US से लेकर UN तक ने क्यों कहा: भारत में अल्पसंख्यक खतरे में!

USCIRF Report

अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की ताज़ा रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को काफी धक्का पहुँचाया है। यह लगातार सातवाँ साल है जब इस आयोग ने अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को आधार बनाते हुए अमेरिकी गृह विभाग से भारत को सीपीसी (विशेष चिंता वाले देश) की लिस्ट में शामिल करने की सिफ़ारिश की है। वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ के मनमानी हिरासतों को लेकर बने कार्यकारी समूह ने उमर ख़ालिद की हिरासत को अवैध बताकर मोदी सरकार की नियत पर सवाल उठा दिया है।

यह सामान्य बात नहीं है कि USCIRF रिपोर्ट में आरएसएस के साथ-साथ भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी RAW (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) पर प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश हुई है। यह उस दौर में हुआ है जब प्रधानमंत्री मोदी, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘प्रिय मित्र’ बताते और अमेरिका के साथ रिश्तों को नए दौर में ले जाने का दावा करते नहीं थकते। सरकार ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया है लेकिन आईना तोड़ने से चेहरे पर लगी कालिख़ साफ़ कैसे होगी?

वैश्विक स्तर पर भारत के हितों की रक्षा करने के लिए ज़िम्मेदार RAW पर पाबंदी की बात किसी मित्र देश की ओर से हो, यह एक बड़ी कूटनीतिक विफलता ही कही जायेगी। भारत सरकार ने स्वाभाविक रूप से इस रिपोर्ट को ख़ारिज किया है। लेकिन जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल आरएसएस का बचाव करते हुए कहते हैं कि यूएससीआईआरएफ़ को “अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़ और हमलों और भारतीय प्रवासी पर बढ़ती असहिष्णुता व धमकियों पर गंभीरता से सोचना चाहिए”

तो सवाल उठता है कि क्या इस पलटवार से भारत में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों की हक़ीक़त छिप जायेगी। अगर अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर हमले की चिंता की जानी चाहिए तो भारत में मस्जिदों और चर्चों पर हमले की चिंता कौन करेगा? इस ज़िम्मेदारी में नाकाम रहने के आरोप से भारत सरकार कैसे बरी हो सकती है?

यह रिपोर्ट अमेरिका की एक स्वतंत्र सरकारी सलाहकार संस्था द्वारा बनायी जाती है। इसका मकसद दुनिया भर में धार्मिक आजादी की निगरानी करना है। सीपीसी का मतलब है ‘कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न।’ अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता कानून (IRFA) 1998 के तहत ये वो देश हैं जहाँ सरकार खुद धार्मिक आजादी पर हमला करती है या फिर ऐसा होने देती है। जैसे टॉर्चर, बिना मुकदमे लंबी जेल या जीवन की सुरक्षा छीनना।

अगर अमेरिकी सरकार सीपीसी लिस्ट में डालने की उसकी सिफ़ारिशें मान ले तो भारत को कई तरह के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। आयोग ने अमेरिकी सरकार से माँग की है कि वह USCIRF को भारत में जाकर धार्मिक स्थिति का जायजा लेने की अनुमति दे। सुरक्षा सहायता और व्यापार नीतियों को धार्मिक आजादी से जोड़ें। हथियार निर्यात नियंत्रण कानून लागू करके भारत को हथियार बेचना रोकें। अमेरिकी कांग्रेस ट्रांसनेशनल रिप्रेशन रिपोर्टिंग एक्ट पास करे, ताकि अमेरिका में अल्पसंख्यकों पर भारतीय सरकार के दबाव की रिपोर्ट बने।

चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विश्व गुरु होने के तमाम दावों के बीच ऐसी रिपोर्ट का बार-बार आना बताता है कि दुनिया भारत में आये बदलावों को गंभीरता से देख रही है। रिपोर्ट में भारत में हाल में बनाये या संशोधित किये गये धर्मांतरण निषेध क़ानून, गौ-हत्या कानून, वक्फ बिल 2025, विदेशी योगदान विनियमन कानून (FCRA) और UAPA के इस्तेमाल को लेकर तमाम उदाहरण दिये गये हैं जिनसे मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों पर दबाव बढ़ा।

आयोग ने पहली बार अपनी रिपोर्ट में आरएसएस का सीधे नाम लिया है और कहा है कि भारत में सरकारी संरक्षण में अल्पसंख्यों पर बढ़ते हमलों के पीछे यही संगठन है। बीजेपी के ज़रिए भारत की सत्ता पर क़ाबिज़ आरएसएस धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए ज़िम्मेदार है।

