इतिहास के पन्ने: दुकान से दरबार और दरबार से साम्राज्य !

जब व्यापारियों ने सत्ता खरीद ली थी ….! भारत में अंग्रेजों की कहानी 1857 से शुरू नहीं होती। 1857 तो उस कहानी का बहुत बाद का अध्याय है। असली कहानी शुरू होती है 23 जून 1757 से। बंगाल के एक छोटे से मैदान में, भागीरथी नदी के किनारे बसे प्लासी नाम के स्थान से। यह वह दिन था जब एक व्यापारिक कंपनी ने पहली बार भारतीय राजनीति में इतनी निर्णायक भूमिका निभाई कि उसके बाद उसका रास्ता दुकान से दरबार और दरबार से साम्राज्य की ओर खुल गया।

जिस कंपनी का मूल उद्देश्य भारत से व्यापार करना था, उसने धीरे-धीरे भारत से राजस्व वसूलना शुरू किया। और यहीं से एक ऐसा खेल शुरू हुआ जिसमें भारत की संपदा, अंग्रेजी कंपनी की शक्ति और उसके अधिकारियों की निजी दौलत , तीनों एक-दूसरे से जुड़ गए। इसलिए प्लासी को केवल एक युद्ध कहना अधूरा है। प्लासी एक सत्ता-परिवर्तन था। प्लासी एक आर्थिक मोड़ था। और सबसे बढ़कर—प्लासी व्यापार और राजनीति के खतरनाक गठजोड़ की शुरुआत थी।

एक कंपनी आई थी कारोबार के लिए

ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी। उसके कर्मचारी भारतीय शासकों से व्यापार की अनुमति लेते थे। वे कपड़ा, रेशम, मसाले, नमक, अफीम और दूसरी वस्तुओं के कारोबार से मुनाफाखोरी करते थे। लेकिन व्यापार और सत्ता के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है। जब व्यापारी को लगे कि राजा उसके व्यापार में बाधा डाल रहा है, तो वह क्या करे? क्या वह राजा को मनाए या राजा बदल दे? ईस्ट इंडिया कंपनी ने दूसरा रास्ता चुना, और बंगाल इस प्रयोग का सबसे बड़ा मैदान बना।

अठारहवीं सदी के मध्य तक बंगाल भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में था। यूरोपीय कंपनियाँ यहाँ व्यापार करती थीं और बंगाल के भारतीय व्यापारी तथा बैंकर भी इस व्यापारिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। आधुनिक इतिहासकारों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि यूरोपीय कंपनियों और बंगाल के व्यापारी-बैंकिंग वर्ग के बीच गहरे आर्थिक संबंध बन चुके थे। यानी मामला केवल अंग्रेज बनाम भारतीय नहीं था। मामला यह था कि किसके हाथ में व्यापार रहेगा, किसके हाथ में सत्ता रहेगी और सत्ता से पैदा होने वाला पैसा किसके पास जाएगा।

सिराजुद्दौला की गलती क्या थी?

1756 में बंगाल के नवाब बने सिराजुद्दौला। कंपनी के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे। ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल में अपनी किलेबंदी मजबूत कर रही थी। कंपनी के अधिकारी व्यापारिक सुविधाओं का लाभ उठा रहे थे। नवाब को यह स्वीकार नहीं था कि एक विदेशी व्यापारिक संस्था उसके राज्य के भीतर लगभग स्वतंत्र सत्ता की तरह व्यवहार करे। तनाव बढ़ा और सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर हमला करके कंपनी को वहाँ से हटने पर मजबूर किया।

लेकिन कंपनी ने हार मानने के बजाय वापसी की तैयारी की। मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव आया। क्लाइव केवल सैनिक नहीं था; वह समझ चुका था कि बंगाल को केवल युद्ध के मैदान में नहीं हराया जा सकता, बल्कि बंगाल को दरबार के भीतर हराना ज्यादा आसान होगा। यहीं से असली कहानी शुरू होती है।

युद्ध मैदान में कम, दरबार में ज्यादा हुआ

कंपनी ने बंगाल के नवाब के खिलाफ केवल सैनिक नहीं जुटाए, बल्कि साजिश और गठजोड़ भी जुटाए। नवाब की सेना के प्रमुख सेनापति मीर जाफर, बड़े व्यापारी-बैंकरों और दरबार के कुछ प्रभावशाली लोगों को साथ लिया गया। योजना बनी कि सिराजुद्दौला हटेंगे और मीर जाफर नवाब बनेंगे। बदले में कंपनी को क्या मिलेगा? धन, व्यापारिक सुविधाएँ, राजनीतिक प्रभाव, और सबसे महत्वपूर्ण—एक ऐसा नवाब जो पूरी तरह कंपनी पर निर्भर होगा। केम्ब्रिज के शोध में भी प्लासी के बाद मीर जाफर को सत्ता पर बैठाने और कंपनी के प्रभाव के बढ़ने को ब्रिटिश सत्ता के निर्णायक विस्तार के रूप में दर्ज किया गया है।

