लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी बहस को जन्म दिया है जिसका उनसे और उनके राजनीतिक परिवार से रिश्ता पुराना, बुनियादी और ऐसा है जिसमें उनके राजनीतिक परिवार से असहमति की कोई गुंजाइश नहीं है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है और अब ‘दिमागी नक्सलियों’ को पहचान कर अलग-थलग करने की जरूरत है।
नरेंद्र मोदी के इस बयान में नया कुछ भी नहीं ढूंढना चाहिए। यह प्रेरणा उन्हें अपनी राजनीतिक विचारधारा से ही मिलती है। इस बात का कोई महत्व नहीं है कि उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा है। वे शब्द ही गढ़ने के लिए जाने जाते हैं। श्री मोदी अपनी राजनीति को ऐसे शब्दों और ऐसे नारों से संबोधित करते हैं और उन्हें सुनने वाले कहते हैं— वाह!
नरेंद्र मोदी जिस राजनीतिक परिवार के प्रतिनिधि हैं, उसकी तो बुनियाद में ही नागरिकों को अलग-थलग करना, भेदभाव करना मौजूद है।
हाल ही की तो बात है। इसी 8 अगस्त को कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने जब हल्द्वानी में एक सभा को संबोधित किया, तब उनके कार्यक्रम के दो दिनों बाद कुछ हिंदू संगठनों ने उस स्थल पर शुद्धिकरण हवन किया और गंगाजल का छिड़काव किया था। धिक्कारने लायक ही बात है कि कांग्रेस पार्टी के लिए यह राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना और यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना मल्लिकार्जुन खरगे का दर्द होकर रह गई! इसे सिर्फ कोई दलित महसूस कर सकता है। कांग्रेस के भी ब्राह्मणवादियों के लिए इस दर्द को महसूस करना कठिन है। यह भी तो एक दलित को अलग-थलग करना ही था! क्या मोदी जी ने खरगे जी के इस दर्द को महसूस किया?
दरअसल लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा और गुजरात दंगों से लेकर आज तक नरेंद्र मोदी की भाषा का टेक्स्ट थोड़ा बहुत बदला हो तो बदला हो, व्याकरण नहीं बदली है।
15 अगस्त के उनके भाषण ने जो बड़ा सवाल छोड़ा है, वह यही है कि दिमागी नक्सली कौन हैं? उन्हें पहचानेंगे कैसे? उन्हें अलग-थलग कैसे करेंगे?
प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई किसी सरकार के खिलाफ, संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ, देश की एकता और अखंडता के खिलाफ, संविधान के खिलाफ, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ किसी भी सशस्त्र आंदोलन को समाप्त करने की बात करते हैं तो बतौर प्रधानमंत्री वे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे होते हैं।
जब बस्तर और उससे लगे छत्तीसगढ़-तेलंगाना क्षेत्र में नक्सलवाद के सफाये के नाम पर सुरक्षा बलों का अब तक का सबसे बड़ा अभियान चला और सरकार ने उसे बड़ी सफलता माना, तो सुरक्षा बलों की अतीत की अनेक कथित गैर-कानूनी कार्रवाइयों को लेकर भी विपक्ष और मीडिया के एक हिस्से ने कोई बड़ा सवाल खड़ा नहीं किया। विपक्ष इसलिए भी क्योंकि माओवाद से निपटने की उसकी अपनी लाइन भी यही थी और मीडिया को सवाल करने लायक कुछ मिला नहीं, मिलता भी नहीं!
लेकिन दिमागी नक्सली क्या है, कौन हैं? क्या अर्बन नक्सल और दिमागी नक्सली जैसे विशेषणों में कोई फर्क है? बुनियादी तौर पर तो नहीं!
दरअसल ये दोनों ही विशेषण उस विचारशील और संघर्षशील तबके को संबोधित हैं जो सवाल करते हैं, धारा के खिलाफ खड़े होकर चुनौती देने का दम रखते हैं, जो प्रतिरोध रचते हैं, जो प्रतिरोध करते हैं, जो प्रतिरोध को स्वर देते हैं, जो दमन और शोषण के इरादों और सवालों की शिनाख्त करते हैं, जो तर्कशील हैं, जिनकी देखने की दृष्टि में भक्ति नहीं, विज्ञान है, जिनकी आस्था अनुसंधानों में है। जो हैं तो इस देश के अनेक उच्च शिक्षा संस्थानों की दुनिया में इज्जत है। दरअसल यही तो खटकते हैं। इन्हीं पर तो हमला है, क्योंकि यहीं से तो वे लोग निकलते हैं जिन्हें प्रधानमंत्री ने कहा है—दिमागी नक्सली!
