इसी अप्रैल में आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने अमेरिका में एक ऐसी सफ़ाई दी जिससे पता चलता है कि भारत की केंद्रीय सत्ता तक पहुँचने के लिए उसने जो रणनीति अख़्तियार की है, उसने वैश्विक स्तर पर उसकी छवि घृणा के प्रचारक संगठन की बना दी है।
वाशिंगटन डीसी के हडसन इंस्टीट्यूट में RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने कहा: ‘RSS कू क्लक्स क्लान ( Ku Klux Klan ) का भारतीय संस्करण नहीं है। हम वर्चस्वादी नहीं हैं। हिंदू संस्कृति पूरी दुनिया को एक परिवार मानती है।’
भारत में आमतौर पर कू क्लक्स क्लान (के.के.के.) जैसे संगठनों की चर्चा अकादमिक क्षेत्र में ही होती है लेकिन पश्चिम में नस्लीय घृणा फैलाने का उसका इतिहास डेढ़ सौ साल से भी पुराना है। वहीं भारत में अल्पसंख्यकों, ख़ासतौर पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा प्रचार को सत्तारूढ़ बीजेपी ने अपनी राजनीतिक पूँजी बना लिया है। और ये तो दुनिया जानती है कि बीजेपी और कुछ नहीं, भारत के सत्ताकेंद्र पर क़ब्ज़ा करने के आरएसएस की एक परियोजना है।
होसबोले की सफ़ाई बताती है कि पश्चिम में आरएसएस को लेकर शंकाएँ बढ़ती जा रही हैं। अपनी छवि दुरुस्त करने के लिए आरएसएस ने अपने पक्ष में लाबींग भी शुरू कर दी है जिस पर लाखों डॉलर ख़र्च होते हैं। लेकिन बात बन नहीं रही है। ख़ासतौर पर जब यह कहा जा रहा है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अमेरिकी समाज ने के.के.के. को कभी सत्ता तक नहीं पहुँचने दिया जबकि भारत में आरएसएस न सिर्फ़ केंद्र पर क़ाबिज़ है बल्कि तमाम राज्यों में भी बीजेपी की सरकारों के ज़रिए समाज को विभाजित करने की अपनी योजना को अमल में ला रहा है। यह संयोग नहीं कि अल्पसंख्यकों की लिंचिंग करने वालों से लेकर अल्पसंख्यक महिलाओं के साथ बलात्कार करने वाले तक बीजेपी नेताओं ही नहीं मंत्रियों तक से सम्मानित होते हैं। और ये ख़बरें भारत का गोदी मीडिया चाहे तवज्जो न देता हो, लेकिन दुनिया भर का मीडिया सुर्खियाँ बनाता है।
भारत में आरएसएस पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया था। एक बार 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद,फिर 1975–1977 में आपातकाल के दौरान और तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद,लेकिन ये प्रतिबंध कभी स्थाई नहीं रहे। सरकारों ने तीनों ही बार प्रतिबंध हटा लिए थे।
अमरीका के एक आयोग यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) ने भी हाल ही में अपनी रिपोर्ट में भारत में बढ़ते अल्पसंख्यक विरोधी हमलों तथा ऐसे मामलों में भारत की नीतियों और धर्मांतरण विरोधी कानून से लेकर CAA तक को ले कर चिंता जताई थी। इस कमीशन ने इस मामले में आरएसएस की कड़ी आलोचना की।इसने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता में बाधक लोगों पर प्रतिबंध का भी सुझाव दिया।
आख़िर के.के.के. है क्या? इसके लिए हमें दो सदी पीछे जाना होगा। 1776 में अमेरिकी क्रांति का मूल मंत्र था ‘लिबर्टी’ यानी स्वतंत्रता लेकिन इंग्लैंड से आज़ाद होने के लिए युद्ध करने वाले सामाजिक बराबरी के लिए तैयार नहीं थे। ख़ासतौर पर अश्वेतों के प्रति घृणा इस कदर थी कि दक्षिण के राज्यों ने दास-प्रथा समाप्त करने से इंकार कर दिया जिसका नतीजा 1860 के गृहयुद्ध में हुआ। अब्राहम लिंकन जैसे महान राष्ट्रपति को समता के रास्ते पर देश को ले जाने की क़ीमत अपनी जान गँवा कर देनी पड़ी।
