तीन दिन के भीतर आए दो फैसलों ने देश में नागरिक आजादी और संवैधानिक मूल्यों के हक में बड़ा संदेश तो दिया ही है, इसने देश में न्याय की कसौटियों को लेकर भी विमर्श का एक नया मौका भी दिया है।
पहला मामला, लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से जुड़ा है, जिन पर से केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) हटाने का फैसला किया, जिससे करीब छह महीने बाद उनकी रिहाई संभव हो पाई है। दूसरा मामला हरियाणा के सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद से जुड़ा है, जिन्हें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सोशल मीडिया पर की गई एक टिप्पणी के कारण गिरफ्तार किया गया था, लेकिन हरियाणा की राज्य सरकार ने अब उन पर मुकदमा नहीं चलाने का निर्णय लिया है।
वाकई ये दोनों फैसले बहुत राहत देने वाले हैं। अभी यह पता नहीं है कि आखिर केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक पर से एनएसए हटाने का फैसला क्यों किया? अभी यह भी पता नहीं है कि उनकी पत्नी गीतांजली वांगचुक ने उनकी रिहाई को लेकर जो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका डाली थी, क्या उसके आधार पर किसी को जवाबदेह ठहराया जाएगा या नहीं।
सरकार की ओर से कहा गया है कि सोनम वांगचुक से एनएसए हटाने का फैसला लद्दाख में शांति और स्थिरता का माहौल मजबूत करने और सभी पक्षों के साथ रचनात्मक संवाद को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से लिया गया है। लेकिन सोनम वांगचुक तो रचनात्मक काम के लिए ही जाने जाते हैं और वह लद्दाख की स्वायत्तता और पर्यावरण बचाने के लिए ही संघर्ष कर रहे थे।
दरअसल ऐसे में यही सवाल उठता है कि क्या उनकी गिरफ्तारी किसी राजनीतिक हित को साधने के लिए की गई थी?
यही बात प्रोफेसर महमूदाबाद के बारे में हरियाणा सरकार से भी पूछी जा सकती है कि आखिर उसे यह फैसला करने में इतने महीने क्यों लग गए कि वैचारिक असहमति किसी मुकदमे का कारण नहीं बन सकती।
दरअसल नागरिक आजादी को लेकर हमारे यहां आज भी कोई स्पष्ट राय नहीं है और मुश्किल यह है कि न्यायपालिका से भी कोई स्पष्ट संदेश नहीं मिलता।
असल में सोनम वांगचुक और प्रोफेसर महमूदाबाद को लेकर आए फैसलों ने पांच बरस से भी अधिक समय से दिल्ली दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार छात्र नेता और स्कॉलर उमर खालिज तथा शरजील इमाम की याद दिला दी है। इन दोनों के मामले में सुनवाई तक शुरू नहीं हो सकी है और इसके बावजूद उन्हें जमानत तक नहीं मिल सकी है।
ये मामले हमारी संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरोधाभास को ही दिखाते हैं। निसंस्देह उमर खालिद या शरजील इमाम ही नहीं, बल्कि कोई भी यदि दंगों या अशांति फैलाने के लिए जिम्मेदार है तो उसे सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन जिस तरह से इनके मामले आगे बढ़ रहे हैं, वह हमारे संविधान में दी गई गारंटी से मेल नहीं खाते।
यह सवाल सरकार से भी किया जा सकता है कि क्या सोनम वांगचुक और प्रोफेसर महमूदाबाद की तरह उमर खालिद और शरजील इमाम के मामलों में उदारतापूर्वक विचार नहीं किया जा सकता।
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