भाजपा में नई टीम के पीछे की राजनीति और गुणा गणित क्या है?

नई दिल्ली। विपक्ष के साथ-साथ देश के युवाओं छात्रों के आक्रोश में आए उछाल, BJP के शीर्ष नेतृत्व के इस्तीफों की मांग और तेजी से बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच बीजेपी ने अपनी नई कार्यकारिणी घोषित कर दी है।

यह कार्यकारिणी उस वक्त घोषित की गई है, जब बीजेपी 2024 में अल्पमत के बावजूद सहयोगियों के दम पर सरकार बनाने के बाद एक बड़े चुनावी रणक्षेत्र में उतरने जा रही है। यूपी, उत्तराखंड समेत पांच राज्यों का चुनाव अगले कुछ माह में होना है।

यह बात चौंकाने वाली है मगर है कि बीजेपी ने अपनी नई कार्यकारिणी में तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को जगह दी है। वसुंधरा राजे के साथ साथ, तीरथ सिंह रावत, बिप्लब देव अब संगठन में है।

यकीनन तीरथ सिंह रावत और बिप्लब देब को कहीं न कहीं सेट किया जाना जरूरी था, लेकिन 2019 से पार्टी उपाध्यक्ष के पद पर बैठी वसुंधरा राजे की पारी को बरकरार रखने के पीछे भजनलाल शर्मा को बैलेंस करने की बात है।

राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व चेयरमैन रेखा शर्मा और आंध्र प्रदेश से सांसद डी. पुरंदेश्वरी भी उपाध्यक्ष हैं। पुरंदेश्वरी केंद्र में बीजेपी की पार्टनर टीडीपी के अध्यक्ष और आंध्र के सीएम चन्द्रबाबू नायडू की साली भी हैं।

स्मृति ईरानी की वापसी और यूपी के चुनाव

राष्ट्रीय महासचिव के पद पर सर्वाधिक चौंकाने वाली नियुक्ति स्मृति ईरानी की है जिन्हें लोकसभा में पराजित होने के बाद पुनः राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। यह जगजाहिर है कि यूपी के मुख्यमंत्री स्मृति ईरानी को ज्यादा पसंद नहीं करते हैं और वह केंद्र की ही पसंद हैं।

यूपी में बाबा योगी आदित्यनाथ समेत पूरी टीम स्मृति को सहजता से बतौर महासचिव स्वीकार करेगी इसकी
संभावना भी बेहद कम है।

यह बात भी समझ में आ गई है कि यूपी के रण में अपनी चालों को अंजाम देने के लिए ही शीर्ष नेतृत्व स्मृतिईरानी को बड़ी  जिम्मेदारी दी है। आने वाले समय में अगर स्मृति ईरानी को राज्यसभा में भेजा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

यह भी तय हो गया कि अगर यूपी में परिणाम बीजेपी के पक्ष में आए तो स्मृति ईरानी भी सीएम पद की स्वाभाविक दावेदार होंगी।

आईटी सेल चीफ अमित मालवीय बैरंग वापस

एक बड़ी खबर आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय को हटाया जाना है उनकी जगह छत्तीसगढ़ में सीजीएमएसी के अध्यक्ष दीपक महस्के को आईटी सेल प्रमुख बनाया गया है।

गौरतलब है कि हाल के दिनों में केंद्र सरकार के खिलाफ भड़के छात्र आंदोलन को अमित मालवीय का फेल्योर भी माना जा रहा है। राष्ट्रीय संगठन संयुक्त महासचिव के तौर पर सौदान सिंह की वापसी और बी एल संतोष की राष्ट्रीय संगठन महासचिव के तौर पर बने रहना भी बड़ी खबर है। सौदान सिंह की 2014 में मोदी सरकार के प्रथम प्रवेश में उनकी भूमिका अहम रही थी।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। महाराष्ट्र के बाद बिहार चुनाव में बड़ी भूमिका निभाने वाले विनोद तावड़े महासचिव पद पर रहेंगे।

क्यों चर्चा में हैं नए महासचिवों की कतार?

एक बड़ा परिवर्तन राममाधव की वापसी है। यकीनन यह RSS को सम्मान देने वाली बात है। हाल के दिनों में उन्होंने भाजपा नेताओं के साथ विदेश यात्रा करके ऑपरेशन सिंदूर के बाद की परिस्थितियों को भारत के पक्ष में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

राजस्थान से सांसद सतीश पूनिया महासचिव बनाए गए हैं।राजस्थान में वसुंधरा राजे गुट के साथ उनके मतभेद और खींचतान लंबे समय तक चर्चा का विषय रहे। इसके अलावा, एक बार रीट (REET) परीक्षा लीक मामले को लेकर दिए गए उनके तीखे राजनीतिक बयानों पर बड़ा विवाद हुआ था।

महासचिव पद के लिए मध्य प्रदेश से लोकसभा सांसद गजेंद्र पटेल ,यूपी से हरीश द्विवेदी और हरियाणा से राज्यसभा सांसद संजय भाटिया का नाम है। पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी को यूपी से महासचिव बनाने पर तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। हरीश द्विवेदी को भी योगी के विरोधी गुट का माना जाता है।

भाजपा या संघ किसकी कार्यकारिणी

यह बात साफ समझ में आती है कि बीजेपी की राष्ट्रीय टीम में अमित शाह और नरेंद्र मोदी की स्पष्ट छाप है बनिस्पत RSS के सीधे हस्तक्षेप के। यकीनन सौदान सिंह, गजेंद्र पटेल, राम माधव जैसे नाम बताते हैं कि RSS का पूरा ख्याल रखा गया है। आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सांसद संदीप पाठक को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है।

यह बात बताती है कि भाजपा को अब पार्टियों में टूट के बाद शामिल होने वालों को संगठन में जगह देने पर ऐतराज नहीं है। यकीनन स्मृति ईरानी जैसे नेताओं के शामिल होने के बाद कांग्रेस और सपा को अपनी धार तेज करनी होगीं,नए इक्वेशन बनाने होंगे।

एक जरूरी बात यह भी है कि संगठन में केवल 20 फीसद महिलाओं को जगह दी गई है यानि 65 नेताओं में केवल 13 महिलाएं। जब बात 50 फीसदी की हो रही हो तो 20 फीसद बेहद कम है।

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