क्या सिजिमाली का संघर्ष भी नियमगिरि की तरह इतिहास बनाएगा?

Sijimali

सिजिमाली के जनप्रतिरोध पर द लेंस की विशेष रिपोर्ट

इन दिनों आदिवासियों के प्रतिरोध की तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल है। यहां नारे लगते रहते हैं। इन नारों को सुनकर समझ आता है कि आदिवासी जान देने को तैयार हैं, लेकिन अपने पहाड़ अपने जंगल अपने खनिज की लूट हरगिज नहीं होने देंगे।

दूसरी तरफ फोर्स है जो इस आदिवासी प्रतिरोध के खिलाफ लाठियों बंदूको के साथ मुस्तैद है, कह रही है यह कानून और व्यवस्था का मामला है।

ये प्रतिरोध देश के उस इलाके में हो रहा है, जहां भूख है, गरीबी है, वंचित शोषित आदिवासी और दलित हैं। ये प्रतिरोध ओड़िशा के रायगढ़ा जिले के जंगलों और पहाड़ों के बीच बसे गांवों की हैं।

वीडियो रिपोर्ट देखें…

गांव लंबी लड़ाई के लिए तैयार हैं और सरकार उद्योगपति जमीन पाने, उद्योग लगाने की जिद पर हैं। ये बड़े कॉर्पोरेट वेदांता को जमीन देने और उसके खिलाफ संघर्ष की तस्वीरें हैं। ओड़िशा, ऐसे संघर्ष नियमगिरि क्षेत्र में पहले भी देख चुका है। राज्य के इस हिस्से यानी की सिजिमाली में फिर एक बड़े प्रतिरोध की इबादत पढ़ी जा सकती है।

द लेंस की टीम सिजिमाली पहाड़ क्षेत्र के उस गांव तक पहुंची, जहां लोगों ने कथित पुलिस कार्रवाई का सामना किया।

आईये पढ़िए… इन पहाड़ों के लोगों की आवाज, उनका डर, और अपने जंगल-जमीन को बचाने का उनका संघर्ष।

सिजिमाली में 311 मिलियन टन से ज्यादा बॉक्साइट

ओडिशा के रायगढ़ा जिले की इन पहाड़ियों को स्थानीय लोग सिजिमाली या तिजमाली के नाम से जानते हैं। यहां की चोटी पर एक गुफा है, जिसे लोग अपने सर्वोच्च देवता तिज राजा का निवास मानते हैं।

स्थानीय आदिवासी और दलित समुदायों का विश्वास है कि तिज राजा इस भूमि, जंगलों और लोगों की रक्षा करते हैं।

सिजिमाली सिर्फ एक पहाड़ी नहीं है। यह सौ से ज्यादा बारहमासी धाराओं का स्रोत है, जो आसपास की खेती को जीवन देती हैं।
यहां के जंगलों में औषधीय जड़ी-बूटियां मिलती हैं, जिनसे आदिवासी पारंपरिक इलाज करते हैं।

लेकिन इन पहाड़ियों के भीतर छिपा है बॉक्साइट — एल्युमिनियम बनाने का मूल अयस्क। और यही खनिज अब इस पूरे इलाके को संघर्ष के केंद्र में ले आया है।

मार्च 2023 में ओडिशा सरकार ने लगभग 1549 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली सिजिमाली बॉक्साइट खदान का पट्टा वेदांता कंपनी को दिया। इस क्षेत्र का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से ढका हुआ है।

सिजिमाली में बॉक्साइट खदान करीब 1,500 हेक्टेयर में फैली है, जहां 8 ग्राम पंचायतों के प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई है।

जानकारी के मुताबिक, इस क्षेत्र में 311 मिलियन टन से ज्यादा उच्च गुणवत्ता वाला बॉक्साइट मौजूद हैं। इसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये आंकी जा रही है।

अब इस खजाने पर वेदांता कंपनी की नजर है। वेदांता ग्रुप ने यहां हर साल 9 मिलियन टन बॉक्साइट खनन का प्रस्ताव रखा है और कुल मिलाकर 18 मिलियन टन प्रति वर्ष उत्खनन की योजना बनाई है।

इस परियोजना के खिलाफ स्थानीय लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। और इसकी वजह से इस इलाके में युवाओं से लेकर महिलाओं को फर्जी एफआईआर का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं महीनों इन्हें जेल में गुजारना पड़ रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि खनन की मंजूरी के लिए जो ग्राम सभाएं दिखाई गईं, वो पूरी तरह फर्जी थीं।

खनन शुरू हुआ तो जमीन, जंगल और नदियां… सब खत्म हो जाएंगे

इसी इलाके में रहने वाले गोविंदा नायक का कहना है कि यह खनन उनके जल स्रोतों को खत्म कर देगा। साथ ही खेती और जंगल पर निर्भर उनकी आजीविका को बर्बाद करने के साथ ही पूरे इलाके के पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा।

गोविंदा नायक।

कालाहांडी और रायगढ़ा जिले के सिजिमाली के इस क्षेत्र में कोंध और पराज आदिवासी समुदायों के साथ-साथ डोम दलित समुदाय भी रहते हैं, जिनकी आजीविका खेती और जंगल पर निर्भर है। 

जुलाई 2023 से ही गांवों के लोग इस खनन परियोजना का विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर खनन शुरू हुआ, तो उनकी जमीन, जंगल और नदियां — सब खत्म हो जाएंगे।

