूर्व है। बड़े पैमाने पर छात्र असंतोष उभरा है और किसानों तथा आदिवासियों के अलग-अलग विरोध-प्रदर्शन देश के लगभग पूरे भूगोल में फैले हुए हैं। जो कुछ स्थानीय शिकायतों से शुरू हुआ था, वह अब उस आबादी की ओर से उठती राष्ट्रव्यापी पीड़ा की पुकार में बदल गया है, जिसे देश का भविष्य संभालना है।
इस उभार के केंद्र में लाखों युवा भारतीय हैं—छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी और रोजगार की तलाश कर रहे युवा। उन्होंने अपने संकट की एक ऐसी तस्वीर को पहचाना है, जिसे उनके पूर्ववर्ती पूरी तरह शब्द नहीं दे पाए थे। यह तस्वीर दलगत राजनीति के धुंधलके को पार करते हुए उस व्यवस्था के मूल में मौजूद संरचनात्मक सड़ांध तक पहुंचती है।
कल प्रयागराज में राहुल गांधी की रैली को देखिए। लाखों छात्र और प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी एक सीमित जगह में जमा हुए। उन्होंने सरकारी प्रतिबंधों की परवाह नहीं की और शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपने परिवारों की वैचारिक निष्ठाओं के खिलाफ जाकर वहां पहुंचे।
ये लोग अपने असंतोष के लिए कोई मंच या अभिव्यक्ति तलाशने नहीं आए थे। उन्हें दोनों पहले ही मिल चुके थे और उसका काफी हिस्सा उन्होंने खुद इंस्टाग्राम पर तैयार कर लिया था। राजनेता तो उस रास्ते पर बाद में पहुंचे, जिसे इन युवाओं ने पहले ही बना दिया था।
वे जिस चीज की तलाश में थे और इस मुद्दे को लेकर हुई चार बड़ी रैलियों में लगातार जिसकी तलाश कर रहे हैं, वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—इस गतिरोध को तोड़ने का रास्ता।
व्यवस्था पर कब्जे को समझना
राहुल गांधी इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझते हुए दिखाई देते हैं। आरएसएस द्वारा व्यवस्था पर कब्जा—विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में—एक सुनियोजित और विनाशकारी प्रक्रिया रही है।
परीक्षा व्यवस्था को कथित तौर पर इस तरह प्रभावित किया गया है कि आरएसएस के प्रचारकों और समर्थकों को व्यवस्था में शामिल किया जा सके। इसके साथ उन धनाढ्यों के लिए भी पर्याप्त जगह बनाई गई है जो कुछ सीटें खरीदने की क्षमता रखते हैं।
यह कोई षड्यंत्र सिद्धांत नहीं है। यह एक सुनियोजित संस्थागत कब्जे का दिखाई देने वाला परिणाम है, जिसने शिक्षा क्षेत्र को योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने के माध्यम से बदलकर संरक्षण और कृपा पर आधारित व्यवस्था में तब्दील कर दिया है।
व्यापार जगत को जकड़ लेने वाला चरम स्तर का क्रोनीवाद भी इसी सिद्धांत पर काम करता है। संस्थागत कब्जे ने व्यवस्था के भीतर से राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना को लगभग असंभव बना दिया है, जबकि मीडिया अपने कर्तव्य के अनुरूप गढ़े गए तमाशों के जरिए लोगों का ध्यान दूसरी ओर मोड़ता रहता है।
प्रधानमंत्री स्वयं सोशल मीडिया रीलों के जरिए किसी तरह अपनी आजीविका चलाने वाले लोगों की प्रशंसा कर चुके हैं। दूसरी ओर, सस्ते डेटा के जरिए युवाओं को स्क्रीन की लत की ओर धकेला जा रहा है।
संदेश साफ है: सम्मानजनक रोजगार की आकांक्षा मत रखो, उत्पादक काम की मांग मत करो—बस एल्गोरिद्म के लिए प्रदर्शन करते रहो।
