अशांत बांग्लादेश से आती आवाजों को सुनिए

December 19, 2025 8:16 PM
Bangladesh violent protests

पिछले साल अगस्त में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ हुए प्रदर्शन की अगुआई करने वाले छात्र नेता उस्मान हादी की मौत से बांग्लादेश में भड़की हिंसा भारत के लिए भी बड़ी चिंता का कारण होना चाहिए।

शेख हसीना के तख्तापलट के बाद निर्वासित होकर पिछले डेढ़ साल से भारत में हैं और बांग्लादेश में हुई ताजा हिंसा में भारत विरोधी नारे सुने जा रहे हैं, तो समझा जा सकता है कि दोनों देशों के रिश्ते किस नाजुक मोड़ पर हैं।

वहां के हालात किस कदर बिगड़ चुके हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश के दो बड़े अखबारों डेली स्टार और प्रथोम आलो को भारत और शेख हसीना समर्थक बताकर उनके दफ्तरों को फूंक दिया है!

चिंता की बात यह है कि शेख हसीना के निर्वासन के बाद बांग्लादेश की सत्ता की कमान संभालने वाले नोबेल विजेता मोहम्मद यूनूस अराजकता को नियंत्रित करने में नाकाम साबित हो रहे हैं और ऐसा लगता है कि वे सेना और कट्टरपंथियों की कठपुतली बन गए हैं।

इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले आम चुनाव में विपक्ष को तकरीबन खत्म कर सत्ता पर काबिज होने वाली शेख हसीना ने वहां लोकतांत्रिक ताकतों और संस्थानों को मजबूत करने के बजाए मनमाने ढंग से सत्ता को केंद्रित कर लिया था।

लेकिन बांग्लादेश आज जिस राह पर है, खासतौर से भारत के लिए कहीं अधिक चिंता का कारण है। दरअसल यह बांग्लादेश में हमारी विदेश नीति की परीक्षा की भी घड़ी है।

संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली विदेश मामलों की संसदीय समिति ने बांग्लादेश के मौजूदा हालात को भारत के लिए 1971 के बाद की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बताया है।

समिति का यहां तक कहना है कि अगर भारत ने अपनी नीति नहीं बदली तो हमें ढाका में युद्ध के कारण नहीं, बल्कि धीरे धीरे आप्रसांगिक होते जाने के कारण रणनीतिक अहमियत खोनी पड़ सकती है।

जाहिर है, ऐसे संवेदनशील समय में, जब बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव प्रस्तावित हैं, भारत को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। चूंकि अगले साल मार्च-अप्रैल में ही पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव भी प्रस्तावित हैं, लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि घरेलू राजनीति का असर बांग्लादेश के साथ संबंधों पर न पड़े।

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