खनिज और वन संपदा से समृद्ध छत्तीसगढ़ के दो जिलों रायगढ़ और खैरागढ़ में हजारों ग्रामीणों के विरोध की आवाजें भले सुर्खियां नहीं बन पा रही हैं, लेकिन ये उस आसन्न खतरे का संकेत है, जिसका असर लाखों लोगों की जिंदगियों पर पड़ सकता है।
हाल यह है कि प्रशासनिक अमला खुद उन निजी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछा रहा है, जिन्होंने इस प्रदेश के जल, जंगल और जमीन को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
राज्य के औद्योगिक जिले रायगढ़ के तमनार स्थित गारे पलमा कोल ब्लॉक सेक्टर एक में 14 गांवों के ग्रामीणों के भारी विरोध के बावजूद मनमाने ढंग से प्रशासन ने जनसुनवाई की खानापूर्ति कर ली है!
यही हाल राज्य के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले में प्रस्तावित एक सीमेंट फैक्टरी का है, आसपास के चालीस गांव के हजारों लोग जिसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन भारी विरोध के बावजूद प्रशासन ने वहां 11 दिसंबर को जनसुनवाई की तैयारी कर ली है।
दरअसल जिस सुनियोजित तरीके से जनसुनवाई की आड़ लेकर इन कार्रवाइयों को कानूनी जामा पहनाया जा रहा है, वह कहीं अधिक चिंता का कारण होना चाहिए।
जहां तक तमनार क्षेत्र की बात है, तो वहां नौ कोयला खदानें हैं, जिनमें से अधिकांश शुरू हो चुकी हैं। रायगढ़ के इलाके में लोग पहले ही फैक्टरियों के प्रदूषण से परेशान हैं, और उनका विरोध इसी बात को लेकर है कि जिंदल पावर लिमिटेड की ताजा खदान से उनकी जिंदगियां खतरे में पड़ जाएंगी। इस इलाके में 75 एकड़ जंगल का सफाया किया जा चुका है।
दूसरी ओर खैरागढ़ जिले के जिस इलाके में प्रस्तावित सीमेंट फैक्टरी का किसान-ग्रामीण विरोध कर रहे हैं, वह भी प्राकृतिक संपदा से भरपूर है। यहां 39 गांवो के खदान क्षेत्र के लोग पहले ही लिखित में विरोध दर्ज कर चुके हैं, इसके बावजूद राज्य की भाजपा सरकार जनसुनवाई करवाने पर आमादा है।
वास्तव में मनमाने ढंग से किए जा रहे जमीन के अधिग्रहण ने 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून की मूल भावनाओं को भी ताक पर रख दिया है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश से लेकर गोवा तक कैसी तबाही मचाई है, यहां तक कि छत्तीसगढ़ भी इससे अछुता नहीं है।
पारदर्शिता के बिना और जन को साथ लिए बिना की जाने वाली ऐसी हर जन सुनवाई सरकार की नीयत और नीति दोनों पर सवाल खड़े करती है।