ये वह ‘दिमागी नक्सली’ हैं जो इस देश के आम नागरिकों के सवालों में नजर आते हैं। ये वह कथित ‘दिमागी नक्सली’ हैं जो सत्ता के इरादों और उसकी नीयत की शिनाख्त करते हैं, पड़ताल करते हैं, चुनौती देते हैं, ललकारते हैं और तब कहीं किसान आंदोलन के दबाव में तीन किसान विरोधी कृषि कानून वापस लिए जाते हैं या किसी मंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है।
असल में अपने इस बयान से जाने-अनजाने प्रधानमंत्री ने विचारों के स्तर पर नक्सली अस्तित्व को भी स्वीकार कर लिया है। बस फर्क इतना है कि उनके इस कथित दिमागी नक्सलियों में सिर्फ वे लोग नहीं हैं जो मार्क्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद में आस्था रखते हैं या सशस्त्र विद्रोह के पक्षधर होते हैं या भूमिगत कार्रवाइयों में यकीन करते हैं या जो इस देश के संविधान को खारिज करते हैं या संसद को सूअरबाड़ा कहने से नहीं हिचकते। इसमें वे भी शामिल हैं जो लोकतंत्र में मजबूत आस्था रखते हैं, जो संविधान में आस्था रखते हैं, जो चुनाव के तंत्र पर संदेह करते हैं, निष्पक्ष चुनावों की मांग करते हैं, संसदीय प्रणाली की शुचिता के लिए लड़ते हैं और इन सबके बावजूद चुनावों में हिस्सा लेते हैं, ताकि चुनाव किसी अलोकतांत्रिक निजाम के शिकंजे में ही न रह जाएं।
ये ऐसे ‘दिमागी नक्सली’ हैं जिन्हें दुनिया में देश की साख की चिंता है। जिन्हें इस बात की चिंता है कि आज हिंदुस्तान इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मन इस्राइल के साथ क्यों खड़ा है? जिन्हें चिंता है कि हमने ट्रंप के आगे घुटने क्यों टेक दिए?
ये वह ‘दिमागी नक्सली’ हैं जिन्होंने संविधान पढ़ा है और पूछते हैं कि जब संविधान का अनुच्छेद 39 कहता है कि नागरिकों—पुरुषों और महिलाओं—को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन पाने का अधिकार हो, तो इस पर अमल क्यों नहीं करती सरकार? क्यों समान अवसर उपलब्ध नहीं कराती सरकार? क्यों सारे अवसर एक खास तबके के लिए होते हैं? क्यों इस देश में भयावह बेरोजगारी है? संविधान का अनुच्छेद 39 राज्य को संसाधनों के वितरण और संपत्ति तथा उत्पादन के साधनों के संकेंद्रण को रोकने की दिशा में भी नीति बनाने को कहता है। जब कोई पूछता है कि सरकारें इस दिशा में ठोस कार्रवाई क्यों नहीं करतीं तो वह ‘दिमागी नक्सली’ की श्रेणी में होता है!
इन कथित दिमागी नक्सलियों में यही वह तबका है जो संविधान को सामने रखकर सरकार से सवाल करता है। जैसे यह तबका पूछता है कि संविधान के अनुच्छेद 25 या अनुच्छेद 30 की धज्जियां क्यों उड़ाई जाती हैं?
अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। हकीकत यह है कि आज इस देश में घरों में भी नमाज पढ़ने या प्रार्थना करने पर हमले होने की खबरें सामने आती हैं। क्या इन हमलों के पीछे उसी विचारधारा के लोग नहीं हैं जिसके अनुयायी स्वयं प्रधानमंत्री जी हैं?
अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थानों की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है। इस स्वतंत्रता का सच भी सब जानते हैं।
इस तरह की तमाम प्रवृत्तियां आजादी के बाद भी इस देश में मौजूद थीं, लेकिन इनके विरोध का लोकतांत्रिक स्पेस सबसे ज्यादा किस दौर में सिमटा है? प्रधानमंत्री जी वाले ‘दिमागी नक्सली’ इसी सवाल के जवाब में कहते हैं—आज!
आज के भारत की चिंता करनी हो तो विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक देखना चाहिए। भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। 2026 में रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने भारत को 31.96 का स्कोर दिया है, जो 2025 के 151वें स्थान से छह पायदान की गिरावट है।
देखना चाहिए कि वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट यानी विश्व न्याय परियोजना के तहत कानून के राज में आज भारत कहां ठहरता है?
