क्या BRICS पर भारत का दांव गलत है? क्या अब पीछे पलटकर देखने और समीक्षा करने का वक़्त आ गया है? भारत को ब्रिक्स चाहिए या पश्चिम की दोस्ती और सहयोग?
दुनिया की विदेश नीति में दोस्ती का कोई स्थायी भाव नहीं होता, स्थायी होता है तो केवल हित। राष्ट्र न तो भावनाओं से व्यापार करते हैं और न ही रिश्तेदारी के आधार पर निवेश। जहां बाजार मिलता है, वहां व्यापार होता है; जहां तकनीक मिलती है, वहां साझेदारी होती है और जहां राष्ट्रीय हित सुरक्षित होते हैं, वहां कूटनीति रास्ता बनाती है।
इस कसौटी पर भारत के सामने आज एक असहज लेकिन जरूरी सवाल खड़ा है – क्या ब्रिक्स पर भारत का दांव उसके आर्थिक हितों के अनुकूल है?
जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने इस बहस को नए सिरे से सामने रखा है। उनका कहना है कि भारत को ब्रिक्स से बाहर निकलने पर विचार करना चाहिए या कम से कम अपनी प्राथमिकताओं में पश्चिम, खासकर अमेरिका और यूरोप, को कहीं अधिक महत्व देना चाहिए।
यह विचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे किसी विदेशी सरकार या भारत-विरोधी संस्था ने नहीं, बल्कि एक भारतीय अर्थशास्त्री ने भारत के आर्थिक हितों के संदर्भ में उठाया है और सवाल भी मामूली नहीं है।
भारत करीब 17 वर्षों से ब्रिक्स का सदस्य है। इन 17 वर्षों में भारत ने वास्तव में क्या हासिल किया?
यदि इसका उत्तर केवल यह है कि भारत को एक अंतरराष्ट्रीय मंच मिला, तो यह पर्याप्त नहीं है। आज की दुनिया में हर अंतरराष्ट्रीय मंच का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि वह देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश, तकनीक और रोजगार में क्या योगदान करता है। यही वह जगह है जहां ब्रिक्स की उपलब्धियों और सीमाओं का गंभीर मूल्यांकन जरूरी हो जाता है।
भारत का बड़ा बाज़ार अमेरिका है
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में केवल रक्षा और कूटनीति तक सीमित नहीं है। अमेरिका भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में है। भारतीय आईटी और सॉफ्टवेयर उद्योग के लिए अमेरिकी बाजार अत्यंत महत्वपूर्ण है। लाखों भारतीय पेशेवर अमेरिकी कंपनियों और संस्थानों के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
सुरजीत भल्ला के अनुसार भारत के माल निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा अमेरिका जाता है। भारतीय सॉफ्टवेयर निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी आधे से अधिक है। भारत को मिलने वाले रेमिटेंस में अमेरिका का योगदान लगभग 28 प्रतिशत है। अमेरिकी निवेशकों के पास लगभग 390 अरब डॉलर की भारतीय प्रतिभूतियां हैं और अमेरिका से भारत में करीब 100 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश आया है।
इन आंकड़ों को केवल विदेश नीति के चश्मे से देखना गलती होगी। इनका सीधा संबंध भारतीय रोजगार, विदेशी मुद्रा, पूंजी और तकनीकी क्षमता से है। अमेरिका भारतीय फार्मा, आईटी, इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेवाओं के लिए बड़ा बाजार है। भारत के आर्थिक विकास की अगली छलांग में अमेरिकी बाजार और पूंजी की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। इसलिए यह सवाल वाजिब है कि जिस देश के साथ भारत का इतना गहरा आर्थिक रिश्ता है, क्या उसे अपनी आर्थिक रणनीति में सर्वोच्च प्राथमिकताओं में नहीं होना चाहिए?
