हद है! क्या कोई स्वच्छता में भी महागुरु होता है? …लेकिन अगर इंदौर नगर निगम की मानें तो होता है और वह ‘महागुरु’ इंदौर है! आठ साल से स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर चुना जा रहा है। एक सम्मेलन के पहले तो शहर में बाकायदा होर्डिंग्स लगे थे – ‘Enjoy Cleanliness, You Are in the Cleanest City!’ मतलब यह कि आप स्वच्छतम शहर में हैं, एंजॉय कीजिए। यह ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि आपकी तशरीफ बड़ी साफ है, उसे एंजॉय कीजिए। स्वच्छता तो स्वच्छता है, होनी ही चाहिए। इसमें कौन-सी ख़ास बात है? लेकिन शासन-प्रशासन ने हर काम के लिए अपनी ही पीठ थपथपाने में महारत पा ली है। और फिर ‘महा’ जोड़े बिना हमारा काम नहीं चलता। मध्य प्रदेश में मेला नहीं लगता, महामेला लगता है। तीर्थ नहीं होते, महातीर्थ होते हैं। यहाँ तक कि दुकानों में सेल नहीं लगती, ‘महासेल’ लगती है।
इंदौर में ‘स्वच्छता’ का ध्यान रखा जाता है। गीला और सूखा कचरा प्राइवेट कंपनियों को प्रोसेसिंग के लिए दिया जाता है। कंपनियाँ उसे प्रोसेस करती हैं, रीसाइकिल करती हैं, खाद और गैस बनाती हैं। नगर निगम ने उन्हें गारंटी दी है कि हम इतना टन कचरा हर रोज़ देंगे ही! नहीं दें तो वह कंपनी नगर निगम पर ‘जुर्माना’ लगा सकती है। कभी सुना है ऐसा कि कोई प्राइवेट कंपनी स्थानीय सरकार पर जुर्माना लगा सकती हो?
स्वच्छता के मायने क्या हैं? सड़क साफ हो, गलियों और पार्कों में कचरा नहीं फैला हो, गटर चोक न हों, यहाँ तक तो ठीक है; लेकिन जिस शहर में पीने का पानी साफ न हो, वायु प्रदूषण सीमा से ज़्यादा हो, ध्वनि प्रदूषण पर कोई नियंत्रण न हो, तो क्या उसे स्वच्छ शहर का तमगा मिलना चाहिए? क्या स्वच्छता के ‘महागुरु’ को पीने के पानी की पाइपलाइन में सीवरेज की पाइपलाइन मिलने देने की आपराधिक लापरवाही की छूट होती है?
विडंबना यह है कि जिस शहर को लगातार स्वच्छता सर्वेक्षणों में देश का नंबर-1 शहर बताया जाता रहा, वहीं अब लाखों लोग पीने के साफ़ पानी के लिए परेशान हैं। कई इलाकों में नलों से पर्याप्त पानी नहीं आ रहा, कई इलाकों में दूषित पानी की शिकायत है और लोगों को पानी के टैंकरों के भरोसे रहना पड़ रहा है।
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने यह मुद्दा उठाया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दावा किया कि उनके लोगों ने 29 वार्डों से पीने के पानी के 240 सैंपल लिए, जिनमें 98 प्रतिशत दूषित पाए गए। उनमें एस्चेरिचिया कोलाई और कोलीफॉर्म जैसे जीवाणु मिले हैं। एस्चेरिचिया कोलाई एक प्रकार का बैक्टीरिया है, जो आमतौर पर इंसानों और जानवरों की आंतों में पाया जाता है। कोलीफॉर्म जीवाणुओं का एक समूह है, जो मुख्य रूप से मनुष्यों और गर्म रक्त वाले जानवरों की आंतों, मिट्टी तथा सतही जल में पाया जाता है। पीने के पानी या भोजन में इनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि वह मल या अन्य रोगजनकों से दूषित है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
कांग्रेस का आरोप है कि इंदौर शहर का 90 प्रतिशत पानी ज़हरीला है। नर्मदा सप्लाई वाले इलाकों में भी समस्या है। भागीरथपुरा की बस्ती में प्रदूषित पानी से हुई दर्जनों मौतों के बाद भी कोई व्यापक टेस्टिंग या क्वालिटी ऑडिट नहीं हुआ। अमृत योजना में 7000 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन नतीजे शून्य रहे। इंदौर शहर की छह झीलें सूख रही हैं, भूजल स्तर गिर रहा है, बोरवेल सूख रहे हैं, लेकिन शासन और प्रशासन इवेंट्स में ही व्यस्त है।