रिपोर्ट कहती है कि 2025 में ‘हिंदू नेशनलिस्ट मोब्स’ ने मुसलमानों और ईसाइयों पर हमले किये और पुलिस ने अक्सर हस्तक्षेप नहीं किया। इस सिलसिले में उसने मार्च 2025 में महाराष्ट्र में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने औरंगजेब की कब्र हटाने की मांग को लेकर हुए विवाद, जून में ओडिशा में भीड़ द्वारा हिंदू बनने से इंकार करने वाले 20 ईसाई परिवारों पर हमला किये जाने और उत्तर प्रदेश में उग्र हिंदुत्ववादियों द्वारा एक मुस्लिम रेस्टोरेंट वर्कर की गोली मारकर हत्या करने का उदाहरण दिया है।

अमेरिका के लिए भारत का रणनीतिक महत्व है, लेकिन दुनिया में तेज़ी से बदलते समीकरणों को देखते हुए कब भारत पर दबाव बनाने के लिए ऐसी रिपोर्टों का इस्तेमाल हो, कहा नहीं जा सकता। वैसे भी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से लेकर असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा जिस तरह धार्मिक घृणा से भरे भाषण देने में सुर्खियाँ बटोर रहे हैं और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘बुलडोज़र न्याय’ की चर्चा दुनिया भर में हो रही है, उसके बाद विदेश मंत्रालय के अधिकारी भारत की छवि बचाने के लिए कहाँ से और कितने तर्क जुटा सकते हैं!

मसला सिर्फ़ अमेरिका का नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ में भी भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न पर चर्चा हो रही है। मनमानी हिरासत पर संयुक्त राष्ट्र के कार्यकारी समूह (UN Working Group on Arbitrary Detention-WGAD) ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर ख़ालिद की हिरासत को अवैध बताते हुए गंभीर चिंता जतायी है। उमर ख़ालिद बिना ज़मानत पाँच साल से जेल में हैं।

UNWGAD ने उमर ख़ालिद की हिरासत को लेकर चार अलग-अलग श्रेणियों में मनमानी पायी है। कार्यकारी समूह ने पाया है कि उमर ख़ालिद की हिरासत का कोई क़ानूनी आधार नहीं है। अदालतों ने निरंतर हिरासत में रखने की ज़रूरत या औचित्य का सही मूल्यांकन नहीं किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने उमर ख़ालिद की ज़मानत याचिका पर नौ महीने से ज़्यादा समय तक सुनवाई नहीं की। सुनवाई 12 से ज़्यादा बार स्थगित हुई। खालिद को सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा, संगठन बनाने और सार्वजनिक मामलों में भागीदारी के शांतिपूर्ण प्रयोग के लिए हिरासत में रखा गया। सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि उनकी वकालत से राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को कोई वास्तविक खतरा था।

UNWGAD ने कहा है कि उमर के मामले में निष्पक्ष सुनवाई के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। गिरफ्तारी के तुरंत बाद उन्हें कानूनी सलाहकार से मिलने से रोका गया। पांच साल से ज़्यादा समय बीत गया लेकिन ट्रायल शुरू नहीं हुआ। उन्हें दोषसिद्ध कैदियों के साथ रखा गया, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन है। उन्हें निर्दोष माने जाने का अधिकार भी नहीं दिया गया। यह सीधे-सीधे भेदभाव का मामला है।

उमर ख़ालिद को उनकी राजनीतिक राय और मुस्लिम अल्पसंख्यक अधिकारों पर काम करने वाले मानवाधिकार रक्षक होने के आधार पर निशाना बनाया गया। यह UAPA के दुरुपयोग का एक दस्तावेजित पैटर्न है, जो राजनीतिक असहमति करने वालों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस्तेमाल होता है।

उमर ख़ालिद को वैश्विक स्तर पर ‘बंदी ऑफ कॉन्सेंस’ (विवेक का कैदी) के रूप में जाना जाता है। कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और इंटरनेशनल कमिटी ऑफ ज्यूरिस्ट्स ने उनकी रिहाई की मांग की है। लेकिन इस साल की शुरुआत में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने खालिद को ज़मानत देने से इनकार कर दिया और एक साल तक ज़मानत माँगने का अधिकार भी छीन लिया।

यह सोचने की बात है जब भारतीय मीडिया दुनिया भर में मोदी सरकार का डंका बजने का शोर मचा रहा है तब अमेरिका का धार्मिक स्वतंत्रता आयोग और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाएँ उसे मानवाधिकारों को कुचलने का अपराधी बता रही हैं। यह कोई तकनीकी मसला नहीं है। किसी देश के सभ्य और विकसित होने की कसौटी वहाँ के अल्पसंख्यकों की हालत भी है। और इस कसौटी पर भारत बीते एक दशक से बुरी तरह विफल हुआ है, यह कोई छिपी बात नहीं है। इससे इंकार करना एक शुतुरमुर्गी हरक़त ही होगी।

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