महिला आरक्षण की आड़ में दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक वज़न कम करने के ‘परिसीमन दाँव’ का विरोध कर रहे डीएमके सांसद हालिया विशेष सत्र में यूँ ही नहीं काली कमीज़ पहनकर संसद पहुँचे थे। इसके पीछे तमिलनाडु में बेहद प्रभावी रहे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ और ‘ब्लैक शर्ट मूवमेंट’ का संदर्भ था। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने जब इसकी तुलना ‘कालेटीके’ से की तो जवाब में डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने याद दिलाया कि यह ‘पेरियार का रंग है जिन्होंने हमें लड़ना सिखाया।’
डिलिमिटेशन (परिसीमन) विधेयक की नाकामी पर खुला झूठ बोलते हुए इसे ‘महिला आरक्षण विधेयक’ गिरना बताने वाले मीडिया संस्थानों से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वे कनिमोझी के जवाब के ऐतिहासिक संदर्भों से लोगों को परिचित करायेंगे या मोदी के ‘कालेटीके’ में छिपे सांस्कृतिक अपमान के खतरे के प्रति जागरूक करेंगे, लेकिन जो लोग भी उत्तर-दक्षिण की एकता को लेकर चिंतित हैं, उन्हें इस प्रकरण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
संसद में बहसें के दौरान पीएम मोदी ने डीएमके सांसदों को लक्ष्य करके कहा था कि “इन्होंने बिल पर कालाटीका लगा दिया है, बुरी नजर से बचाने के लिए।” यह ‘काले रंग’ या दक्षिण के ‘काले’ लोगों के प्रति वही उत्तर भारतीय दृष्टि है जिसे ई.वी. रामास्वामी पेरियार आर्यों की आक्रामकता बताते थे। यह उत्तर और दक्षिण की दो अलग-अलग संस्कृतियों, दो अलग-अलग सोच और दो अलग-अलग भारत की कल्पनाओं के बीच की टकराहट की याद दिलाता है। ‘आयडिया ऑफ़ इंडिया’ किसी एक दृष्टिकोण को अधिक महत्व देने से नहीं बनता बल्कि इसकी सफलता की कसौटी है कि दोनों ही दृष्टिकोणों को बराबर सम्मान हासिल हो। पीएम मोदी की भाषा बताती है कि वे दक्षिण के इतिहास और उनकी भावनाओं को समझने की स्थिति में नहीं हैं और इसके स्पष्ट वैचारिक कारण हैं।
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान 1915 में दक्षिण अफ़्रीका से महात्मा गाँधी की वापसी ने कांग्रेस के नेतृत्व में आमजन को जोड़ने के सिलसिले को तेज़ कर दिया था। लेकिन साथ ही यह सवाल भी तेज़ होने लगा था कि आज़ाद भारत में सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाएँ किस तरह चलेंगी। 1916 में ही मद्रास प्रांत में जस्टिस पार्टी की स्थापना हो गयी थी जो वर्ण व्यवस्था को चुनौती देते हुए समता मूलक समाज की अनिवार्यता पर ज़ोर दे रही थी। उसने ‘ब्राह्मणवाद विरोधी घोषणापत्र’ जारी किया था जिसमें मद्रास प्रेसिडेंसी में ब्राह्मणों की नौकरियों में अत्यधिक प्रतिनिधित्व (लगभग 70% उच्च पदों पर) की आलोचना की गई। पार्टी ने गैर-ब्राह्मणों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की माँग की थी। यह आंदोलन द्रविड़ आंदोलन की राजनीतिक नींव बना।
