सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े महत्त्वपूर्ण मामले में नौ जजों की संविधान पीठ में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेहद परेशान करने वाली दलील दी है कि, जनहित याचिकाओं (पीआईएल) को खत्म कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि अब इनका औचित्य नहीं रह गया है। सच कहा जाए, तो उनकी इस दलील से हैरत इसलिए नहीं हुई, क्योंकि मोदी सरकार लगातार सत्ता के केंद्रीकरण की जिस राह पर है, वहां पीआईएल को एक रोड़े की तरह ही देखा जा रहा है।
तुषार मेहता की इस दलील को प्रधानमंत्री मोदी की पांच साल पहले 2021 में संसद के भीतर की गई इस चर्चित टिप्पणी से जोड़कर देखना चाहिए, जब उन्होंने कृषि कानूनों के विरोध में देश की राजधानी दिल्ली में डेरा डाले हजारों किसानों के आंदोलन के संदर्भ में आंदोलनकारियों का मजाक उड़ाते हुए उन्हें ‘आंदोलनजीवी’ करार दिया था!
मोदी सरकार की मुश्किल यह है कि वह असहमति या विरोध की आवाजों के साथ ही जायज मुद्दों को लेकर उठने वाली स्वतंत्र आवाजों से भी असहज हो जाती है।
सबरीमाला के मामले में सुनवाई के दौरान यह सुझाव सरकार की ओर से दिया गया है और इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, मगर इससे सरकार के इरादे का तो पता चलता ही है।
जैसा कि नाम से ही जाहिर है जनहित याचिकाओं का जन्म जनता से सीधे जुड़े सरोकारों से ही हुआ है और इनके जरिये आए फैसलों की लंबी फेहरिस्त है। जिनमें 1970 के दशक के मध्य में विचाराधीन बंदियों की रिहाई से लेकर बाल विवाह को रोकने वाला कानून, और कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने से संबंधित विशाखा गाइडलाइन जैसी परिणितियां शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट की 1988 की गाइडलाइन को ही देखें तो इसके दायरे में बालश्रमिक, पुलिस हिरासत में उत्पीड़न और मौत और दंगा पीड़ितों को राहत से जड़े मामले शामिल हैं।
वास्तव में पीआईएल वंचितों और उपेक्षित लोगों के लिए एक संवैधानिक हथियार की तरह है। दरअसल सरकार को दिक्कत उन संगठनों से अधिक लगती है, जो जनहित की आवाजें उठाते हैं और उनसे जुड़े मुद्दों को जनहित याचिकाओं के जरिये अदालत तक ले जाते हैं।
बेशक जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग के मामले भी सामने आए हैं और कई बार अदालत ने जनहित याचिकाओं को लेकर याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार भी लगाई है। खुद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा भी है कि अदालतें अब सतर्क हो गई हैं और सोच विचार कर याचिकाएं स्वीकार करती हैं।
तुषार मेहता ने तर्क दिया है कि ई-फाइलिंग ने अदालतों तक लोगों की पहुंच आसान कर दी है, लिहाजा पीआईएल की जरूरत नहीं है। क्या यह बताने की जरूरत है कि देश में आज भी करोड़ों वंचित लोगों के लिए अदालतों तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है।
पीआईएल की आड़ में निहित स्वार्थ के इरादों को समझा जा सकता है। इसके दुरुपयोग पर अंकुश लगना ही चाहिए, लेकिन पीआईएल पर पूरी तरह रोक की चाह दरअसल खुद को जवाबदेही और सवालों से बचाने की कवायद ही ज्यादा लगती है।
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