अमेरिकी थिंक टैंक की रिपोर्ट में दावा : GDP ग्रोथ को लेकर दावे गलत, दो दशक तक आकलन करने में भारत सरकार से चूक

Peterson Institute Research on Indian GDP

नई दिल्ली। भारत सरकार के आधिकारिक GDP आंकड़ों में पिछले 20 सालों यानी 2005 से 2025 तक की सालाना विकास दर में काफी गलतियां हुई हैं। यह दावा किया है अमेरिका के थिंक टैंक पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स (PIIE) ने।  PIIE के ताजा रिसर्च पेपर में बताया गया है कि GDP ग्रोथ को औसत से किस तरह कम आंका गया है।

तीन प्रमुख अर्थशास्त्री अभिषेक आनंद, जोश फेलमैन और अरविंद सुब्रमण्यम ने दावा किया है कि 2005 से 2011 के बूम पीरियड में GDP ग्रोथ को औसतन 1 से 1.5 प्रतिशत पॉइंट कम आंका गया। 2012 से 2023 तक की अवधि में ग्रोथ को 1.5 से 2 प्रतिशत पॉइंट ज्यादा आंका गया था।

असल में 2011 से 2023 तक अर्थव्यवस्था औसतन 4 से 4.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी, जबकि आधिकारिक आंकड़े 6 प्रतिशत दिखाते हैं। यानी केद्र सरकार जिस  स्थिर विकास दर का दावा करती आई है वह गलत है।

इस रिसर्च पेपर में  2000 के दशक के शुरू में तेज बूम, फिर ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस, ट्विन बैलेंस शीट समस्या, नोटबंदी, GST और कोविड के बाद मंदी का हवाला दिया गया है, जिसने देश की विकास दर को प्रभावित किया है।

क्यों हुई गलती?

PIIE ने विकास दर के आकलन में हुई गलतियों का भी जिक्र किया है। जिसमें बताया गया है कि  देश का 44 प्रतिशत ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (GVA) अनौपचारिक (अनऑर्गनाइज्ड) क्षेत्र से आता है। लेकिन आंकड़े बनाने में बड़ी कंपनियों के डेटा को ही सही मान लिया गया। 2016 की नोटबंदी , 2017 में GST और 2019 की कोविड महामारी ने अनौपचारिक क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, लेकिन आंकड़ों में यह दिखाया नहीं गया।

ज्यादातर सेक्टरों में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) का इस्तेमाल किया गया, जो मुख्य रूप से तेल जैसी कमोडिटी की कीमतों पर निर्भर है। 2011 के बाद तेल की कीमतें गिरने से डिफ्लेटर कम हो गया, जिससे रीयल GDP को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि निर्यात, बैंक क्रेडिट, बिजली खपत, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, कॉर्पोरेट सेल्स और टैक्स रेवेन्यू जैसे सभी बड़े संकेतक 2005-11 में तेजी दिखाते हैं और उसके बाद मंदी, लेकिन GDP के आंकड़ों में लगातार 6-7 प्रतिशत की दर से स्थिर विकास दर का दावा भारत सरकार की ओर से किया जाता रहा।

क्या प्रभाव पड़ा?

रिसर्च में कहा गया है कि 2025 तक वास्‍तविक  GDP का स्तर 22 प्रतिशत और रीयल खपत 31 प्रतिशत ज्यादा दिखाई गई। जब अर्थव्यवस्था कमजोर थी तब भी आंकड़े मजबूत दिखाए गए जिससे मौद्रिक नीति, फिस्कल नीति और सुधारों में देरी हुई। निजी निवेश कमजोर हुआ। रोजगार नहीं बढ़ा, FDI घटी।

यह सब कुछ इसलिए हुआ क्योंकि ग्रोथ वाकई उतनी तेज नहीं थी। फरवरी 2026 में सरकार ने व्यापक चर्चा के बाद GDP मेथडोलॉजी में बदलाव किए हैं। रिपोर्ट के लेखक मानते हैं कि यह कदम सही दिशा में है और नए आंकड़ों को बेंचमार्क देने के लिए यह पेपर उपयोगी होगा।

क्‍या कह रहे हैं अर्थशस्‍त्री

‘2005 से 2011 के बीच विश्वव्यापी मंदी का समय था लेकिन तत्कालीन सरकार ने आम लोगों के जेब में पैसे डाले, भले वह मनरेगा हो या फिर सरकारी कर्मचारियों को दिए जाने वाले एरियर हो। इसलिए विकास दर ठीक ठाक रही। लेकिन बाद के समय में विकास दर और जीडीपी ग्रोथ के गिरने की सबसे बड़ी  वजह डीमोनिटाइजेशन रहा लोगों के पास पैसा न रहा डिमांड कम हुई, उसके बाद रही सही कसर कोविड ने पूरी कर दी। सरकारी आंकड़ों में गड़बड़ी स्वाभाविक है लेकिन इस पूरे दौर की आर्थिक स्थिति को यूं ही देखने की जरूरत है।‘
प्रो. एनएमपी वर्मा, लखनऊ विश्विद्यालय, इंडियन इकोनॉमिस्ट एसोसिएशन फोरम

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