गोविंदा का कहना है कि ‘यह सिर्फ जमीन का सवाल नहीं है, यह हमारी संस्कृति, आस्था और अस्तित्व का सवाल है।’ अगर सरकार को विकास करना ही है तो यहां यूनिवर्सिटी बनाए, खेती बढ़ाए और अस्पताल बनाए, लेकिन उद्योगों को खनन के लिए सिजिमाली का इस्तेमाल नहीं होने देंगे।

सिजिमाली में वेदांता के खनन का विरोध कर रहे कार्तिक नायक के खिलाफ करीब 14 एफआईआर हो चुकी हैं। इस दौरान करीब सालभर उन्हें जेल में भी रहना पड़ा।

कार्तिक नायक।

कार्तिक कहते हैं कि हमारा गुनाह यह है कि हम अपने सिजिमाली को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। बिना गुनाह के हमारी हिस्ट्रीशीट तैयार कर दी गई है। मेरा छोटा भाई भी जेल में है। और मेरी पत्नी के खिलाफ भी झूठा मुकदमा दर्ज किया गया है। हैरान करने वाली बात यह है कि हमारे पास हाफ मर्डर, डकैती, चोरी, लूट, धमकी के धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है।

कार्तिक से पूछा गया कि इस तरह एफआईआर से उन्हें डर नहीं लगता तो उन्होंने कहा कि हम लोग अनपढ़ नहीं है। हम अपने जल और जंगल को बचाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ेंगे।

कार्तिक कहते हैं कि अगर सिजिमाली में खनन शुरू हुआ, तो आसपास की कई पहाड़ियां भी खतरे में पड़ जाएंगी।

सड़क बनाने से फिर शुरू हुआ विवाद

अप्रैल महीने के शुरुआती दिनों में विवाद एक बार फिर तेज हो गया, जब खनन क्षेत्र तक सड़क बनाने की कोशिश शुरू हुई। स्थानीय ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और कहा कि यह सड़क खनन परियोजना के लिए बनाई जा रही है।

इस विरोध के बाद 7 अप्रैल 2026 की तड़के कांतामल गांव में बर्बर पुलिस कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में तनाव बढ़ गया।

ग्रामीणों का आरोप है कि सुबह करीब तीन बजे सशस्त्र पुलिस बल ने गांव को घेर लिया, बिजली काट दी गई और लाठीचार्ज व आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया।कई लोग घायल हैं।

वहीं प्रशासन का कहना है कि सड़क निर्माण में बाधा डाल रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई और पुलिस पर पत्थरबाजी हुई। इस झड़प में लगभग 50 लोग घायल बताए जा रहे हैं, जिनमें करीब 40 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं।

नियमगिरि के संघर्ष की दिलाई याद, लेकिन क्या कामयाब हो सकेंगे आदिवासी?

सिजिमाली का यह संघर्ष नया जरूर है, लेकिन इसकी गूंज ओडिशा के ही एक ऐतिहासिक आंदोलन से जुड़ती है — नियमगिरि का संघर्ष।

ओडिशा की नियमगिरि में रहने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने भी कभी इसी कंपनी के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी।

वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद नियमगिरि क्षेत्र की ग्राम सभाओं से पूछा गया था कि क्या वे खनन की अनुमति देना चाहते हैं।

2013 में नियमगिरि में बॉक्साइट खनन के खिलाफ प्रदर्शन करने स्थानीय आदिवासी।

ग्राम सभाओं ने सर्वसम्मति से खनन का विरोध किया। इसके बाद वेदांता कंपनी को नियमगिरि में बॉक्साइट खनन की इजाजत नहीं मिल पाई।

सिजिमाली और नियमगिरि की पहाड़ियां भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
स्थानीय लोग तिज राजा के साथ-साथ नियम राजा का भी आह्वान करते हैं।

10 अप्रैल को वामपंथी दलों और कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल भी यहां पहुंचा। उन्होंने राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार को ‘डबल इंजन नहीं, डबल डिजास्टर’ की सरकार बताया।

सवाल अब सिर्फ सिजिमाली का नहीं है। सवाल यह है कि क्या यहां का संघर्ष भी नियमगिरि की तरह इतिहास बनाएगा, या इस बार पहाड़ और यहां के लोग हार जाएंगे?

क्या एक बार फिर अदालतों और खासकर Supreme Court का वही रुख देखने को मिलेगा, जिसने 2013 में नियमगिरि के आदिवासियों के पक्ष में फैसला दिया था?

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दानिश अनवर

दानिश अनवर, द लेंस में जर्नलिस्‍ट के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता में करीब 14 वर्षों का अनुभव है। द लेंस से पहले दैनिक भास्‍कर में इन्‍वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग टीम में सीनियर रिपोर्टर, नवभारत में क्राइम रिपोर्टर, नईदुनिया में स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट और पत्रिका अखबार में रिपोर्टर के तौर पर 10 साल काम किया। इन सभी अखबारों में दानिश अनवर ने विभिन्न विषयों जैसे- क्राइम, पॉलिटिकल, एजुकेशन, स्‍पोर्ट्स, कल्‍चरल और स्‍पेशल इन्‍वेस्टिगेशन स्‍टोरीज कवर की हैं। दानिश को प्रिंट का अच्‍छा अनुभव है। वह सेंट्रल इंडिया के कई शहरों में काम कर चुके हैं।

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