‘बुद्धि विरोधी’ दौर में ‘यंत्र-बुद्धि’ की चुनौती!

ai impact summit

हाल ही में दिल्ली में आयोजित ‘AI इम्पैक्ट समिट’ को ब्लूमबर्ग की पत्रकार कैथरीन थोर्बेक ने अपने ओपिनियन कॉलम में “तमाशा” करार दिया। वह कहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े-बड़े पोस्टर्स और AI के महिमामंडन से शहर भरा पड़ा था, लेकिन आयोजन में असली इनोवेशन की बजाय अव्यवस्था और दिखावा हावी रहा। विदेशी मेहमानों को लंबी लाइनों में खड़े रहना पड़ा, और एक दिन तो पूरा वेन्यू मोदी की फोटो सेशन के लिए खाली करा दिया गया। 

जब देश का मुख्यधारा का मीडिया प्रधानमंत्री मोदी के गुणगान को ही पत्रकारिता समझ बैठा है, एक विदेशी पत्रकार ने हक़ीक़त बतायी है। यह नवीन तकनीक और अनुसंधान को लेकर शासकीय समझ का एक उदाहरण भर है। जिस गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन से मँगाये गए रोबोडॉग को अपना इन हाउस इनोवेशन बताकर जगहँसाई कराई थी, वह सरकार की आँख का तारा है।

डीडी न्यूज़ ने इस पर बाक़ायदा ख़बर प्रसारित की थी और आईटी मिनिस्टर ने भी एक्स पर इसकी वाहवाही की थी। यह वही विश्वविद्यालय है, जिसने कोरोना दूर भगाने के लिए में ताली-थाली बजवाने के पीएम मोदी के ‘तमाशे’ को सही ठहराने के लिए बाक़ायदा रिसर्च पेपर प्रकाशित किया था।  

ग़ौर से देखिेए तो इस समय देश अवैज्ञानिकता के तूफ़ान में फँसा हुआ है। पीएम मोदी ख़ुद को ‘नॉन-बायलोजिकल’ घोषित कर चुके हैं और ऐसे बाबाओं की धूम है, जो ख़ुद को सीधे भगवान का अवतार बता रहे हैं। गाँव-कस्बे और शहरों में पौराणिक कथाओं का न थमने वाला सिलसिला नज़र आ रहा है, जहाँ अंधश्रृद्धा में डूबे लोग ‘सब कुछ हरि इच्छा’ के भजनों पर झूम रहे हैं।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अवैज्ञानिकता को अभूतपूर्व प्रतिष्ठा हासिल हुई है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वैज्ञानिक चेतना के प्रसार को सामाजिक विकास की जरूरी शर्त मानते थे। भारत का संविधान भी ‘साइंटिफिक टेंपरामेंट’ के प्रसार को राज्य का दायित्व मानता है, लेकिन मोदी काल में इस समझ को पूरी तरह उलट दिया गया है। मोदी वैज्ञानिकों और डाक्टरों की सभा में बेहिचक दावा कर चुके हैं कि गणेश जी को हाथी का सिर लगाने की कथा प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी के होने का सबूत है। उनका ये आत्मविश्वास ‘नाले की गैस पर खाने बनाने’ की तकनीक तक ले जाता है।

‘अहो-रूपम अहो-ध्वनि’ वाले इस माहौल में पीएम मोदी को टोके भी कौन! हाल ये है कि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ब्रेक लगाने से बिजली बनने की तकनीक को “नयी जादुई टेक्नोलॉजी” बताते हुए पीएम मोदी के विज़न को इसका श्रेय दे डाला। जबकि यह ‘रिजेनेरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम’ 1990s से इंडियन रेलवे में इस्तेमाल हो रहा है। स्विट्जरलैंड से टेक्नोलॉजी ट्रांस्फ़र के बाद 2009 तक यह पूरी तरह भारतीय हो गई।

इस माहौल में पहला शिकार सामान्य बुद्धि ही होती है। कृत्रिम या यंत्र बुद्धि के विकास की पहली शर्त है कि कोई देश सामान्य बुद्धि के क्षेत्र में कहाँ खड़ा है। अगर सामान्य ज्ञान और सामान्य बुद्धि के विकास में गति नहीं है तो कृत्रिम बुद्धि में कोई छलाँग लगाना संभव नहीं है। कृत्रिम बुद्धि हवा से पैदा नहीं होती, एआई लर्निंग मशीन का स्रोत विपुल सामान्य बुद्धि ही होती है, जिसे वह प्रासेस करती है। निश्चित ही यह मानवीय क्षमता से हज़ार गुना ज़्यादा होती है, लेकिन अंतिम उत्पाद का संबंध कच्चे माल यानी सामान्य बुद्धि की मौजूदा स्थिति से होता है। यह वैसा ही है जैसे तकनीक के विकास का आधार बुनियादी विज्ञान के क्षेत्र में होने वाला अनुसंधान होता है।