चीन से कारोबार बढ़ रहा है और व्यापार घाटा भी
अब ब्रिक्स के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण सदस्य चीन को देखिए। चीन के साथ भारत का व्यापार बहुत बड़ा है, लेकिन समस्या उसके आकार में नहीं, उसके असंतुलन में है। 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
भारत चीन से बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन, औद्योगिक उपकरण, सोलर उत्पाद और अन्य सामान खरीदता है। लेकिन चीन के बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। यह स्थिति एक गंभीर सवाल पैदा करती है। क्या बड़ा व्यापार हमेशा अच्छा व्यापार होता है? जरूरी नहीं।
अगर कोई देश दूसरे देश को 100 रुपये का सामान बेचता है और उससे 200 रुपये का खरीदता है तो व्यापार जरूर बढ़ा है, लेकिन फायदा किसे हुआ? भारत-चीन व्यापार का यही पक्ष सबसे अधिक चिंता पैदा करता है। यहां सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी मौजूद है। ऐसे में आर्थिक निर्भरता का बढ़ना भारत के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा करता है। ब्रिक्स की उपयोगिता पर बहस करते समय चीन के साथ व्यापार घाटे को नजरअंदाज करना संभव नहीं है।
सिर पे लाल टोपी रूसी, लेकिन व्यापार असंतुलन महंगा
रूस के साथ भारत का रिश्ता ऐतिहासिक और रणनीतिक है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदा। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। इससे भारत को कई मौकों पर सस्ता तेल मिला और ऊर्जा आयात का खर्च नियंत्रित रखने में मदद मिली। लेकिन व्यापार का दूसरा पक्ष उतना सुखद नहीं है। भारत रूस से जितना खरीदता है, उसकी तुलना में रूस को भारत का निर्यात बहुत कम है।
उपलब्ध हालिया आंकड़ों के अनुसार रूस से भारत का कुल आयात करीब 64 अरब डॉलर के आसपास रहा, जबकि भारत का रूस को निर्यात लगभग 5 अरब डॉलर रहा यानी कि रूस भारत को तेल और अन्य सामान बेच रहा है, लेकिन भारतीय उत्पादों के लिए रूसी बाजार उसी अनुपात में नहीं खुला है।
इसका समाधान रूस से दूरी बनाना नहीं, बल्कि रूस के साथ व्यापार को संतुलित करना होना चाहिए। यदि भारत रूस से अरबों डॉलर का तेल खरीदता है तो भारतीय फार्मा, कृषि उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, ऑटो कंपोनेंट्स और सेवाओं को भी रूस में जगह मिलनी चाहिए। केवल खरीददार बने रहना दीर्घकाल में मजबूत आर्थिक साझेदारी नहीं बनाता।
ब्रिक्स विफल नहीं, कमज़ोर है
ब्रिक्स को केवल व्यापारिक संगठन मानना उसकी भूमिका को छोटा करके देखना है। ब्रिक्स का महत्व राजनीतिक और रणनीतिक भी है। यह उन देशों को एक मंच देता है जो वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और अधिक प्रभाव चाहते हैं। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की आवश्यकता भी भारत उठाता रहा है।
ब्रिक्स इस व्यापक बहस का एक महत्वपूर्ण मंच है। इसके अलावा ब्रिक्स के विस्तार के बाद इसका आर्थिक और भौगोलिक प्रभाव भी बढ़ा है। यह अब केवल पांच देशों का समूह नहीं है, इसलिए भारत के लिए ब्रिक्स को छोड़ देना कोई छोटा कूटनीतिक फैसला नहीं होगा।
ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके सदस्य देशों के बीच हितों की एकरूपता नहीं है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। चीन और अमेरिका के बीच वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। रूस और पश्चिम के बीच यूक्रेन युद्ध के बाद गहरा संघर्ष है। ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से तनाव है।
दूसरी ओर भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड का हिस्सा है। ऐसी स्थिति में ब्रिक्स को एक संगठित राजनीतिक या आर्थिक गठबंधन के रूप में देखना वास्तविकता से परे होगा। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह हो सकती है कि ब्रिक्स धीरे-धीरे किसी एक देश के प्रभाव वाला मंच न बन जाए। भारत को ऐसा ब्रिक्स चाहिए जिसमें उसकी आवाज स्वतंत्र और प्रभावशाली हो।
लेकिन इस बहस का दूसरा सिरा पकड़कर यह मान लेना भी ठीक नहीं होगा कि अमेरिका और यूरोप भारत के स्थायी आर्थिक मित्र हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र नहीं होते, स्थायी हित होते हैं।
अमेरिका अपनी व्यापार नीति में अपने उद्योगों और श्रमिकों के हितों को प्राथमिकता देता है। भारत के साथ व्यापार विवाद भी हुए हैं। टैरिफ, बाजार पहुंच, वीजा और तकनीकी नियंत्रण जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद मौजूद रहे हैं।
यूरोप भी अपने बाजार और उद्योगों की रक्षा करता है इसलिए भारत को पश्चिम के साथ संबंध मजबूत जरूर करने चाहिए, लेकिन किसी प्रकार की आर्थिक निर्भरता को रणनीतिक निर्भरता में बदलने से बचना चाहिए। भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र यही होना चाहिए — साझेदारी सबके साथ, निर्भरता किसी पर नहीं।
रणनीतिक स्वायत्तता है भारत की ताकत
भारत ने पिछले वर्षों में जिस नीति को विकसित किया है, उसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसने किसी एक शक्ति-केंद्र के साथ पूरी तरह खुद को नहीं बांधा। भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है।
रूस से रक्षा उपकरण और ऊर्जा खरीद रहा है। यूरोप के साथ व्यापार और तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड में है।
खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा, निवेश और प्रवासी भारतीयों से जुड़े संबंध मजबूत कर रहा है और चीन के साथ गंभीर राजनीतिक तनाव के बावजूद व्यापार जारी है। यह विरोधाभास नहीं रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत को इसी नीति को और परिपक्व बनाने की जरूरत है।
17 साल बाद ब्रिक्स की सदस्यता का मूल्यांकन होना चाहिए। भारत को स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि ब्रिक्स देशों में भारतीय निर्यात कितना बढ़ा? भारतीय कंपनियों को कितने नए बाजार मिले?
कितना निवेश भारत आया? कितनी तकनीकी साझेदारियां हुईं? कितने रोजगार पैदा हुए? क्या व्यापार घाटे में कमी आई? क्या भारत की वैश्विक संस्थाओं में आवाज मजबूत हुई? अगर आर्थिक लाभ सीमित हैं तो भारत को ब्रिक्स के भीतर अपनी प्राथमिकताएं बदलनी चाहिए। ब्रिक्स का उद्देश्य केवल संयुक्त घोषणाएं जारी करना नहीं होना चाहिए। भारत को वहां व्यापार, निवेश, तकनीक और बाजार पहुंच पर जोर देना चाहिए।
पश्चिम से भारत को क्या चाहिए?