23 जून 1757 को प्लासी की लड़ाई में सिराजुद्दौला की सेना संख्या में अंग्रेजों से बहुत बड़ी थी। अंग्रेज़ मुट्ठीभर ही तो थे, लेकिन युद्ध में केवल सैनिकों की संख्या निर्णायक नहीं होती; वफादारी भी एक हथियार होती है। मीर जाफर की सेना निर्णायक समय पर प्रभावी ढंग से नहीं लड़ी। सिराजुद्दौला हार गया, मीर जाफर नवाब बन गया, और रॉबर्ट क्लाइव की कंपनी विजेता बनी। लेकिन सवाल यह है कि कंपनी को बंगाल जीतने के बाद क्या मिला? उत्तर केवल राजनीतिक सत्ता नहीं है; उसे पैसा मिला, बहुत सारा अकूत पैसा।

ब्रिटिश संसदीय अभिलेख में 1757 के समझौते के संदर्भ में 25 लाख पौंड की राशि का उल्लेख मिलता है। उसी रिकॉर्ड में यह भी बताया गया है कि क्लाइव और कंपनी ने उस राजनीतिक परिवर्तन में भूमिका निभाई जिसके परिणामस्वरूप मीर जाफर नवाब बने।

यह केवल युद्ध का खर्च निकालने की बात नहीं थी। यह उस व्यवस्था की शुरुआत थी जिसमें राजनीतिक सत्ता के बदले आर्थिक मुनाफा प्राप्त किया गया। आज की भाषा में हम इसे क्या कहेंगे? शब्दों को लेकर बहस हो सकती है, लेकिन घटनाक्रम साफ है। कंपनी ने एक भारतीय शासक को हटाने और दूसरे को सत्ता में बैठाने में भूमिका निभाई और उसके बदले भारी आर्थिक लाभ प्राप्त किए। यही वह मॉडल था जिसने आगे चलकर औपनिवेशिक शासन जन्मा।

रॉबर्ट क्लाइव था व्यापारी कंपनी का स्टार

रॉबर्ट क्लाइव जब भारत आया था तो वह किसी महान साम्राज्य का वारिस नहीं था। लेकिन भारत से लौटते-लौटते उसकी संपत्ति इतनी बढ़ चुकी थी कि ब्रिटेन में उसकी पहचान एक अत्यंत धनी व्यक्ति के रूप में होने लगी।

ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित Clive Collection में उसके निजी वित्तीय मामलों, खातों, निवेशों और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं। इनमें कंपनी और क्लाइव के बीच जागीर खाते का विवरण भी शामिल है। इसके अलावा, क्लाइव के निजी खातों, व्यापारिक प्राप्तियों और कंपनी के कर्मचारियों को दिए गए वेतन एवं अनुग्रह राशि से संबंधित दस्तावेज भी मौजूद हैं।

जब हम कहते हैं कि अंग्रेज भारत को लूटकर ले गए, तो हमें केवल कोई लोकप्रिय कहानी नहीं सुनानी चाहिए, बल्कि उनके अपने कागज देखने चाहिए। और उन कागजों में पैसा साफ दिखाई देता है। क्लाइव के हाथ में कंपनी भी थी और निजी संपत्ति भी। यहीं औपनिवेशिक भ्रष्टाचार की जड़ दिखाई देती है। कंपनी का अधिकारी कौन था? एक कर्मचारी। लेकिन भारत में उसके सामने क्या था? राजनीतिक सत्ता, व्यापारिक अवसर, भारतीय दरबार, नवाब, जमींदार, बैंकर, व्यापारी, और एक ऐसी व्यवस्था जिसमें कंपनी का हित और अधिकारी का निजी हित हमेशा अलग नहीं रहते थे। कल्पना कीजिये कि 31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने रॉयल चार्टर के जरिये एक कम्पनी बनाई जिसमें 218 शेयर होल्डर थे। इसी चार्टर से महारानी ने कुछ व्यापारियों को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार दे दिया था। इस कंपनी का आधिकारिक नाम ‘गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इनटु द ईस्ट इंडीज’ था। इसे ही आम बोलचाल में ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ कहा गया। इसका मकसद भारत और एशिया के देशों से मसाले, रेशम, सूती कपड़ा और नील जैसी चीजें खरीदकर यूरोप में बेचना और भारी मुनाफा कमाना था। लेकिन यह कंपनी भारत पर राज करनेवाली कम्पनी बन गई थी।