तो भारत में सामान्य बुद्धि विकास के कार्यक्रमों की क्या स्थिति है? कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में किसी ऊँचाई पर पहुँचने के लिए जरूरी है कि भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा का एक मज़बूत ढाँचा मौजूद हो। पर हक़ीक़त ये है कि बीते दस सालों में देश में 93 हज़ार स्कूल बंद हुए हैं। इंडियन साइंस कांग्रेस में स्टेम सेल और एयरक्राफ्ट के प्राचीन होने के दावे सुनाई देते हैं। वेदों में विज्ञान या गोमूत्र और गोबर के गुणों पर आईआईटी जैसे संस्थान रिसर्च कर रहे हैं। स्कूली पाठ्यक्रमों से डार्विन का विकासवाद और पीरियॉडिक टेबल जैसे पाठ हटाए जा रहे हैं।

धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति ने बीजेपी को सत्ता के शिखर तक तो पहुँचा दिया, लेकिन इस शिखर पर विज्ञान के लिए कोई जगह नहीं है। यह संयोग नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने ‘ए आई’ की चर्चा शुरू होते ही यह दावा कर दिया कि भारत में तो बच्चे शुरू से अपनी माँ को ‘ए आई’ कहते हैं।  

1980s में भारत और चीन आर्थिक रूप से समान थे। दोनों का GDP प्रति व्यक्ति $350 के आसपास था। लेकिन चीन ने साइंस में भारी निवेश किया, जबकि भारत मंदिर-मस्जिद विवाद में उलझ गया। नतीजा ये हुआ कि भारत लगातार चीन से पिछड़ता चला गया क्योंकि वैज्ञानिक विकास के लिए जैसा ज्ञानवान समाज बनाने की ज़रूरत थी, वह प्राथमिकता से बाहर हो गया। कोरोना आया तो सरकारी स्तर पर इसके पीछे तबलीगियों का जेहाद ढूँढा जा रहा था।

चीन अनुसंधान व विकास (R&D) पर GDP का 2.8 प्रतिशत खर्च करता है। यह 2025 का आंकड़ा है, जो 2024 के 2.69 प्रतिशत से बढ़ा। शिक्षा पर चीन GDP का 4.0 प्रतिशत लगाता है। यह 2023 का नवीनतम उपलब्ध डेटा है, जो विश्व औसत के करीब है। भारत R&D पर GDP का 0.64 प्रतिशत खर्च करता है। यह 2025-26 इकोनॉमिक सर्वे का आंकड़ा है, जो 2020-21 के 0.64 प्रतिशत के समान है। शिक्षा पर भारत का कुल (केंद्र + राज्य) खर्च GDP का लगभग 4.1 प्रतिशत है। यह 2022 का डेटा है; 2026-27 बजट में केंद्र का हिस्सा 0.6 प्रतिशत है, लेकिन कुल 4 प्रतिशत के आसपास रहने की उम्मीद है। इसका अर्थ यह नहीं कि शिक्षा पर दोनों लगभग बराबर खर्च करते हैं। भारत की आबादी चीन से थोड़ा ही ज़्यादा है जबकि चीन की जीडीपी भारत से साढ़े चार गुना ज़्यादा है।

ज़ाहिर है, दुनिया में एआई के विकास के साथ एक नयी परिस्थिति पैदा हो रही है जिसमें मानवीय क्षमता से हज़ार गुना ज़्यादा क्षमता से काम करने वाली मशीनें हर क्षेत्र में अपना जौहर दिखायेंगी। यह लहर बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी का तूफ़ान पैदा करेगा जो भारत जैसे देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। इससे निकलने वाले अवसरों को अपनी शक्ति बना लेने के लिए जैसे सुशिक्षित और तार्किक समाज की ज़रूरत है, वह अनुपस्थित है।

क्यों न माना जाए कि यह ‘बुद्धि-विरोधी’ माहौल सरकार का बनाया एक मकड़-जाल है, जिसमें फँसकर जनता ‘जैसी हरि इच्छा’ का मंत्र रटते हुए सरकारों को उसकी जिम्मेदारी से बरी करती रहे? इस दाँव से राजनीति तो सध सकती है लेकिन ख़तरा ये है कि देश ए.आई जैसे बड़े अवसर के सामने  ‘आई-आई’ ही करता न रह जाए!

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