Lens Expose : भारत हर साल 60 से 70 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है। इसमें अकेले पाम ऑयल का हिस्सा 55 से 60 प्रतिशत है। आयात कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए 2021 में नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल – ऑयल पाम शुरू किया गया। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह मॉडल सफलतापूर्वक चल रहा है लेकिन छत्तीसगढ़ में, जहां 2012-13 से 10,796 हेक्टेयर में 7,315 किसान जुड़े हैं, योजना की पहली कड़ी यानी पौधों की गुणवत्ता पर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
बिजनेस मॉडल कागज पर मजबूत, जमीन पर कमजोर
योजना पीपीपी मॉडल पर आधारित है। सरकार किसान चयन, सब्सिडी और निगरानी करती है। कंपनी को गुणवत्ता वाले पौधे, तकनीकी सहायता, फल खरीद और प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की जिम्मेदारी दी गई है। छत्तीसगढ़ सरकार ने डबल सब्सिडी और इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट भी दिया है लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। पुरानी कंपनियों अम्मा ऑयल पाम और 3F ऑयल पाम का ट्रैक रिकॉर्ड कमजोर रहा है। एक ने 13 साल में सिर्फ पौधे बेचे, प्रोसेसिंग यूनिट नहीं लगाई। दूसरी ने प्लांटेशन के बाद अचानक एग्जिट ले लिया, जिससे किसानों का निवेश डूब गया।
दंतेवाड़ा और सरगुजा में खुलासा
द लेंस को मिले विभागीय पत्रों के अनुसार, प्री-यूनिक एशिया कंपनी के पौधों पर सवाल उठे हैं। दंतेवाड़ा की सहायक संचालक उद्यानिकी मीना मंडावी ने 29 जुलाई 2026 को पत्र लिखकर 15,222 पौधों की गुणवत्ता पर आपत्ति जताई।

फील्ड निरीक्षण में पांच खामियां मिलीं:
पौधे सिर्फ 1.5-2 फीट ऊंचे
पत्ती में स्प्लिटिंग नहीं
आयु 8-10 माह (मानक 12-14 माह)
विदेशी वैरायटी होने के बावजूद PEQ सर्टिफिकेट नहीं
प्लांट क्वारंटीन रिलीजिंग लेटर नहीं
कंपनी ने इन खामियों का ठोस जवाब नहीं दिया। दंतेवाड़ा में रिजेक्ट स्टॉक अन्य जिलों में बांट दिया गया। सरगुजा में दो महीने से पौधे ही नहीं पहुंचे।

किसानों के लिए बड़ा जोखिम
ऑयल पाम 25-30 साल की फसल है। अमानक पौधे लगने पर मृत्यु दर बढ़ सकती है और उपज कम हो सकती है। नुकसान किसान को उठाना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ में जatropha, सफेद मूसली जैसी योजनाओं का भी इसी तरह का अनुभव रहा है। विशेषज्ञ पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं। IIOPR वैज्ञानिकों, PEQ अधिकारियों और स्वतंत्र विशेषज्ञों की कमेटी गठित कर रिपोर्ट सार्वजनिक करने की बात कही जा रही है।

हॉर्टिकल्चर विभाग से संपर्क किया गया, लेकिन अभी तक उनका पक्ष सामने नहीं आया है।