गृहयुद्ध में असफल होने के बाद श्वेत वर्चस्ववादियों का क्षोभ ‘कू क्लक्स क्लान’ के रूप में सामने आया। गृहयुद्ध के बाद शुरू हुए ‘पुनर्संरचना युग’ में दक्षिणी राज्यों में ग़ुलाम अफ्रीकी-अमेरिकियों को स्वतंत्रता और मताधिकार मिलने लगा था। इसी से नाराज़ होकर सेना के कुछ पुराने अफ़सरों ने इस संगठन को जन्म दिया ताकि अश्वेतों को दिये जा रहे अधिकारों का विरोध किया जा सके और इसका समर्थन कर रही रिपब्लिकन पार्टी को कमजोर किया जा सके। इसका शुरुआती नाम “Ku Klux” ग्रीक शब्द “kyklos” (घेरा) से प्रेरित था। यानी समाज में छिपा हुआ एक गुप्त घेरा था जो हिंसा के ज़रिए श्वेत वर्चस्व बनाये रखना चाहता था।
दिसंबर 1865 में टेनेसी के पुलास्की शहर में स्थापित के.के.के. ने योजनाबद्ध ढंग से अश्वेतों पर हमले किये।अश्वेतों के घर जलाने से लेकर हत्या और बलात्कार उनके लिए आम था। 1870 में अमेरिका में क़ानून के ज़रिए (Ku Klux Klan Act) से इसे दबा दिया गया लेकिन पहले विश्वयुद्ध के समय 1915 में यह पुनर्जीवित हुआ और 1920 तक इसके सदस्यों की संख्या 40 लाख तक पहुँच गयी।
अश्वेतों से शुरूआत करने वाला यह संगठन बाद में यहूदियों, कैथोलिकों और अप्रावसियों के ख़िलाफ़ सक्रिय हुआ और 1950-60s में नागरिक अधिकार आंदोलन के दौरान इसने हत्याओं और बम धमाकों का नया दौर शुरू किया। फिर भी अमेरिका की सरकारों और तमाम संवैधानिक संस्थाओं ने इसे हाशिये पर रखने में कामयाबी पायी। 2008 में बराक ओबामा जैसे अश्वेत नेता का राष्ट्रपति बनना बताता है कि श्वेत बहुमत वाले अमेरिकी समाज ने के.के.के. को निर्णायक पराजय दी है, हालाँकि एक प्रवृत्ति के रूप में यह मौजूद है और ट्रंप जैसे राष्ट्रपति के अप्रवासी विरोधी भाषणों और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ जैसे नारों ने उसे नयी जुंबिश दी है।
1925 में स्थापित आरएसएस ने के.के.के. की तरह नस्लीय घृणा नहीं फैलाई बल्कि ईसाइयों और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ धर्म के आधार पर घृणा अभियान चलाकर हिंदू समाज को एक बड़े ‘मतदाता मंडल’ में बदलकर सत्ता पर क़ब्ज़ा करना उसका मक़सद रहा है। मुस्लिमों और ईसाइयों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना उसकी घोषित विचारधारा रही है। उसकी माँग है कि मुस्लिम और ईसाई हिंदू संस्कृति अपना लें वरना उन्हें भारतीय नहीं माना जाएगा। उसका ‘हिंदुत्व’ समावेशी नहीं है। इसके आड़े आने पर वह शंकराचार्यों का भी विरोध करने से नहीं हिचकता। इस मामले में वह के.के.के. की तरह ज़रूर है जो अपनी प्रोटेस्टेंट आस्थाओं के चलते कैथोलिकों का विरोध करते-करते पोप के ख़िलाफ़ भी चला जाता है।
पर ‘घृणा फैलाने’ और संविधान न मानने जैसी बातों की एकता के बावजूद के.के.के. और आरएसएस को समान मानना ठीक नहीं है। के.के.के. को अमेरिकी समाज ने हाशिये पर ही रखा है जबकि भारत में आरएसएस ही सरकार है। वह केंद्र पर ही क़ाबिज़ नहीं है बल्कि सहयोगियों के साथ मिलकर 21 राज्यों में उसकी सरकार है। इन राज्यों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने वाली सबसे बड़ी शक्ति ‘सरकार’ ही है।
सरकारी बुलडोज़र संविधान को कुचलते हुए अल्पसंख्यकों का घर गिराने को मचलते रहते हैं और पूरी मशीनरी उन्हें घुसपैठिया साबित करने में जुटी रहती है। मुख्यमंत्री पद पर बैठे बीजेपी नेता खुलकर कहते हैं कि ‘उन्हें मियों का वोट नहीं चाहिए।’ इसके बावजूद उन्हें कोई राजनीतिक नुक़सान नहीं होता, उल्टा चुनावी जीत की संभावना बढ़ जाती है।
इसलिए जब दत्तात्रेय होसबोले कहते हैं कि आरएसएस के.के.के. का भारतीय संस्करण नहीं है तो वे बिल्कुल ठीक कहते हैं। आरएसएस को तो इस मायने में ज़्यादा ख़तरनाक कहना चाहिए क्योंकि इस विचारधारा ने समावेशी संस्कृति के लिए सभ्यता का शिखर चूमने वाले भारत को घृणा के नाबदान में उतार दिया है। आरएसएस के.के.के. की तरह कोई ‘गुप्त घेरा’ नहीं है। आरएसएस के सदस्य के.के.के. सदस्यों की तरह मुँह छिपाने के लिए हूडी नहीं पहनते, बल्कि बावर्दी दुरुस्त ‘पथ संचलन’ करते हैं जिन पर फूल बरसाये जाते हैं।