इंदौर के भगीरथपुरा इलाके में दिसंबर 2025 के अंत से जनवरी-फरवरी 2026 तक दूषित पेयजल ने भयानक त्रासदी मचा दी। सैकड़ों लोग नलों में दूषित पानी आने की शिकायतें कर चुके थे, लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। नल से आने वाले पानी में गंदा पानी मिल जाने से डायरिया, उल्टी, बुखार और डिहाइड्रेशन की महामारी फैल गई। बीमारी से मौतें होने लगीं। करीब 250 लोग अस्पताल में भर्ती हुए थे, जबकि कुल प्रभावित लोगों की संख्या लगभग 1400 थी। छह माह के एक बच्चे, अव्यान, की बोतल से पानी पिलाने के बाद मृत्यु हो गई। शुरू में मौतों की बात छिपाई गई, लेकिन बाद में 15 मौतें स्वीकार की गईं। आरोप है कि करीब 60 मौतें हुई होंगी, लेकिन प्रशासन ने कहा कि मौतों के कारण दूसरे हैं। मौत का कारण गुइलेन-बैरे सिंड्रोम को बताया गया, जो एक दुर्लभ ऑटोइम्यून न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें शरीर की अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता नसों पर हमला कर देती है।
इंदौर बीजेपी का गढ़ कहा जा सकता है। यहां विधानसभा की सभी नौ सीटों पर बीजेपी के विधायक हैं। 1989 से इंदौर लोकसभा सीट बीजेपी के पास है। वर्ष 2000 से इंदौर नगर निगम पर बीजेपी का कब्ज़ा है। जिस इलाके में दूषित पानी से मौतें हुईं, वह इंदौर-1 विधानसभा क्षेत्र है। वहाँ से कैलाश विजयवर्गीय विधानसभा चुनाव जीते थे, जो अभी कैबिनेट मंत्री हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इंदौर जिले के प्रभारी मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में ज़िम्मेदारी किसकी होनी चाहिए?
भगीरथपुरा की मौतों के बाद अफसर हटाए गए, पाइपलाइनों की मरम्मत शुरू हुई, सार्वजनिक शौचालय हटाए गए, इलाके में टैंकर सप्लाई शुरू की गई। नर्मदा के पानी की पाइपलाइन से सप्लाई कुछ दिनों के लिए बंद की गई। मुफ़्त इलाज और मुआवज़े के ऐलान हुए। कुछ दिनों के लिए इलाके में महामारी घोषित की गई। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनवरी 2026 में पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता का एक-सदस्यीय जांच आयोग गठित किया। प्रारंभिक रिपोर्ट मार्च 2026 में पेश भी हुई, लेकिन विस्तृत रिपोर्ट के लिए समय बढ़ाया गया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए रिपोर्ट मांगी। जांच अभी पूरी नहीं हुई है। लापरवाही, टेंडर, रखरखाव और शिकायतों की अनदेखी पर ही फोकस है, समस्या के पूर्ण समाधान पर नहीं। इसी बीच कांग्रेस ने मोर्चा संभाल लिया और जबरदस्त आंदोलनों की झड़ी लगा दी। पानी की मांग कर रहे लोगों पर प्रशासन ने वॉटर कैनन से पानी की बौछारें कर दीं।
इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने दावा किया कि कांग्रेस द्वारा 29 वार्डों से लिए गए 240 सैंपल पूरे शहर का प्रतिनिधित्व नहीं करते। शहर में 85 वार्ड हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस स्वच्छ इंदौर को बदनाम करने की साज़िश कर रही है। इंदौर शहर वॉटर प्लस प्रमाणित है और रोज़ 360 मिलियन लीटर प्रतिदिन पानी की सप्लाई हो रही है। समस्या है, लेकिन कुछ इलाकों तक सीमित है। बोरवेल सूखने की वजह से यह स्थिति पैदा हुई है।
हज़ारों बोरवेल सूख गए हैं, लेकिन नर्मदा जल की सप्लाई जारी है। टैंकर चलाए जा रहे हैं। लीकेज और चोरी के कारण 35 से 40 प्रतिशत पानी कम वितरित हो पा रहा है। नर्मदा पंपिंग पर हर साल लगभग 350 करोड़ रुपये बिजली पर खर्च हो रहे हैं।
कांग्रेस की मांग है कि बीजेपी की तीन-तीन इंजनों वाली सरकार होने के बावजूद लोग प्यासे हैं। महापौर इस्तीफा दें और उन पर गैर-इरादतन हत्या के मामले दर्ज किए जाएं। भागीरथपुरा में टैंकरों से जल सप्लाई और सतर्कता जारी है। पूरे इंदौर में पानी की शिकायतें बढ़ी हैं। पुरानी पाइपलाइनें, सीवर और जल लाइनों की निकटता तथा रखरखाव की कमी उजागर हुई है। ट्रिपल इंजन की सरकार से लोगों की उम्मीदें अभी भी बनी हुई हैं।
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