कंपनी के अधिकारियों (जैसे वॉरेन हेस्टिंग्स और अन्य) के भ्रष्टाचार के किस्से जब ब्रिटेन पहुँचे और कंपनी 1772 में भारी वित्तीय संकट में फँस गई, तब ब्रिटिश संसद ने पहली बार कंपनी के मामलों में सीधा दखल देना शुरू किया। 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट के जरिए ब्रिटेन की संसद ने भारत में कंपनी के कामकाज पर नजर रखना शुरू किया और बंगाल के गवर्नर को ‘गवर्नर-जनरल’ बनाया गया।

1784 का पिट्स इंडिया एक्ट के तहत ब्रिटेन की सरकार ने भारत में कंपनी के राजनीतिक मामलों को नियंत्रित करने के लिए एक ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ बना दिया। यानी, कंपनी व्यापार तो करती रही, लेकिन उसकी राजनीतिक नीतियों पर ब्रिटिश सरकार का शिकंजा कसता चला गया।

1857 का विद्रोह टर्निंग पॉइंट बना

यहीं ईस्ट इंडिया कंपनी का चरित्र बदल गया था। एक व्यापारी कंपनी से वह धीरे-धीरे सैन्य शक्ति वाली कंपनी बनी, फिर राजस्व वसूलने वाली कंपनी बनी और अंततः साम्राज्य चलाने वाली कंपनी बन गई। कैंब्रिज की एक स्टडी में प्लासी के बाद बंगाल के संसाधनों के कंपनी और उसके कर्मचारियों के पास जाने तथा 1765 में राजस्व-संग्रह के अधिकार मिलने को इस परिवर्तन के महत्वपूर्ण चरण के रूप में लिक्खा गया है।

इसलिए 1757 को केवल एक युद्ध कहना इतिहास को छोटा कर देना है। 1757 वह क्षण था जब व्यापार ने शासन को निगलना शुरू किया। लेकिन क्या पूरा बंगाल उसी दिन लूट लिया गया? नहीं। प्लासी के अगले दिन से पूरा बंगाल खाली नहीं हो गया था, और न ही यह कहना ऐतिहासिक रूप से सही होगा कि भारत की सारी संपत्ति 1757 में ही इंग्लैंड चली गई। लूट और आर्थिक निकासी एक दीर्घकालिक प्रक्रिया थी। प्लासी ने उसका दरवाजा खोला, और 1765 की दीवानी ने उस दरवाजे को और बड़ा कर दिया। बाद के दशकों में भू-राजस्व, व्यापारिक एकाधिकार, निजी व्यापार, कंपनी के खर्च, पेंशन, वेतन, सैन्य खर्च और ब्रिटेन को होने वाले विभिन्न भुगतानों ने इस आर्थिक संरचना को और गहरा किया। प्लासी पूरी लूट नहीं, लूट व्यवस्था की शुरुआत थी जिसने आगे चलकर भारत से बड़े पैमाने पर संसाधनों के हस्तांतरण को संभव बनाया।

क्या इसमें केवल अंग्रेज दोषी थे? इस सवाल से बचना नहीं चाहिए। नहीं, केवल अंग्रेज दोषी नहीं थे। बंगाल के भीतर भी राजनीतिक संघर्ष थे, दरबार में गुटबाजी थी। मीर जाफर, जगत सेठ जैसे वित्तीय हितधारक, कुछ सैन्य अधिकारी और अन्य स्थानीय शक्तियाँ अपने-अपने हित साध रही थीं। यूरोपीय शक्तियाँ भी एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही थीं।

लेकिन एक बड़ा फर्क था: इन आंतरिक संघर्षों का सबसे बड़ा लाभ किसने उठाया? ईस्ट इंडिया कंपनी ने। और यही इतिहास का निर्णायक बिंदु है।अनेक रिसर्च में भी प्लासी को केवल ब्रिटिश सैन्य विजय की सरल कहानी नहीं माना गया है; बंगाल के व्यापारी, बैंकर, जमींदार और राजनीतिक अभिजात वर्ग यूरोपीय कंपनियों के साथ जटिल आर्थिक संबंधों में जुड़े हुए थे।

