नई दिल्ली। हरियाणा सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह उदारता दिखाते हुए अशोका यूनिवर्सिटी Ashoka University के फैकल्टी सदस्य अली खान महमूदाबाद के खिलाफ अभियोजन की अनुमति नहीं देगी। यह फैसला उनके द्वारा पिछले साल भारत की सीमा-पार सैन्य कार्रवाई ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर किए गए कुछ सोशल मीडिया कमेंट्स के संबंध में लिया गया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जोयमलया बागची की बेंच को आज सुबह इसकी जानकारी दी गई।
हरियाणा सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कहा कि 3 मार्च को महमूदाबाद के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई न करने का फैसला लिया गया।उन्होंने कहा, “एक बार की उदारता के तौर पर, अभियोजन की अनुमति अस्वीकार कर दी गई है। यह अध्याय बंद हो गया है। अब उन्हें चेतावनी दी जा सकती है कि भविष्य में ऐसा दोबारा न हो। अस्वीकृति आदेश 3 मार्च 2026 का है।”महमूदाबाद की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने जवाब दिया, “हम आभारी हैं।”
कोर्ट ने महमूदाबाद के लिए भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की चेतावनी भी दी।CJI कांत ने कहा, “कभी-कभी पंक्तियों के बीच लिखना ज्यादा समस्याएं पैदा करता है। कभी-कभी स्थिति इतनी संवेदनशील होती है कि हमें सभी को सावधान रहना पड़ता है। याचिकाकर्ता एक बहुत विद्वान व्यक्ति होने के नाते भविष्य में विवेकपूर्ण तरीके से कार्य करेंगे।”
कोर्ट महमूदाबाद की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उनके फेसबुक पोस्ट्स के आधार पर दर्ज दो FIR को रद्द करने की मांग की थी। ऑपरेशन सिंदूर भारत की पाकिस्तान के खिलाफ सीमा-पार सैन्य प्रतिक्रिया थी, जो अप्रैल 22 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़ती सीमा-पार तनाव के बीच हुई थी।
अपने फेसबुक पोस्ट में महमूदाबाद ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की आलोचना की, युद्ध की निंदा की और कहा कि भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर पर भारत की प्रेस ब्रीफिंग की थी को मिली प्रशंसा जमीनी स्तर पर भी दिखनी चाहिए।इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत में दक्षिणपंथी समर्थकों को भी भीड़ द्वारा लिंचिंग के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।ऐसे बयानों के आधार पर उनके खिलाफ दो FIR दर्ज की गईं।
पहली FIR योगेश जठेरी की शिकायत पर दर्ज की गई, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196 (घृणा फैलाना), 197 (राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक आरोप), 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालना) और 299 (दोषपूर्ण हत्या) के तहत आरोप लगाए गए।दूसरी FIR हरियाणा महिला आयोग की चेयरपर्सन रेणु भाटिया की शिकायत पर दर्ज हुई, जिसमें BNS की धारा 353 (सार्वजनिक उपद्रव), 79 (महिला की मर्यादा का अपमान) और 152 के तहत आरोप थे।
इसके बाद हरियाणा पुलिस ने महमूदाबाद को गिरफ्तार किया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया।सुप्रीम कोर्ट में राहत के लिए याचिका दाखिल करने के बाद मामले की जांच को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) को सौंप दिया गया जिसका गठन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ था।सुप्रीम कोर्ट ने 21 मई 2025 को उन्हें विभिन्न शर्तों के साथ अंतरिम जमानत दी थी।अगस्त 2025 में कोर्ट ने उनके खिलाफ ट्रायल पर भी रोक लगा दी।











