सन 1960 के दौरान वर्तमान दंतेवाड़ा जिले के बेडमा पंचायत के 20 से अधिक परिवार अपने गांव छोड़कर बैलाडीला पहाड़ के पीछे आकर बसे और उस जगह का नाम रखे — तमोड़ी।
तमोड़ी में इससे पहले भी कई परिवार बसे हुए थे। प्रकृति संसाधनों से भरपूर इस इलाके में लोग इसलिए बसें थे, क्योंकि यहां पेट भरने के लिए पर्याप्त शिकार के साथ-साथ भरपूर वन संपदा भी उपलब्ध थी। पर्याप्त जलस्रोत उनके जीवन को और अधिक खुशहाल बनाए हुए थे। तमोड़ी गांव के आसपास दर्जनों और गांव मौजूद थे। इनमें यह फर्क महसूस करना मुश्किल था कि कौन-सा गांव अधिक खुशहाल है, क्योंकि प्रकृति ने सभी के हिस्से में अकूत प्राकृतिक संपदा भेंट स्वरूप दी थी।
इन आदिवासियों का जीवन इसी खुशहाली के बीच गुजर रहा था। शुद्ध हवा और पानी के बीच अगर कोई बीमार भी पड़ जाए, तो इन्हीं जंगलों में मौजूद जड़ी-बूटियां उनके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं थीं।
फिर एक दौर आया, जब इन पहाड़ों को खोदने के लिए भारत की नवरत्न कंपनियों में से एक NMDC का प्रवेश इन पहाड़ों में हुआ। कंपनी का काम बैलाडीला के पहाड़ों से लौह अयस्क का उत्खनन कर उसे जापान निर्यात करना था। हजारों की तादाद में मजदूरों को प्रदेश और दूसरे राज्यों से लाया गया। उनका काम लौह अयस्क का उत्खनन करना और उसे धोकर प्राप्त शुद्ध लौह अयस्क को निर्यात योग्य बनाना था।
कारखाने खुले, रेलवे लाइन बिछी और सर्वप्रथम NMDC के 14 नंबर और 5 नंबर प्लांट खुले। देश को बेतहाशा राजस्व मिलने लगा। NMDC की ख्याति और मुनाफा दिन-दूनी, रात-चौगुनी बढ़ने लगा। लेकिन इसका हर्जाना पहाड़ के दोनों ओर बसे सैकड़ों गांवों को भुगतना पड़ा।
पहाड़ों में लौह अयस्क के उत्खनन और उसकी धुलाई के कारण निकलने वाला लाल पानी प्राकृतिक जलस्रोतों में मिलकर गांवों की ओर बहने लगा। जिन नदी-नालों में कभी ग्रामीण स्वस्थ मछलियां पकड़कर खाते थे, वे नदी-नाले लाल होने लगे। खेत धीरे-धीरे बंजर होने लगे।
लाल पानी से निजात दिलाने और मुआवजा देने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो गया। दूसरी ओर, लगातार नए प्रोजेक्ट बढ़ते गए और खनन का क्षेत्र भी फैलता गया। इसके साथ ही लाल पानी भी अपने क्षेत्र का विस्तार करता चला गया।
लगातार आंदोलन और विरोध के बीच NMDC प्रबंधन ने पहाड़ के इस पार, जहां उसकी टाउनशिप मौजूद है, ग्रामीणों को शांत करने के उद्देश्य से कुछ जनकल्याणकारी कार्य शुरू किए। गांवों में नलकूप खनन, स्कूल और आश्रमों के लिए धनराशि उपलब्ध कराने जैसे काम किए जाने लगे। अपने कर्मचारियों के लिए बनाए गए अस्पताल में कुछ आदिवासियों के लिए निशुल्क उपचार की व्यवस्था भी की गई।
आंदोलन चलता रहा और उद्योग भी फलता-फूलता रहा। आदिवासियों के इस आंदोलन में पहाड़ के पीछे बसे आदिवासियों की सहभागिता लगभग समान रहती थी। किंतु वे केवल आंदोलन के हिस्सेदार रहे, लाभ और मुआवजे के नहीं।
तालपेडू नदी के किनारे चट्टान पर बैठे 55 वर्षीय भीमा राम सोढ़ी अपनी पुरानी जिंदगी को याद करते हुए बताते हैं कि उनकी जिंदगी कितनी खुशहाल थी। वे अपने पिता और अन्य गांववालों के साथ शिकार करने जाते थे। रोज कुछ न कुछ शिकार मिल ही जाता था। जिस दिन शिकार पर नहीं जाते, उसी नदी से बड़ी-बड़ी मछलियां पकड़ते थे और मीठा पानी पीकर खुशहाल जीवन बिताते थे।
उनके खेत बारहों महीने फसलों से लहलहाते थे। बरसात के मौसम में धान और उसके बाद अलग-अलग साग-सब्जियों से खेत भरे रहते थे।
फिर एक दिन उन्होंने अपने खेत और तालपेडू नाले में लाल पानी बहकर आते देखा। इसके बाद सब कुछ बदल गया। खेत धीरे-धीरे बंजर होने लगे। वन्य प्राणियों के साथ-साथ मवेशियां भी लाल पानी पीकर मरने लगीं।
चार दशकों से अधिक समय से भीमा, उनके गांववाले और पहाड़ के पीछे बसे दर्जनों गांवों के लोग आंदोलन करते आ रहे हैं। लेकिन आज तक कोई जिम्मेदार उनके गांव में झांकने तक नहीं आया। मुआवजे की बात तो दूर है। वे कहते हैं कि वे केवल आंदोलन में हिस्सेदार हैं, लाभ या मुआवजे में नहीं।
तमोड़ी गांव के युवक रामा सोढ़ी कहते हैं कि जिस NMDC के कारण उनका गांव बर्बाद हो गया, उनके खेत बंजर हो चुके हैं और मवेशियां मर गई हैं। उनका आरोप है कि जब वे अपनी गर्भवती पत्नी को NMDC द्वारा संचालित अस्पताल लेकर गए, तो उन्हें उपचार के लिए भर्ती तक नहीं किया गया। उन्हें बताया गया कि वे दूसरे जिले के निवासी हैं।
रामा सोढ़ी कहते हैं, “यानी NMDC हमें पीने के लिए जहर दे और उपचार भी न करे।”
बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी कहते हैं कि NMDC परियोजना के कारण पहाड़ के पीछे रहने वाले लोगों की जिंदगी नर्क जैसी हो गई है। उनके हक के लिए उन्होंने 50 किलोमीटर तक पदयात्रा की थी, लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। उन्होंने कहा कि जल्द ही फिर आंदोलन किया जाएगा और इस बार आंदोलन NMDC के प्रवेश द्वार पर होगा।
विक्रम मंडावी का यह भी आरोप है कि ग्रामीणों के लिए परियोजना निधि के तहत जो राशि आवंटित होती है, उसका लाभ भी इन ग्रामीणों को नहीं मिल पाता।
एक ओर बैलाडीला से निकला लौह अयस्क देश और कंपनी की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता रहा, तो दूसरी ओर उसी पहाड़ के पीछे बसे गांवों में लाल पानी ने खेत, नदी, मवेशी और लोगों की जिंदगी को बदल दिया। चार दशक से अधिक समय से जारी यह संघर्ष आज भी उसी सवाल के साथ खड़ा है—जिस विकास से देश और उद्योग को लाभ मिला, उसकी कीमत चुकाने वाले इन ग्रामीणों के हिस्से में आखिर क्या आया?