2025 के आंकड़े के मुताबिक भारत 143 देशों में 86वें स्थान पर है, जिसका रूल ऑफ लॉ स्कोर 0.49 है। इस सूचकांक के आठ पैमानों में से ‘फंडामेंटल राइट्स’ यानी मौलिक अधिकारों में भारत 103वें और ‘सिविल जस्टिस’ यानी दीवानी न्याय में 114वें स्थान पर है।
कानून के राज से सामान्य आशय है कि देश के नागरिकों के अधिकार सुरक्षित हों, निष्पक्ष न्याय व्यवस्था हो, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरकरार रहे, लेकिन हम कहां हैं? 143 देशों में 86वें स्थान पर! क्या फर्क पड़ता है कि हमसे ऊपर कौन हैं और हमसे नीचे कौन हैं? लेकिन जब भारत के इस हाल की कोई चिंता करता है, बेहतरी के विकल्प भी सुझाता है, लड़ता भी है, जेल भी जाता है तो उसे ‘दिमागी नक्सल’ की श्रेणी में रखना आसान होता है।
आज देश में एक तबका है जो बेचैन है। वह युवा है, दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक हैं, महिलाएं हैं, मजदूर और किसान हैं। इन सबके अपने सवाल हैं, अपनी चिंताएं हैं और ये अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत सवाल करते हैं, मुद्दे उठाते हैं, लड़ते हैं। अतीत में खुद बीजेपी ने जनहित के बड़े मामलों में लड़ाइयां लड़ी हैं।
ये वो तबका है जो संसदीय लोकतंत्र में आस्था रखता है, जो कानून का राज चाहता है, जो निष्पक्ष न्याय व्यवस्था चाहता है, जो आदिवासियों के अधिकारों पर हमलों का विरोध करता है, जो अल्पसंख्यकों, दलितों पर हमलों से विचलित होता है, जो जल, जंगल और जमीन बचाना चाहता है, जो अनियंत्रित कॉरपोरेट मुनाफाखोरी का विरोध करता है, जो समान अवसरों की बात करता है, जो शिक्षा और रोजगार चाहता है, जो उन संस्थानों को बचाना चाहता है जिन्होंने भारत को दुनिया में सिर उठाने का मौका दिया। तो क्या उन्हें ही ‘दिमागी नक्सली’ के रूप में पहचान कर अलग-थलग करने की बात प्रधानमंत्री जी कर रहे हैं?
याद होगा, प्रधानमंत्री ने ही कपड़ों से पहचानने की भी बात की थी। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान दुमका की चुनावी सभा में उन्होंने हिंसा करने वालों की पहचान उनके कपड़ों से किए जाने की बात कही थी।
किसी चुनाव प्रचार में आपने जो कहा, नहीं कहना चाहिए, फिर भी जब देश में संसदीय मर्यादा रसातल में हो तो बहुत पवित्रता की उम्मीद बेमानी है। लेकिन इतनी उम्मीद तो की जानी चाहिए कि जब ‘सबका साथ, सबका विश्वास, सबका विकास’ प्रमुख राजनीतिक नारा हो तो किसी देश के प्रधानमंत्री को जनता के किसी भी तबके को—जब तक कि वह संविधान और इस लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था और विश्वास को दोहराता है— अलग-थलग करने की बात क्यों करनी चाहिए?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जाने-अनजाने जिन्हें अलग-थलग करने की बात कही है, उनमें वह मुखर तबका भी शामिल है जो लोकतंत्र की मशाल थामे देश भर में छोटे-बड़े अहिंसक, संविधान सम्मत लोकतांत्रिक संघर्षों की अगुवाई कर रहा है। प्रधानमंत्री जी, कायदे से तो आपको अपनी उस प्रतिबद्धता को दोहराना चाहिए जो कहती है—सबका साथ! अलग-थलग वाली भाषा जन-गण-मन के खिलाफ है! हम भारत के लोगों के लिए तकलीफदेह है।
आप हिंसा का मुकाबला संविधान प्रदत्त अधिकारों से कीजिए, लेकिन देश की लोकतंत्र पसंद अवाम को अलग-थलग करने का नारा लगाकर अपने एजेंडे का ऐसा प्रकटीकरण करेंगे तो यह न्यायपालिका और कार्यपालिका के लिए पुराने टूलकिट को ही ताकत देना होगा।
लेकिन सुनिए! मोदी जी के इस बयान का एक तात्कालिक निशाना है। निशाना क्या, गुस्सा है। और यह है जंतर-मंतर से लेकर पूरे देश में फैला युवा आक्रोश। जून 2026 में जंतर-मंतर का युवा आंदोलन NEET-UG पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के सवाल से शुरू हुआ और जुलाई में व्यापक युवा असंतोष का प्रतीक बना। आंदोलन के दौरान हजारों युवा सड़कों पर उतरे। 20 जुलाई को हजारों प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए संसद की ओर मार्च किया। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया।
क्या नरेंद्र मोदी इस देश के इन युवाओं को अलग-थलग करने की बात कर रहे हैं? और अगर वह ऐसा कर रहे हैं तो उन्हें बताना चाहिए कि वे इन तमाम लोगों को किससे अलग-थलग करना चाहते हैं? क्या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से? क्या सत्ता में प्रतिनिधित्व के उनके हक से? क्या लोक कल्याण की अपनी जिम्मेदारियों से? क्या कैंपस से? या क्या समाज से ही?