इन सभी ताकतों ने मिलकर किराया-आधारित लाभ और संसाधनों की लूट पर टिकी ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार कर दी है, जिसका पैमाना चौंका देने वाला है।
भारी अक्षमता और कम उत्पादकता अब इस व्यवस्था की खामियां नहीं, बल्कि इसकी विशेषताएं बन चुकी हैं। युवाओं को समाहित करने की क्षमता ही पर्याप्त नहीं है। अर्थव्यवस्था उन्हें समाहित नहीं कर सकती, क्योंकि इसे कभी इसके लिए बनाया ही नहीं गया था। इसे उनसे लाभ निकालने के लिए बनाया गया था।
युवा क्या जानते हैं
छात्र और प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी इसे बहुत करीब से जानते हैं। उन्होंने इसे झेला है। उन्होंने अपने परिवारों के साथ इस पर बहस की है। इनमें से कई परिवार पहचान, आदत या भय के कारण अब भी भाजपा के प्रति वफादार हैं।
उन्होंने सोशल मीडिया पर, छात्रावासों में, कोचिंग सेंटरों में और उन लंबी कतारों में इस पर बहस की है, जहां परीक्षा के फॉर्म भरने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती।
जंतर-मंतर के बाद उन्हें पता है कि वे कार्रवाई कर सकते हैं। उन्होंने अपनी सामूहिक शक्ति का अनुभव किया है। एक पूरी पीढ़ी का सामूहिक दबाव महसूस किया गया है, भले ही वह क्षणिक ही क्यों न रहा हो।
वे शक्तिशाली हैं और अब वे यह जानते हैं।
लेकिन कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल हैं, जिनके उनके पास कोई जवाब नहीं है। यही वह जगह है जहां वे राहुल गांधी की ओर मार्गदर्शन के लिए देख रहे हैं।
अनुत्तरित सवाल
छात्रों को ऐसे सवालों के जवाब चाहिए जो महज राजनीतिक बयानबाजी के सवाल नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व से जुड़े सवाल हैं।
पहला, उन्हें नहीं पता कि मोदी सरकार को चुनाव में हराने के लिए उन्हें काम करना होगा या नहीं। 2029 का आम चुनाव उन युवाओं को असंभव रूप से दूर दिखाई देता है, जिनका भविष्य वर्तमान में ही कुचला जा रहा है।
क्या वे तब तक इंतजार कर सकते हैं? क्या उन्हें इतना लंबा इंतजार करना चाहिए?
दूसरा, उन्हें यह नहीं पता कि उनकी प्राथमिक कार्रवाई का मैदान कहां होना चाहिए। अगर लक्ष्य चुनावी हार है तो उनका वास्तविक मैदान उनके अपने परिवारों में है—भाजपा के उन मतदाताओं के बीच, जिनके साथ उनका खून का रिश्ता है, जिनके साथ वे रहते हैं और जिनके साथ एक ही खाने की मेज साझा करते हैं।
वे ऐसे माता-पिता, दादा-दादी या चाचा को कैसे समझाएं, जिनकी पूरी विश्वदृष्टि दशकों से चली आ रही वैचारिक प्रक्रिया से बनी है?
तीसरा, उन्हें यह नहीं पता कि दूसरे आंदोलनों के साथ उनका रिश्ता क्या होना चाहिए। क्या उन्हें किसानों के साथ जुड़ना चाहिए? आदिवासियों के साथ? क्या उन्हें इन आंदोलनों का नेतृत्व करना चाहिए या इनके पीछे चलना चाहिए?
किसान वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। उनके संघर्ष दर्ज हैं, लेकिन उनका समाधान नहीं हुआ है। आदिवासी विस्थापन और मिटाए जाने के खतरे का सामना कर रहे हैं।
इन आंदोलनों और छात्र आंदोलन के बीच संबंध क्या होना चाहिए?
चौथा, उन्हें नहीं पता कि उन्हें जनता को शिक्षित करना चाहिए या समुदाय की बुद्धिमत्ता का अनुसरण करना चाहिए। युवाओं के अहंकार को सीखने की विनम्रता से संतुलित करना जरूरी है। लेकिन वास्तविक बुद्धिमत्ता और विरासत में मिली धारणाओं के अत्याचार के बीच अंतर कैसे किया जाए?
