उत्तराखंड में त्रिपुरा के छात्र की हत्याः नफरत से उपजी हिंसा

December 29, 2025 8:19 PM
Tripura student murdered in Uttarakhand

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एमबीए कर रहे त्रिपुरा के 24 वर्षीय युवक एंजेल चकमा की हत्या कोई अनजाने में हुआ हादसा नहीं है, बल्कि जाने-अनजाने पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ फैलाई जाने वाली नफरत का ही नतीजा है।

घटना से पता चलता है कि त्रिपुरा के एक हेड कांस्टेबल के बेटे एजेंल 9 दिसंबर को अपने भाई के साथ बाजार गए थे और वहां कुछ युवकों ने उन्हें ‘चीनी’ बताकर उन पर घातक हथियार से हमला किया, जिससे गंभीर रूप से वह जख्मी हो गए और 26 दिसंबर को अस्पताल में उनकी मौत हो गई। स्तब्ध कर देने वाले इस हमले में शामिल युवाओं में कुछ नाबालिग भी बताए गए हैं।

पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राओं को राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्सों में इसी तरह से नस्लीय टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन इस घटना ने दिखाया कि यह नफरत कहां तक पहुंच चुकी है।

इससे भी दुखद यह है कि एजेंल पर हुए हमले के बाद उत्तराखंड की पुलिस ने इस पर लीपापोती करने की कोशिश की और चौतरफा आवाजें उठने के बाद ही उसने इस मामले में एफआईआर दर्ज की।

हमें बहुत दुख के साथ याद दिलाना पड़ रहा है कि कुछ दिन पहले ही हमें यहां केरल में छत्तीसगढ़ के एक प्रवासी मजदूर को बांग्लादेशी बताकर की गई हत्या के बारे में लिखना पड़ा था। दो दिन पहले ओडिशा के संबलपुर में पश्चिम बंगाल के एक बीस वर्षीय 20 प्रवासी मजदूर को बांग्लादेशी बताकर मार डाल गया!

चाहे पूर्वोत्तर के लोगों को चीनी नागरिक बताकर निशाना बनाया जाए या प्रवासी मजदूरों को बांग्लादेशी बताकर उनकी हत्या की जाए, इनके पीछे जो एक तत्व काम करता है, वह नफरत और उन्माद से उपजी हिंसा ही है।

यह शर्मनाक है कि एंजेल चकमा ने अपने हमलावरों को चीख चीख कर बताया था कि वह उन्हीं की तरह भारतीय है, इसके बावजूद उस पर बर्बरता से हमला किया गया।

सवाल यही है कि ये कौन लोग हैं, जो देश के नागरिकों की नागरिकता पर सवाल कर रहे हैं? कौन लोग हैं, जो भारत के लोगों को ही कभी चीनी या बांग्लदेशी या कभी पाकिस्तानी बताते हैं और उन पर हमले करते हैं? इन्हें ये अधिकार किसने दिया?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री धामी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की बात कह रहे हैं, लेकिन एजेंल चकमा के रूप में उनके माता-पिता ने जो बेटा खोया है, क्या उसकी भरपाई हो पाएगी?

दुखद यह भी है कि ऐसी हर घटना के समय उठी आवाजों के थमने के बाद एक सामूहिक चुप्पी ओढ़ ली जाती है।

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