मोदी जी, लोकतंत्र नागरिकों को अलग-थलग नहीं करता, अपनी विशाल चादर में समेटता है। अलग-थलग की भाषा आपको नेहरू के वो रिकॉर्ड नहीं तोड़ने देगी जहां मूल्य बसते थे—लोकतांत्रिक मूल्य!
दरअसल मोदी जी जिसे ‘नक्सली दिमाग’ के रूप में पहचानना चाहते हैं और अलग-थलग करना चाहते हैं, वह इस देश में प्रतिरोध की आवाज है।
मोदी जी भूल गए कि यह देश अप्रतिम प्रतिरोध और महान बलिदानों की बदौलत आजाद हुआ है। आज जो आजादी के मूल्यों के साथ डटे हैं, उन्हें आप दिमागी नक्सली कह लें, वामपंथी कह लें, गांधी कह लें, दलित-आदिवासी कार्यकर्ता कह लें, युवा, मजदूर, किसान या महिला आंदोलनकारी कह लें—इन सभी की चेतना में आजादी की लड़ाई के मूल्य बसे हैं। इसे वही समझ सकता है जिसके पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया।
प्रधानमंत्री को इस बात पर विचार करना चाहिए कि आजादी के 79 बरस बाद भी इन कथित नक्सली दिमागों की ऐसी उपस्थिति क्यों है कि देश के प्रधानमंत्री को लाल किले से इन्हें अलग-थलग करने की बात कहनी पड़ रही है? आज भी ऐसा क्यों है कि पूरे देश में जगह-जगह दलित उत्पीड़न है और इस उत्पीड़न के खिलाफ दलित संघर्षरत हैं? क्यों पूरे देश में आदिवासी गुस्से में हैं? विकास के नाम पर, कॉरपोरेट जरूरतों के लिए जब उन्हें विस्थापित किया जाता है और छत्तीसगढ़ के हसदेव इलाके की तरह पेड़ों की कटाई और खनन के खिलाफ वे संघर्ष करते हैं, तो उनके साथ पुलिस की झड़प और दमन के आरोप क्यों सामने आते हैं? क्या ये ‘नक्सली दिमाग’ हैं?
मोदी जी का यह नारा बाजार को बहुत पसंद आएगा, कॉरपोरेट तो बिछा चला जाएगा। लेकिन समझना होगा कि इस नारे का असली असर क्या होगा — इस देश की जनता को नियंत्रित रखने की कोशिश।
जो संसदीय लोकतंत्र के दायरे में रहकर, जो संविधान हाथ में लेकर भी आवाज उठाएगा, अगर लड़ेगा, अगर सवाल पूछेगा, तो वह ‘दिमागी नक्सली’ कहलाएगा!
यह भले ही पुरानी बोतल से निकला नया टर्म हो, पर इसका लक्ष्य साफ है — नागरिक अधिकारों की गुंजाइश को सीमित करना, स्वतंत्रता के दायरे को संकुचित करना।
अपने ही नागरिकों को चुन-चुनकर अलग-थलग करना मतलब अपने ही नागरिकों से संवाद को और सीमित करते चले जाना है। यह रास्ता घातक है, खासतौर पर तब जब देश की तमाम लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हों।
प्रधानमंत्री को, सरकार को या विपक्ष को एक बात बहुत साफ समझनी चाहिए — ऐतिहासिक अनुभव यही है कि दुनिया में सबसे बड़ी जनाकांक्षा अगर कोई है तो वह लोकतंत्र ही है। इसे समेटना बहुत मुश्किल है।
द लेंस ने अभी एक खबर की थी कि छत्तीसगढ़ में स्कूली पाठ्यक्रम से गांधीजी पर केंद्रित एक पुस्तिका को हटा दिया गया है। अगर सवाल करना, सत्ता के सामने खड़ा होना और स्थापित धारणाओं को चुनौती देना ही ‘दिमागी नक्सल’ होने की कसौटी है, तो निश्चित ही गांधीवाद भी ‘दिमागी नक्सली’ है!
चलते-चलते—इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त के भाषण को समाप्त करते हुए “जय हिंद” कहना भूल गए थे! 2014 के बाद ऐसा पहली बार हुआ। यह मानवीय चूक थी या कहीं उनके राष्ट्रवाद का शब्द-संसार तो नहीं बदल रहा है?