पांचवां और सबसे बुनियादी सवाल, उन्हें नहीं पता कि उन्हें चुनावी दायरे से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष कार्रवाई करनी चाहिए या नहीं, जबकि चुनावी व्यवस्था प्रभावी रूप से अपने कब्जे में ले ली गई है।
अगर व्यवस्था में हेरफेर हो चुका है, संस्थाएं समझौता कर चुकी हैं, मीडिया खरीदा जा चुका है और न्यायपालिका दबाव में है—तो वैध प्रतिरोध का स्वरूप क्या होगा?
नेतृत्व का अर्थ
युवा नेतृत्व को इसी अर्थ में समझते हैं। संसद में भाषण देना नहीं। प्रेस कॉन्फ्रेंस करना नहीं। नीति दस्तावेज तैयार करना नहीं।
वे इन सबको देख चुके हैं और यह भी देख चुके हैं कि ये सब विफल रहे हैं।
उन्हें इन रणनीतिक सवालों के जवाब चाहिए। उन्हें कोई यह बताने वाला चाहिए कि व्यवस्था टूट चुकी है—यह बात तो वे पहले से जानते हैं। उन्हें यह जानना है कि अब, इसी समय, इसके बारे में करना क्या है।
राहुल गांधी को उन्हें यह बताने की जरूरत नहीं है कि अगर वे सत्ता में आए तो क्या करेंगे। वह उनके लिए बहुत दूर की तस्वीर है, जिसकी वे कल्पना नहीं कर सकते।
उनकी जिंदगी अगले चुनाव चक्र का इंतजार नहीं कर सकती। उनकी ऊर्जा को अभी और यहीं एक दिशा देने की जरूरत है।
सवाल उनके सामने और पूरे देश के सामने यह है कि क्या वे देश के इतिहास में युवाओं की सबसे बड़ी आबादी की सामूहिक हिम्मत का आह्वान करने का साहस जुटा सकते हैं।
कार्रवाई की योजना
छात्र अपनी लामबंदी की क्षमता पहले ही दिखा चुके हैं। उन्हें अब ऐसे कार्यक्रम की जरूरत है, जो उनके गुस्से को रणनीति में और उनकी ऊर्जा को प्रभावी कार्रवाई में बदल सके।
- परीक्षाओं का बहिष्कार
छात्रों से सभी परीक्षाओं के बहिष्कार का आह्वान किया जाना चाहिए, जब तक कि दोषपूर्ण परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं किया जाता।
इसका अर्थ होगा:
एनटीए को समाप्त किया जाए।
पीएससी का पुनर्गठन किया जाए।
दस लाख से अधिक रिक्तियों से जुड़ी सभी लंबित भर्तियों का कैलेंडर प्रकाशित किया जाए और इस वर्ष उन्हें भरने की प्रतिबद्धता जताई जाए।
यह अनिश्चितकाल तक परीक्षाएं टालने की मांग नहीं है। यह पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग है।
परीक्षाएं तब शुरू हों, जब व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त कर दिया जाए। तब तक किसी छात्र को एक ऐसी बाजी में हिस्सा नहीं लेना चाहिए, जिसके नियम ही उसके खिलाफ तय किए गए हों। - जेल भरो आंदोलन
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास सिखाता है कि सविनय अवज्ञा काम करती है। जेल भरो का आह्वान—जेलों को भर देने का अभियान—सरकार की उन कमजोरियों का इस्तेमाल कर सकता है, जिनका सामना पारंपरिक विरोध-प्रदर्शन नहीं कर पाते।
भारतीय जेलें पहले ही अपनी क्षमता से अधिक भरी हुई हैं। कुछ लाख स्वयंसेवक भी सरकार, उसके पुलिस तंत्र और कानून-व्यवस्था की मशीनरी को भारी दबाव में डाल सकते हैं।
हर जिले से 500 लोगों की गिरफ्तारी भी सरकार के लिए संभालना मुश्किल होगा। अपने ही कैद किए गए नागरिकों के बोझ तले व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ऐसी कार्रवाई व्यवस्था के भय को स्थायी रूप से खत्म कर देगी। कोई भी दमनकारी सत्ता उस भय के खत्म हो जाने के बाद कायम नहीं रह सकती, जिसके आधार पर वह लोगों पर नियंत्रण रखती है।
