सीवान की रहने वाली वैष्णवी बताती हैं, ‘मैं करीब 20 घंटे से सोशल मीडिया नहीं खोल पाई हूं। वीडियो इतनी भयावह है कि रूह कांप जाती है। मैं एक छोटे शहर से पटना पढ़ने आई हूं। पैसे और दूसरी वजहों से कई लड़कियां पटना नहीं आ पाती। राजधानी में बेहतर व्यवस्था है, लेकिन छोटे शहरों में किसी लड़के के साथ घूमना भी मुश्किल है। इस घटना ने हम लड़कियों को फिर याद दिला दिया कि हमें क्या पहनना है और किसके साथ घूमना है।’
जमुई (Jamui) की इस घटना ने बिहार की कई महिलाओं के बीच सुरक्षा, आवागमन और सार्वजनिक स्थानों को लेकर मौजूद डर और चिंता को सामने ला दिया है। लड़कियों को यह डर भी है कि ऐसी घटनाएं बिहार और यहां के लोगों को लेकर बनी रूढ़ियों को और मजबूत कर सकती हैं। वे चाहती हैं कि सुरक्षा के नाम पर लड़कियों को पढ़ाई, काम, यात्रा और अपनी पसंद का स्वतंत्र जीवन जीने की आजादी से वंचित न किया जाए।

राष्ट्रीय महिला आयोग की NARI-2025 रिपोर्ट के मुताबिक, पटना समेत 31 शहरों में शहरी क्षेत्रों की करीब 40 प्रतिशत महिलाएं अपने शहर में खुद को पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानती। वहीं, बिहार राज्य पथ परिवहन निगम और निजी एजेंसी MSC (माइक्रोसेव कंसल्टिंग) के साझा अध्ययन के मुताबिक, परिवहन सुविधा का अभाव और असुरक्षा के कारण बिहार की 27 प्रतिशत महिलाएं पढ़ाई और नौकरी छोड़ रही हैं। यह रिपोर्ट राजधानी पटना की है तो जमुई जैसे छोटे शहरों का अंदाजा आप लगा सकते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 21 सितंबर को बिहटा में दसवीं कक्षा की एक नाबालिग छात्रा का अपहरण कर दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई। मुजफ्फरपुर के बरूराज में दो नाबालिग छात्राओं पर चाकू से हमला किया गया। दरभंगा के जमालपुर इलाके में परीक्षा देने जा रही 10वीं कक्षा की एक नाबालिग छात्रा का अपहरण करने का प्रयास किया गया। मधेपुरा जिले के गम्हरिया थाना क्षेत्र में प्रेम प्रसंग में एक महिला की चाकू गोदकर हत्या कर दी गई। वहीं, सीतामढ़ी के जानकी स्थान इलाके में सोशल मीडिया पर लड़की की तस्वीर को लेकर हुए विवाद में युवकों ने उसके पिता पर चाकू से हमला कर दिया।
महिलाओं के प्रति हिंसा और अपराध की ये घटनाएं उसी बिहार में सोमवार को सामने आईं, जिस दिन जमुई की घटना सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि बाकी घटनाएं स्थानीय अखबारों की खबरों से आगे सोशल मीडिया तक नहीं पहुंच सकीं।
राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों के मामले पिछले वर्षों में बढ़े हैं। 2020 में 15,359 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 27,359 हो गई। यानी इस अवधि में दर्ज मामलों में करीब 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
ग्रामीणों के मुताबिक 19 तारीख को हुई घटना का वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तब पुलिस गांव पहुंची। उनका कहना है कि अगर घटना का वीडियो सामने नहीं आता, तो शायद लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं होती।
अपराधी के एनकाउंटर के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि अगर उसने घटना की रील नहीं बनाई होती, तो क्या वह पकड़ा जाता? लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि जिन अपराधों की रील नहीं बनती, उनका क्या?
सवाल सिर्फ एक घटना का नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की निगरानी और कार्रवाई के तरीके का भी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ‘रूल ऑफ लॉ’ से ‘रील ऑफ लॉ’ की तरफ बढ़ रहे हैं?
सुशासन की नहीं, जात की बात हो रही है
“हम सिर्फ बातें नहीं करते, बल्कि कार्रवाई करके दिखाते हैं। जमुई वाले मामले की जानकारी तो सबको लग ही गई होगी। तेजस्वी जी कहते रहे हैं ना कि बिहार-यूपी का हर ‘यादव’ उनका भाई है। तो उन्हीं भाइयों में से कुछ भाइयों ने जमुई में लड़की छेड़कर वीडियो बनाया था।” यह बयान बिहार सरकार के केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का है।
गौरतलब है कि मुख्य आरोपी नंदन यादव पुलिस मुठभेड़ में पैर में गोली लगने से घायल हो गया और बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। एक अन्य आरोपी को भी गिरफ्तार किया गया, जिससे गिरफ्तार किए गए लोगों की कुल संख्या पांच हो गई है, जबकि पुलिस ने इस मामले में सात लोगों की पहचान की है।
जमुई की घटना में आरोपी नंदन यादव के एनकाउंटर के बाद केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का बयान एक सवाल जरूर खड़ा करता है, क्या किसी अपराधी की जाति के आधार पर उस पूरी जाति को अपराध से जोड़ना सही है?
