टाटा पावर के बिजली सप्लाई के आवेदन के खिलाफ उतरा अभियंता संघ, कांग्रेस और भाकपा माले ने भी खोला मोर्चा

Tata Power

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनी की एंट्री को लेकर विरोध तेज हो गया है। टाटा पावर के पैरलल बिजली वितरण लाइसेंस के आवेदन और उसकी प्रस्तावित जनसुनवाई की खबर सबसे पहले द लेंस ने प्रकाशित की थी।

अब इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल अभियंता संघ ने छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) के सामने आपत्ति दर्ज करा दी है। वहीं कांग्रेस और भाकपा (माले) रेड स्टार ने भी सरकार की बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियों की संभावित एंट्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

टाटा पावर ने विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 14 और 15 के तहत रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसीलों के भौगोलिक क्षेत्र में बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया है। इस आवेदन पर आयोग ने 1 अक्टूबर से आपत्ति और सुझाव लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है। यानी अभी टाटा पावर को लाइसेंस नहीं मिला है, बल्कि मामला नियामकीय प्रक्रिया में है।

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छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल डिप्लोमा अभियंता संघ ने CSERC के सचिव को पत्र भेजकर याचिका क्रमांक 89/2026 पर आपत्ति दर्ज कराई है।

संघ ने निजी कंपनी के आवेदन को केवल कंपनी के विरोध का मामला नहीं बताते हुए कहा है कि बिजली वितरण व्यवस्था का सीधा संबंध उपभोक्ता हित, सार्वजनिक बिजली व्यवस्था, तकनीकी क्षमता और बिजली क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारियों-अभियंताओं से है।

यह भी पढ़ें: द लेंस की खबर से मचा हड़कंप, छत्तीसगढ़ में टाटा पावर की एंट्री के खिलाफ यूनियनों ने खोला मोर्चासंघ ने टाटा पावर के प्रस्तावित क्षेत्र की कानूनी पात्रता पर भी सवाल उठाया है। उसके मुताबिक नवंबर 2022 में बिजली वितरण लाइसेंस से संबंधित नियम में किए गए संशोधनों के तहत लाइसेंस के लिए न्यूनतम क्षेत्र से संबंधित प्रावधान हैं। ऐसे में आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चार तहसीलों को मिलाकर प्रस्तावित क्षेत्र संबंधित नियमों की पात्रता पूरी करता है या नहीं।

संघ ने मांग की है कि जब तक क्षेत्र की वैधानिक पात्रता स्पष्ट नहीं होती, तब तक लाइसेंस प्रक्रिया को आगे न बढ़ाया जाए।

प्रदेश भर में सरकारी बिजली कंपनी छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) बिजली वितरण कर रही है। यही वजह है कि प्रस्तावित पैरलल लाइसेंस को लेकर बिजली क्षेत्र में बहस शुरू हो गई है। सवाल यह है कि यदि निजी कंपनी को लाइसेंस मिलता है तो वह किन उपभोक्ताओं को अपनी सेवाएं देगी और इसका मौजूदा सरकारी वितरण कंपनी की वित्तीय स्थिति पर क्या असर पड़ेगा?

अभियंता संघ ने भी आयोग से इसी तरह के संभावित प्रभावों का परीक्षण करने की मांग की है।

निजीकरण के खिलाफ भाकपा माले का प्रदर्शनात्मक विरोध

इसी बीच भाकपा (माले) रेड स्टार ने भी बिजली वितरण में निजी कंपनियों की एंट्री का विरोध किया है। संगठन के राज्य सचिव कॉमरेड सौरा ने कहा कि बिजली जनता की बुनियादी जरूरत है और इसे कॉरपोरेट मुनाफे का साधन नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

संगठन ने आरोप लगाया है कि रायपुर की बिजली वितरण व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश सार्वजनिक बिजली व्यवस्था को कमजोर करेगी। पार्टी ने बिजली के साथ एयरपोर्ट समेत सार्वजनिक संस्थानों को निजी कंपनियों के हवाले करने का भी विरोध किया है।