इसमें और गति आयी जब ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ चला जो उत्तर के तमाम धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों को अपनी द्रविड़ पहचान के लिए अपमानजनक मानता था। ई.वी. रामासामी ने 1925 में आत्मसम्मान आंदोलन से जुड़कर इसे व्यापकता दी। चूँकि ‘गौर वर्ण और उन्नत नासिका’ आर्यों की पहचान थी और तमाम पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों को ‘काले रंग और मोटी नाक’ वाला बताया गया है तो आत्मसम्मान आंदोलन ने काले रंग को अपना रंग घोषित कर दिया। इसी के साथ 1945 में “ब्लैक शर्ट मूवमेंट” शुरू किया गया। इसमें काला रंग शोक और विरोध का प्रतीक था— ब्रिटिश प्रतिबंध के बाद भी इस आंदोलन के सदस्य काली शर्ट पहनकर प्रदर्शन करते थे। इसका मक़सद था जाति-मुक्त और तर्कशील समाज बनाना।
इस आत्मसम्मान आंदोलन के गर्भ से ही द्रविड़ कड़गम जैसी पार्टी निकली जो भविष्य में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बनी। इसके पीछे वैचारिक प्रेरणा ई.वी. रामास्वामी की थी जो ‘पेरियार’ यानी महान व्यक्ति कहलाये। पेरियार ने सनातन धर्म को “ब्राह्मण शोषण का औजार” बताया। उत्तर में सनातन का अर्थ हिंदू धर्म से लगाया जाता है लेकिन दक्षिण में इसका मतलब “अंधविश्वास और शोषण” था। ख़ासतौर पर शूद्र समाज को उनके सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने का ऐतिहासिक षड्यंत्र। पेरियार ने ‘सच्ची रामायण’ लिखी और राम को आर्य आक्रमण के प्रतीक बतौर पेश किया। उत्तर में होने वाले रावण दहन के जवाब में राम का पुतला फूँका। तमाम देव मूर्तियों को तोड़ा और ‘ईश्वर नहीं है’ जैसी खुली घोषणा की।
आरएसएस और बीजेपी ने जिन धार्मिक प्रतीकों के सहारे उत्तर में ध्रुवीकरण करके सत्ता हासिल की है, वह दक्षिण में इसलिए असर नहीं डाल पाता। ‘हिंदू-हिंदू-हिंदुस्तान’ का नारा विंध्य पार करते ही अपना ताप खो देता है। इस पर दिया जाने वाला ज़ोर भीषण प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है। 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन को भूलना नहीं चाहिए। तब तमाम लोगों ने ‘हिंदी थोपे जाने’ के ख़िलाफ़ आत्मदाह किया था और सैकड़ों लोग मारे गये थे। चूँकि तत्कालीन नेतृत्व को राष्ट्रीय एकता ‘एक भाषा’ के सिद्धांत से ज़्यादा प्यारी थी इसलिए 1965 से अंग्रेज़ी को हटाकर हिंदी को एक मात्र राजभाषा बनाने का संकल्प हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
इस आंदोलन को जनता का व्यापक समर्थन था और है। यही वजह है कि 1967 के बाद से तमिलनाडु में हमेशा द्रविड़ पार्टियाँ ही सरकार बनाती आयी हैं। दिलचस्प बात तो ये है कि उत्तर में सनातन की योद्धा बनने वाली बीजेपी एआईएडीएमके के गठबंधन में 2026 का विधानसभा चुनाव लड़ते वक़्त सनातन का नाम ही नहीं ले रही है। यही नहीं पिछले चुनाव में सनातन का झंडा आक्रामक ढंग से फहराने वाले अपने नेता के. अन्नामलाई को उसने इस बार टिकट भी नहीं दिया है।
यह भी याद रखना चाहिए कि 1962 तक खुलकर ‘द्रविड़ नाडु’ यानी द्रविड़ों के अलग देश की बात होती थी जिसके नक़्शे में तमिलनाडु ही नहीं लगभग पूरा दक्षिण भारत ही शामिल किया गया था। यह कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व का संविधान में दर्ज संघीय ढाँचे के प्रति प्रतिबद्धता का आश्वासन ही था जिसने दक्षिण के लोगों के मन से तमाम आशंकाओं को निकाला और वे मुख्यधारा का हिस्सा बने। लेकिन मोदी सरकार को शायद संघीय ढाँचे के तहत राज्यों के अधिकारों के सम्मान से दिक़्क़त है और यही वजह है कि परिसीमन के बहाने दक्षिण के राज्यों के राजनीतिक वज़न को कम करने की कोशिश की गयी।
