नई दिल्ली। पिछले दिनों ट्रिब्यून के छपे एक लेख में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज दीपक गुप्ता ने लिखा कि देश की अदालतें धीरे-धीरे बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
अपने उसी लेख में जस्टिस गुप्ता ने उमर खालिद के मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि वह छह साल से अधिक समय से जेल में हैं और उनके मामले की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का क्या होगा? उन्होंने कहा कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खुद खालिद के मामले में दिए गए फैसले की वैधता पर सवाल उठाया।
उन्होंने कहा कि कई मामलों में न्याय की प्रक्रिया ही सजा बन जाती है। किसी व्यक्ति को ‘राष्ट्रविरोधी’ का ठप्पा लगाकर उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी जाती है और दुर्भाग्य से कई बार अदालतें ऐसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होतीं। जस्टिस दीपक गुप्ता जो कह रहे हैं वो बात सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया भर में लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थक कह रहे हैं लेकिन सरकार खामोश है।
तारीखों पर तारीख
उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसक झड़पों से जुड़ा है। दिल्ली पुलिस का आरोप है कि खालिद और अन्य लोग सरकार को अस्थिर करने के उद्देश्य से सांप्रदायिक अशांति भड़काने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा थे। लेकिन गजब यह कि अब तक मामले का ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ। भारतीय न्याय व्यवस्था में ऐसे उदाहरण बिरले सुनने को मिलते हैं।
सबकी लिए जमानत नियम उमर के लिए ट्रंप कार्ड
सुप्रीम कोर्ट उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज बार बार खारिज कर रहा है , जबकि बीच, अदालत ने मामले में कुछ अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरा हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी।
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद के मामले में कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत अभियोगों में, मुकदमे की सुनवाई में देरी को “ट्रम्प कार्ड” के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। जबकि अदालतें बार बार कहती रही हैं कि जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद। लेकिन उमर और शरजील के मामले में जमानत नियम बन जाता है।
उमर खालिद की सिर्फ देह नहीं है कैद
ऐसा नहीं है कि उमर खालिद की सिर्फ देह जेल में है उनको हर तरह से जल्द जा रहा है। उमर की आदिवासियों पर लिखी किताब के विमोचन स्थल को रद्द कर दिया जाता है महाराष्ट्र में उसकी रिहाई के नारे लगाने वाले TISS के छात्र को गिरफ्तार कर लिया जाता है।
ऐसा तब होता है जब न्यूयार्क के मेयर जोहरान मंदानी उनकी रिहाई की अपील करते हैं अमेरिकी सांसद सरकार को चिट्ठी लिखते हैं। पिछले दिनों जंतर मंतर के प्रदर्शन के दौरान भी कहा गया कि वहां उमर खालिद के समर्थन में नारे लगे। जबकि अभी दो दिनों पहले महाराष्ट्र की एक अदालत ने कहा कि उमर खालिद के समर्थन में नारे लगाना अपराध नहीं है।
अब उमर की डॉक्यूमेंट्री पर बवाल
जब यह खबर लिखी जा रही है दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में जेल में बंद उमर खालिद की डॉक्यूमेंट्री को लेकर बवाल मचा हुआ है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) में उमर खालिद डॉक्यूमेंट्री ‘प्रिजनर नंबर 626710 इज़ प्रेजेंट’ की प्रस्तावित कैंपस स्क्रीनिंग पर कड़ा ऐतराज जताया है।
एबीवीपी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि वो इस बात पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हैं कि शैक्षणिक परिसरों का इस्तेमाल ऐसे लोगों से जुड़ी स्क्रीनिंग के लिए किया जा रहा है, जिनके नाम JNU विवाद के दौरान देश-विरोधी नारों, अफजल गुरु के कार्यक्रमों, और CAA-NRC विरोध-प्रदर्शनों व दिल्ली दंगों के दौरान भड़काऊ गतिविधियों से जुड़े रहे हैं।
पुलिस बता रही मास्टर माइंड
दिल्ली पुलिस ने इसी 27अगस्त को 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को मास्टरमाइंड बता दिया।
अदालत में पुलिस ने अपना जवाब दाखिल करते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं का भी विरोध किया।
अब 21सितंबर को सुनवाई होगी। यह एक सच्चाई है कि कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल उमर खालिद के समर्थन में बोलने से बचते रहे हैं।
11 अगस्त 2026 को उमर खालिद ने जेल में अपना लगातार छठा जन्मदिन मनाया। 2020 में दिल्ली दंगों की साजिश के बहाने गिरफ्तार किए गए खालिद अभी भी मुकदमे की शुरुआत का इंतजार कर रहे हैं।
हर तरफ खामोशी और खालिद की नियति
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवक्ताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका, रत्ना सिंह और सौरभ दास के सार्वजनिक सोशल मीडिया खातों की जांच से पता चलता है कि उनमें से किसी ने भी ऐसा कुछ पोस्ट नहीं किया जिसे खालिद और यूएपीए के तहत जेल में बंद अन्य राजनीतिक कैदियों के प्रति एकजुटता दिखाने वाला माना जा सके।
सीजेपी भूलकर भी उमर के समर्थन में कुछ नहीं बोलती।उमर खालिद अपनी जेल बंदी को नियत मान चुके हैं। इसी साल पांच जनवरी को जब अन्य साथियों की रिहाई के बाद उन्हें जमानत नहीं मिली तो उन्होंने कहा था कि ‘अब जेल ही मेरी जिंदगी है’ उन्हें इस बात की राहत है कि उनके अन्य साथियों को जमानत मिल गई।