इसलिए इसे केवल अंग्रेज वर्सेस इंडियन कह देना भी अधूरा होगा। असल कहानी थी – – भारतीय सत्ता-संघर्ष + यूरोपीय व्यापारिक प्रतिस्पर्धा + कंपनी की सैन्य शक्ति + निजी आर्थिक हित। इन सबका विस्फोट हुआ—प्लासी में। प्लासी का सबसे बड़ा विजेता कौन था?
सिराजुद्दौला नहीं। मीर जाफर भी नहीं। बंगाल की जनता तो बिल्कुल नहीं।

विजेता रही ईस्ट इंडिया कंपनी। क्योंकि उसे पहली बार यह अनुभव हुआ कि भारत में राजनीतिक सत्ता हासिल करना व्यापार से ज्यादा लाभदायक हो सकता है। और यह अनुभव आगे चलकर पूरे भारतीय इतिहास की दिशा बदलने वाला था। इतिहासकारों के अनुसार प्लासी के बाद कंपनी की स्थिति इतनी बदल गई कि वह एक क्षेत्रीय शक्ति बनने लगी और आठ साल में ही बंगाल के राजस्व पर उसका औपचारिक अधिकार स्थापित हो गया।

प्लासी के बाद एक नया समीकरण बना जिसमें व्यापार, राजनीतिक हस्तक्षेप, सैनिक शक्ति, सत्ता परिवर्तन, रेवेन्यू, अधिक सैनिक शक्ति तथा अधिक कब्ज़ा क्षेत्र का मॉडल बना। यही ईस्ट इण्डिया कम्पनी का मॉडल बन गया। कंपनी को अब अपने व्यापार के लिए केवल बाजार नहीं चाहिए था, उसे टैक्स चाहिए था, जमीन चाहिए थी और सत्ता चाहिए थी। और सत्ता मिलते ही उसे मिला , भारत का राजस्व। यही कारण है कि 1765 की दीवानी प्लासी से भी अधिक महत्वपूर्ण घटना थी। प्लासी ने कंपनी को सत्ता का स्वाद दिया, और दीवानी ने उसे सत्ता की आमदनी दे दी।

अगर एक व्यापारी कंपनी किसी देश में व्यापार करने आए और कुछ दशकों बाद उसी देश के करोड़ों लोगों से टैक्स वसूलने लगे, तो सवाल केवल यह नहीं है कि उसने कितना व्यापार किया। सवाल यह है कि उसने व्यापार को सत्ता में कैसे बदला? और उससे भी बड़ा सवाल उस सत्ता से पैदा हुई संपत्ति कहाँ गई? क्या वह भारत में रही या ब्रिटेन चली गई? क्या वह कंपनी के खजाने में गई या उसके अधिकारियों की निजी संपत्ति में?

प्लासी के बारे में सबसे खतरनाक भ्रम यह है कि अंग्रेजों ने भारत को केवल अपनी सेना की ताकत से जीता। नहीं, उन्होंने भारतीय राजनीति की दरारों को पहचाना, स्थानीय शक्तियों से गठजोड़ किया, व्यापारिक हितों को राजनीतिक शक्ति से जोड़ा, और जब सत्ता हाथ में आई तो उसे आर्थिक संसाधनों में बदला।

इस अर्थ में प्लासी सिर्फ एक युद्ध नहीं था। यह भारत में कॉरपोरेट सत्ता के राजनीतिक सत्ता में बदलने का ऐतिहासिक उदाहरण था। एक निजी कंपनी ने एक विशाल और समृद्ध प्रांत की राजनीति को प्रभावित किया, अपना मनचाहा शासक स्थापित किया और फिर धीरे-धीरे राजस्व-संग्रह की व्यवस्था पर अधिकार जमा लिया। इतिहास का यह अध्याय आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि जब व्यापार और सत्ता की सीमाएँ मिट जाती हैं, तो सबसे पहले आम जनता को ही इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। जैसी अभी जनता चूका रही है। कुछ उद्योगपतियों को बड़े बड़े प्रतिष्ठान और आधारभूत संरचनाएं पचास पचास साल के लिए दे दी गई हैं और वे वहां से मनचाहा दोहन कर रहे हैं। सत्ता की चाभी भी इन धनिक लोगों के पास आ गई है। सरकारी फैसले मंत्रलयों की जगह इन कॉर्पोरेट हॉउस के अंदर होते हैं, जैसे आरोप लगते रहे हैं। कुछ कॉर्पोरेट ऐसी जगह पोजिशनिंग कर चुके हैं, कि सत्ता में कोई भी पार्टी आ जाये, उनको ढेले का नुकसान नहीं होगा।

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