अमेरिका और यूरोप के साथ भारत की साझेदारी को भी केवल रक्षा और कूटनीति तक सीमित नहीं रखा जा सकता। भारत को उन्नत तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, उच्च गुणवत्ता वाला विनिर्माण, रक्षा तकनीक, फार्मा अनुसंधान, पूंजी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भागीदारी चाहिए।
भारत यदि करोड़ों युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार चाहता है तो उसे कम लागत वाली अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर उच्च उत्पादकता वाली अर्थव्यवस्था बनना होगा। इसके लिए पश्चिमी देशों के साथ सहयोग जरूरी है, लेकिन सहयोग का दूसरा पक्ष भी है कि भारत को उनके बाजारों में अधिक से अधिक भारतीय उत्पाद पहुंचाने होंगे। भारत को केवल विदेशी निवेश का गंतव्य नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादन और निर्यात का केंद्र बनना होगा।
अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला की बात का सबसे गंभीर पहलू यह है कि वह भारत की आर्थिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को तुरंत ब्रिक्स छोड़ देना चाहिए।
किसी संगठन की उपयोगिता केवल इस आधार पर तय नहीं होती कि उससे सीधे कितना पैसा मिला। कई बार अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं देश को राजनीतिक विकल्प देती हैं। कई बार उनका महत्व भविष्य में खुलने वाले बाजारों और रणनीतिक अवसरों में होता है।
ब्रिक्स भारत को चीन और रूस के साथ संवाद का एक अतिरिक्त मंच देता है। यह ग्लोबल साउथ की राजनीति में भारत की भूमिका मजबूत करता है। इसलिए बेहतर रास्ता ब्रिक्स से भागना नहीं, बल्कि ब्रिक्स को भारत के हित में अधिक प्रभावी बनाना है।
भारत को ‘या तो ब्रिक्स या अमेरिका’ नहीं चुनना चाहिए
यह बहस अगर दो विकल्पों तक सीमित कर दी जाए—ब्रिक्स या अमेरिका—तो दोनों ही भारत की संभावनाओं को सीमित करेंगे। भारत को किसी एक खेमे का चुनाव करने की आवश्यकता नहीं है।
भारत को अमेरिका से व्यापार और तकनीक चाहिए। यूरोप से निवेश और बाजार चाहिए। रूस से ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग चाहिए। जापान से तकनीक और पूंजी चाहिए। खाड़ी देशों से ऊर्जा और निवेश चाहिए।
चीन के साथ व्यापार में संतुलन चाहिए और ब्रिक्स से ग्लोबल साउथ में प्रभाव तथा रणनीतिक विकल्प चाहिए। यह नीति विरोधाभासी नहीं है। यह उस दुनिया की वास्तविकता है जो अब एकध्रुवीय नहीं रही।
भारत को खेमे नहीं, अवसर चुनने चाहिए
सुरजीत भल्ला ने एक असुविधाजनक सवाल उठाया है। उसे खारिज करने के बजाय उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। 17 वर्षों के बाद ब्रिक्स की उपलब्धियों का हिसाब होना ही चाहिए।
कितने सम्मेलन हुए, कितनी घोषणाएं हुईं और कितनी संयुक्त तस्वीरें खिंचीं—यह सफलता का पैमाना नहीं है। सफलता का पैमाना है कितना निर्यात बढ़ा, कितना निवेश आया, कितनी तकनीक मिली, कितने रोजगार पैदा हुए और भारत की आर्थिक शक्ति कितनी बढ़ी।
यदि ब्रिक्स इन कसौटियों पर भारत के लिए उपयोगी है तो भारत को उसमें और सक्रिय होना चाहिए। यदि नहीं है तो उसकी रणनीति बदलनी चाहिए लेकिन ब्रिक्स छोड़कर केवल अमेरिका की तरफ देखना भी उतना ही गलत होगा।
भारत को अब किसी एक दरवाजे पर खड़े होकर दुनिया से अवसर मांगने वाला देश नहीं बनना है। उसे ऐसा देश बनना है जिसके लिए दुनिया के हर बड़े बाजार का दरवाजा खुला हो।
भारत की विदेश नीति का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि वह अमेरिका का कितना करीब है या चीन से कितना दूर है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि भारत की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है कि अमेरिका, चीन, रूस और यूरोप—सभी को भारत की जरूरत पड़े।
आखिरकार दुनिया की बड़ी ताकत वह नहीं होती जिसके सबसे ज्यादा मित्र हों। बड़ी ताकत वह होती है जिसे मित्र और प्रतिद्वंद्वी दोनों ही अपने हित में जरूरी समझें।इसलिए भारत के सामने सवाल ब्रिक्स बनाम अमेरिका का नहीं है। सवाल यह है कि भारत कब इतना मजबूत होगा कि उसे किसी एक के पक्ष में खड़े होने की मजबूरी ही न रहे। यही रणनीतिक स्वायत्तता का अंतिम अर्थ है। और यही भारत की सबसे बड़ी आर्थिक महत्वाकांक्षा भी होनी चाहिए।-