जब युवा राज्य से डरना बंद कर देते हैं, तो राज्य का उन पर नियंत्रण भी खत्म होने लगता है। - आरएसएस के तंत्र को उजागर करना
आरएसएस द्वारा नियुक्त सभी प्रोफेसरों और शिक्षकों की सूची प्रकाशित की जानी चाहिए। आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में रही महिला छात्रों से आह्वान किया जाना चाहिए कि वे उनके खिलाफ स्थायी घेराव करें और उनकी बर्खास्तगी की मांग करें।
यह हिंसा के बारे में नहीं है। यह दृश्यता के बारे में है।
यह उस छिपी हुई सत्ता संरचना को उजागर करने के बारे में है, जो खुले तौर पर काम करती रही है और योग्यता के नाम पर खुद को वैध ठहराती रही है।
घेराव लोकतांत्रिक विरोध का एक रूप है। यह उत्पीड़क को असहज करता है, लेकिन उसे शहीद नहीं बनाता। - सत्य आयोग
किसानों और आदिवासियों के सभी मौजूदा आंदोलनों की जांच करने और तथ्यों पर आधारित रिपोर्ट तथा श्वेतपत्र प्रकाशित करने के लिए छात्र समितियां बनाई जानी चाहिए। खासकर उन आंदोलनों की, जिनमें क्रोनी पूंजीपतियों की भूमिका है।
इसका उद्देश्य कई स्तरों पर होगा।
इससे छात्रों को व्यापक संघर्षों के बारे में जानकारी मिलेगी। दूसरे आंदोलनों के साथ एकजुटता मजबूत होगी। ऐसा दस्तावेजी रिकॉर्ड तैयार होगा, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा।
और इससे भाजपा के बाद के भारत के लिए वह बौद्धिक आधार तैयार होगा, जो यह समझ सके कि देश अपनी वर्तमान स्थिति तक कैसे पहुंचा।
जिस साहस की जरूरत है
इनमें से कुछ भी आसान नहीं होगा। राज्य पलटकर कार्रवाई करेगा। परिवारों में विभाजन होगा। मीडिया बदनाम करेगा। ताकतवर लोग साजिश करेंगे।
लेकिन छात्रों ने पहले ही दिखा दिया है कि वे इन परिणामों का सामना करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने पहले ही साबित कर दिया है कि अब वे डरते नहीं हैं।
उन्हें सिर्फ किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो उन्हें बताए कि उनका साहस उचित है, उनकी कार्रवाई रणनीतिक है और उनके बलिदान व्यर्थ नहीं जाएंगे।
राहुल गांधी के सामने एक विकल्प है।
वे एक ऐसे विचारशील विपक्षी नेता बने रह सकते हैं, जो संसद के सुविधाजनक कक्षों में सत्ता से सच बोलता है।
या वे इससे आगे बढ़ सकते हैं—ऐसे नेता बन सकते हैं जो केवल बीमारी का निदान नहीं करता, बल्कि उसका इलाज भी बताता है; जो केवल विरोधी की पहचान नहीं करता, बल्कि उसे पराजित करने के लिए ताकतों को एकजुट भी करता है।
छात्र इंतजार कर रहे हैं।
किसान इंतजार कर रहे हैं।
आदिवासी इंतजार कर रहे हैं।
पूरा देश इंतजार कर रहा है।
सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी इस स्थिति को समझते हैं या नहीं। उन्होंने इसे पर्याप्त रूप से समझने का प्रमाण दिया है।
सवाल यह है कि क्या उनमें इन सच्चाइयों को खुलकर कहने, इन कार्रवाइयों का आह्वान करने और वास्तविक नेतृत्व के परिणामों का जोखिम उठाने का साहस है।
युवा अपने पहले कदम उठा चुके हैं।
उन्होंने भय को तोड़ा है। उन्होंने अपनी आवाज खोज ली है। उन्होंने अपनी ताकत दिखा दी है।
अब उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जो उन्हें रास्ता दिखाए।
गतिरोध तोड़ा जा सकता है।
व्यवस्था बदली जा सकती है।
भविष्य को वापस हासिल किया जा सकता है।
लेकिन इसके लिए नेतृत्व की जरूरत है।
क्या राहुल गांधी यह नेतृत्व देने के लिए तैयार हैं?