वैसे इसके पीछे आरएसएस की पूरी वैचारिकी काम कर रही है जिसने भारत के संघीय स्वरूप को कभी स्वीकार नहीं किया। जनसंघ के ज़माने में यह बार-बार कहा जाता था कि उसकी सरकार बनी तो संविधान में दर्ज इस वाक्य को बदलाजायेगा कि ‘भारत राज्यों का संघ है।’ कहा गया कि भारत को ‘संघ-राज्य’ की जगह एकात्मक राज्य (unitary state) बनाया जायेगा।
आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ में साफ लिखा है — “संघीय ढांचा राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा है। हमें एक देश, एक राज्य, एक विधानसभा और एक कार्यपालिका चाहिए।” आरएसएस में विचार-पुरुष का दर्जा रखने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी भारत को ‘यूनियन ऑफ़ स्टेट्स’ बताने वाले संविधान के पहले पैराग्राफ को “हास्यास्पद” बताया था। उन्होंने कहा था कि “यह समझना हास्यास्पद है कि बिहार माता, बंगाल माता, तमिल माता या पंजाब माता से मिलकर भारत माता बनती है। यह सब भारत माता के अंग हो सकते हैं, भारत माता नहीं।” उनका भी साफ़ मानना था कि एक मज़बूत केंद्र के हाथ ही देश होना चाहिए।
दक्षिण की विकास यात्रा तर्कशीलता पर टिकी है। वह शिक्षा से लेकर आमदनी या मानव विकास सूचकांक की हर कसौटी पर उत्तर के राज्यों से बेहद आगे है। उत्तरी राज्य ग़रीबी, भुखमरी और अशिक्षा का शिकार हैं लेकिन वहाँ की राजनीति में ग़रीबी या स्कूलों का बंद होना मुद्दा नहीं है। पूरा उत्तर मंदिर, प्रवचन और भंडारों से सराबोर है जो हिंदू राष्ट्र का सपना दिखा रही बीजेपी को भक्त मुहैय्या कराते हैं। यही उसकी राजनीतिक ताक़त है। कुछ साल पहले केरल में बीजेपी के विधायक रहे ओ. राजगोपाल ने स्वीकार किया था कि वहाँ नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा लोग शिक्षित हैं, वे सवाल करते हैं, इसलिए बीजेपी सफल नहीं हो पाती।
भारत को एक राष्ट्र के रूप में मज़बूत बनाये रखने के लिए ज़रूरी है कि आर्य-द्रविड़ जैसे नितांत विरोधी विचारों को बराबर का सम्मान दिया जाये। उत्तर के लोगों को दक्षिण के लोगों के दृष्टिकोण को समझना होगा। यह जानना होगा कि जिस सनातन को वे धर्म बताते हैं, उसका नाम आते ही दक्षिण के लोग विचलित क्यों हो जाते हैं। उन्हें उस इतिहास से परिचित होना पड़ेगा जब सनातन के नाम पर मंदिरों में शूद्रों को प्रवेश नहीं करने दिया जाता था या शूद्र स्त्री को स्तन ढँकने के लिए टैक्स देना पड़ता था जबकि त्रावणकोर का राजा खुद को विष्णु का अवतार बताता था।
अगर पीएम मोदी राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो उन्हें पेरियार के काले परचम में छिपे इतिहास को कालेटीके में सीमित नहीं करना चाहिए। यह भारत के लिए ज़रूरी है कि अपनी निजी धार्मिक आस्थाओं को रखते हुए प्रधानमंत्री त्रिचरावल्ली में मौजूद पेरियार की उस मूर्ति पर भी माल्यार्पण करें जिसके नीचे लिखा है-
ईश्वर नहीं है, ईश्वर नहीं है, ईश्वर बिल्कुल नहीं है।
जिसने ईश्वर की कल्पना/रचना की, वह मूर्ख है।
जो ईश्वर का प्रचार करता है, वह दुष्ट है।
जो ईश्वर की पूजा करता है, वह बर्बर है।