भाकपा माले ने मांग की है कि रायपुर में निजी बिजली वितरण लाइसेंस की प्रक्रिया बंद की जाए, CSPDCL को मजबूत किया जाए और बिजली कर्मचारियों की नौकरी एवं सेवा शर्तों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

संगठन ने उपभोक्ताओं के सामने यह सवाल भी रखा है कि सार्वजनिक धन से दशकों में तैयार किए गए बिजली के लाइन, सब-स्टेशन और वितरण नेटवर्क का इस्तेमाल निजी कंपनी किन शर्तों पर करेगी।

कांग्रेस बोली- पहले बिजली महंगी की, अब कंपनी बेचने की तैयारी

टाटा पावर के आवेदन के बीच प्रदेश कांग्रेस ने भी सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता वंदना राजपूत ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार सरकारी बिजली व्यवस्था को कमजोर कर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

कांग्रेस का आरोप है कि पहले बिजली की कीमतें बढ़ाई गईं, स्मार्ट मीटर लगाए गए और 400 यूनिट तक मिलने वाली छूट खत्म की गई। अब निजी कंपनियों को बिजली सप्लाई का लाइसेंस देने की तैयारी की जा रही है।

वंदना राजपूत ने कहा कि राज्य की विद्युत कंपनी स्वावलंबी है और यह प्रदेश की जनता की धरोहर है। कांग्रेस ने दावा किया कि वह अपने विद्युत सत्याग्रह में बिजली वितरण के निजीकरण के मुद्दे को भी शामिल करेगी और इसे लेकर जनता के बीच जाएगी।

पैरलल लाइसेंस से क्या बदलेगा?

टाटा पावर का आवेदन सफल होता है तो प्रस्तावित क्षेत्र में एक निजी कंपनी को बिजली वितरण का लाइसेंस मिल सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे रायपुर की सरकारी बिजली व्यवस्था तत्काल खत्म हो जाएगी। पैरलल लाइसेंस की व्यवस्था में एक ही क्षेत्र में एक से अधिक लाइसेंसधारी वितरण कंपनी के संचालन की संभावना रहती है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल उपभोक्ताओं का है—निजी कंपनी किस तरह के उपभोक्ताओं को अपने नेटवर्क से जोड़ेगी? क्या वह अधिक खपत और बेहतर भुगतान क्षमता वाले शहरी, व्यावसायिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं पर ज्यादा ध्यान देगी? अगर ऐसा होता है तो सरकारी कंपनी के पास अपेक्षाकृत कम लाभ वाले उपभोक्ताओं और क्षेत्रों का अनुपात बढ़ सकता है।

CSERC की प्रक्रिया के तहत 1 अक्टूबर से टाटा पावर के आवेदन पर आपत्ति और सुझाव लिए जाने हैं। इसके बाद आयोग संबंधित पक्षों की दलीलें, दस्तावेज और आपत्तियां सुनकर नियमानुसार निर्णय करेगा।

द लेंस ने सबसे पहले उठाया था सवाल

रायपुर में बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनी की एंट्री का यह मामला सामने आने के बाद द लेंस ने सबसे पहले टाटा पावर के पैरलल लाइसेंस आवेदन और CSERC में होने वाली जनसुनवाई की पूरी खबर प्रकाशित की थी। उस रिपोर्ट में हमने यह सवाल उठाया था कि निजी कंपनी की एंट्री का असर घरेलू उपभोक्ताओं, बिजली दरों और सरकारी वितरण कंपनी की वित्तीय स्थिति पर क्या पड़ेगा।

अब अभियंता संघ की आपत्ति, कांग्रेस का विरोध और भाकपा माले के आंदोलन के ऐलान के बाद यह मामला सिर्फ नियामकीय प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे सार्वजनिक बिजली व्यवस्था बनाम निजी वितरण मॉडल की बड़ी राजनीतिक बहस में बदलता जा रहा है।

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