लेंस डेस्क। मध्य पूर्व में जारी तनाव, अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष और हॉर्मुज स्ट्रेट की अनिश्चितता के कारण भारत एक बार फिर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। देश अपनी 75 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ONGC की नींव कैसे पड़ी?
अंग्रेजों से आजादी के बाद भारत तेल और गैस के क्षेत्र में पूरी तरह विदेशी कंपनियों पर निर्भर था। ब्रिटिश काल में असम ऑयल कंपनी और एटॉक ऑयल कंपनी जैसे कुछ ही प्लेयर सक्रिय थे। मल्टीनेशनल कंपनियों की धारणा थी कि भारत में तेल-गैस प्राकृतिक रूप से नहीं मिलेगा।
जब नेहरू ने रखी नींव

लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस धारणा को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने 1955 में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) के अंतर्गत ऑयल एंड गैस डिवीजन का गठन किया। फिर 14 अगस्त 1956 को ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन (ONGC) की स्थापना की गई। नेहरू ने केशव देव मालवीय पर भरोसा जताया, जो बाद में देश के पेट्रोलियम मंत्री बने।

नेहरू की समाजवादी सोच कल्याणकारी राज्य की स्थापना पर आधारित थी। उन्होंने ऊर्जा को निजी मुनाफे का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक विकास का आधार बनाने का फैसला किया। ONGC को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बनाया गया, ताकि देश की ऊर्जा जरूरतें आयात पर निर्भर न रहें। 1956 में ONGC को कच्चे तेल की खोज, विकास और उत्पादन का पूरा अधिकार सौंपा गया।
यह नेहरू की आत्मनिर्भरता की नीति का हिस्सा था, ठीक वैसे ही जैसे भाखड़ा-नांगल बांध या स्टील प्लांट्स। ONGC को निर्देश दिया गया कि वह सार्वजनिक हित में काम करे, न कि निजी कंपनियों की तरह केवल शेयरधारकों के मुनाफे के लिए।
असम और गुजरात में मिली सफलता

स्थापना के बाद ONGC ने तेजी से काम शुरू किया। 1960-70 के दशक में असम और गुजरात में कच्चे तेल के कुओं की खोज में सफलता मिली। लेकिन असली गेम-चेंजर 1974 में बॉम्बे हाई (अब मुंबई हाई) की खोज के साथ आया। ONGC ने अरब सागर में यह विशाल तेल क्षेत्र खोजा और 1976 में उसका उत्पादन शुरू हुआ।
1980 के दशक के मध्य तक भारत की तेल जरूरत का 73 प्रतिशत और गैस का 74 प्रतिशत घरेलू उत्पादन से पूरा हो रहा था। कच्चे तेल का आयात बिल कुल निर्यात कमाई के 74 प्रतिशत से घटकर एक-तिहाई रह गया। ONGC ने देश के 7 में से 8 प्रमुख उत्पादक बेसिन की खोज की और कुल 7.15 बिलियन टन हाइड्रोकार्बन भंडार जोड़े।
ONGC ने देश को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान की। बॉम्बे हाई ने समुद्री क्षेत्र में तेल खोज की मजबूत नींव रखी। 1990 तक ONGC भारत की सबसे बड़ी उत्पादन कंपनी बन चुकी थी। सरकारी कंपनी होने के नाते यह मुनाफे से ज्यादा राष्ट्रीय हित पर ध्यान देती थी सब्सिडी वाले तेल की आपूर्ति, रोजगार सृजन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण। जहां निजी कंपनियां मुनाफा कम होने पर पीछे हट जातीं, वहां ONGC देश की जरूरत पूरी करती रही।
निजी कंपनियों की एंट्री
1991 के आर्थिक सुधारों के बाद पेट्रोलियम क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए खुला। 1997 में नई अन्वेषण लाइसेंसिंग नीति (NELP) लागू हुई। इससे पहले ONGC और OIL को नामांकन आधार पर ब्लॉक्स मिलते थे। अब निजी कंपनियां भी बराबरी पर बोली लगा सकती थीं। ONGC को भी निजी कंपनियों जैसी शर्तें मिलीं, लेकिन पुराने नामांकित ब्लॉक्स पर सब्सिडी और नियामकीय बोझ बरकरार रहा।
निजी कंपनियां बेहतर तकनीक, पूंजी और दक्षता के साथ बाजार में उतरीं। केजी बेसिन जैसे क्षेत्रों में रिलायंस ने पूरा परिदृश्य बदल दिया। ONGC की नई खोजों में उसकी हिस्सेदारी कम हुई। पुराने तेल-गैस क्षेत्र (जैसे मुंबई हाई) के भंडार धीरे-धीरे समाप्त हो रहे थे। दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण सूखे कुओं पर खर्च बेकार हो रहा था और कमाई भी प्रभावित हुई।
हाल के तिमाही नतीजों में मुनाफे में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। हालांकि तीसरी तिमाही में कंपनी का कुल मुनाफा बढ़ा, लेकिन खोज पर खर्च बढ़ने और पुराने क्षेत्रों के परिपक्व हो जाने से उत्पादन पर दबाव बना रहा। ONGC अभी भी मुनाफा कमा रही है, लेकिन मुनाफा दर पर दबाव जारी है।
निजी कंपनियां मुख्य रूप से मुनाफे के लिए काम करती हैं और जहां अच्छा रिटर्न मिलने की संभावना हो, वहीं निवेश करती हैं। वहीं ONGC देश की भलाई और ऊर्जा सुरक्षा के लिए काम करती रही है, भले ही मुनाफा कम क्यों न हो। आज भी ONGC देश का लगभग 70 प्रतिशत कच्चा तेल और 84 प्रतिशत प्राकृतिक गैस का उत्पादन करती है।