तेजस्वी यादव ने भी सवाल उठाया कि जब जमुई के एसपी के मुताबिक घटना में कई युवक शामिल थे, तो बाकी आरोपियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और उनकी पहचान सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह का कहना है कि,”नंदन यादव के एनकाउंटर के बाद बीजेपी जमुई की पूरी घटना को ‘अपराधी यादव’ से जोड़कर बिहार की जनता को लालू राज की याद दिलाने की कोशिश कर रही है। नंदन यादव शराब और बालू के कारोबार से जुड़ा चर्चित नाम है। यादव का नाम आते ही सरकार नैरेटिव गढ़ने में लग गई लेकिन इसमें हर जाति के लोग है। एक जाति को निशाना बनाने के बजाय पूरे सिंडिकेट पर कार्रवाई जरूरी है।”
नेताओं का वीडियो वायरल
इस घटना में साइबर पुलिस भी काफी एक्टिव नजर आई। बिहार पुलिस के मुताबिक जिन्होंने भी नाबालिग बच्चों का यौन हिंसा का वीडियो वायरल किया है, उनके खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। साइबर थाने में 120 सोशल मीडिया अकाउंट यूजर्स पर एफआईआर दर्ज की गई है।
वहीं दूसरी तरफ बिहार की वरिष्ठ पत्रकार नेहा सिंह राठौड़ ने सवाल उठाया है कि बिहार में शराबबंदी के बावजूद मुख्य आरोपी नंदन यादव के सोशल मीडिया पोस्ट में कथित तौर पर शराब पीते हुए उसका वीडियो दिखाई देता है। उन्होंने बिहार की साइबर पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाया है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर ऐसी गतिविधियां पुलिस की नजर में नहीं आती? क्या कार्रवाई के लिए किसी बड़ी घटना का इंतजार जरूरी है?
जहां इस शर्मनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है, दिल्ली तक तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही हैं। वहीं सत्ताधारी पार्टी के इन नेताओं के बयान भी काफी वायरल हो रहे हैं। बिहार की मंत्री श्रेयसी सिंह ने मीडिया में बात करते हुए कहा कि उन्हें इस बात का दुख है कि आरोपियों ने पीड़िता के साथ 𝐌𝐨𝐫𝐚𝐥 𝐏𝐨𝐥𝐢𝐜𝐢𝐧𝐠 सही तरीके से नहीं की।
वहीं बिहार में जदयू मंत्री श्रवण कुमार ने जमुई में कथित छेड़छाड़ की घटना को “एक छिटपुट घटना” बताया। और जेडीयू बिहार अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि सरकार संवेदनशील है और लोगों से 2005 से पहले के बिहार को याद करने का आग्रह किया।
गांव का नाम बदनाम होता है
“हमारे गांव में पहाड़ और नदी है। अभी कई लोग घूमने आने लगे हैं। हम लोगों के लिए भी यह अच्छी पहल है। सरकार ऐसे में पर्यटक स्थल बनाएगी, लेकिन इस तरह की घटना से हमारे गांव का नाम और पहचान बदनाम हो रहा है। यह कोई नई घटना नहीं है। इससे पहले भी सुनने को मिला है।” जमुई जिला स्थित मड़वा गांव के रहने वाले सोनू बताते हैं।
स्थानीय पत्रकार कुमार नेहरू बताते हैं कि, “घने जंगल, ऊंची-नीची पहाड़ियां, झरने, हरियाली और प्रकृति की गोद में बसे कई खूबसूरत स्थल… यही है जमुई की पहचान। लेकिन आज सोशल मीडिया पर सामने आई एक घटना ने जमुई के पर्यटन स्थलों की सुरक्षा और छवि को लेकर जरूर चिंता पैदा की है। बिहार में पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।”
गौरतलब है कि जमुई जिले के मड़वा गांव में 19 सितंबर 2026 को शाम करीब 7 बजे जमुई-लखीसराय रोड पर मड़वा पहाड़ी के पास एक नाबालिग छात्र और छात्रा कोचिंग से स्कूटी पर लौट रहे थे। इसी दौरान कुछ मनचलों और गुंडों की भीड़ ने उन्हें जबरन रोक लिया। आरोपियों ने छात्र के साथ मारपीट और गाली-गलौज की।
वहीं, छात्रा के साथ सरेआम छेड़छाड़ और अभद्रता की गई। छात्रा हाथ जोड़कर रोती और गिड़गिड़ाती रही, लेकिन आरोपियों ने उसे सड़क पर घसीटा और जबरन ले जाने की कोशिश की। मौके पर मौजूद लोग मदद करने के बजाय मोबाइल से इस घटना का वीडियो बनाते रहे। घटना के दो दिन बाद, 21 सितंबर को इसका वीडियो वायरल हुआ।
कुछ दिन पहले अप्रैल 2026 में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा से भी ऐसी ही तस्वीर सामने आई थी। नालंदा के अजयपुर गांव में तीन युवकों ने कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से 20 वर्षीय महिला के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार का प्रयास किया था। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था।
ऐसे में सवाल है कि कानून और पुलिस कार्रवाई के बावजूद ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों सामने आती हैं?
इसका जवाब सिर्फ सख्त कानून में नहीं, बल्कि तेज जांच, मजबूत साक्ष्य, समयबद्ध न्याय, पीड़ितों की सुरक्षा और कानून के प्रभावी पालन में है। जमुई मामले में असली परीक्षा गिरफ्तारी या एनकाउंटर की नहीं, बल्कि जांच से लेकर न्यायालय के अंतिम फैसले तक होगी।










