नक्सलियों के डर से भागे थे ग्रामीण, अब प्रशासन के बुलडोजर ने छीनी छत

January 17, 2026 11:38 AM

बीजापुर में 75 घर ढहाए गए, मासूम बच्चे खुले आसमान के नीचे

बीजापुर। बस्तर में आम लोगों का दर्द थमने का नाम नहीं ले रहा है। कभी नक्सलियों के भय से अपनी ज़मीन, जंगल और गांव छोड़ने को मजबूर हुए ग्रामीण अब प्रशासन की कार्रवाई में अपने आशियानों से भी बेदखल हो गए हैं।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर नगर में बुधवार को जिला प्रशासन और नगरपालिका की संयुक्त कार्रवाई में न्यू बस स्टैंड के पीछे बने 75 मकानों को ‘अतिक्रमण’ बताकर बुलडोजर से ढहा दिया गया। इस कार्रवाई में अब तक करीब 20 मकान पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं, जबकि शेष पर कार्रवाई जारी है।

इस कार्रवाई ने उन परिवारों को सड़क पर ला खड़ा किया है, जिनमें अधिकांश नक्सल पीड़ित आदिवासी परिवार और DRG (डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड) के जवानों के परिवार शामिल हैं।

कई घरों में आज भी दूधमुंहे बच्चे हैं, जो अब खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हैं।

सबसे मार्मिक स्थिति उन परिवारों की है, जहां पिता नक्सल विरोधी अभियान में मोर्चे पर हैं और पीछे घर पर रह गई पत्नी और मासूम बच्चों के सामने बुलडोजर ने उनका आशियाना ढहा दिया।

एक ओर जवान जंगलों में जान जोखिम में डालकर ऑपरेशन में जुटे हैं, दूसरी ओर उनके घरों को ‘अवैध’ बताकर तोड़ा जा रहा है।

बिना नोटिस अचानक चल गया बुलडोजर

प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्ष 2022 से यहां मकान बनाकर रह रहे हैं।

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कार्रवाई से पहले न तो कोई मुनादी कराई गई, न ही समय पर नोटिस मिला। एक पीड़ित ग्रामीण ने कहा कि हम दो दिन की मोहलत मांग रहे थे ताकि घर का जरूरी सामान निकाल सकें, लेकिन किसी ने हमारी एक नहीं सुनी।

कार्रवाई के दौरान मौके पर नगरपालिका बीजापुर, तहसीलदार बीजापुर और पुलिस बल की भारी तैनाती रही।

अधिकारियों से मोहलत की गुहार लगाते रहे ग्रामीणों की आवाज़ बुलडोजर की आवाज में दबती चली गई।

मुख्य नगरपालिका अधिकारी बी. एल. नुरेटी और तहसीलदार पंचराम सलामे ने बताया कि दो बार नोटिस जारी किया जा चुका था। अतिक्रमण नहीं हटाए जाने के कारण नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। कुल 75 मकान कार्रवाई के दायरे में हैं।

प्रशासन की कार्रवाई ने खड़े किए कई सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं— क्या नक्सल पीड़ितों के पुनर्वास की कोई ठोस नीति ज़मीन पर उतरी है?

क्या प्रशासनिक कार्रवाई में मानवीय संवेदना की कोई जगह नहीं?

क्या देश की सुरक्षा में लगे जवानों के परिवारों को भी बेघर किया जाना जायज़ है?

बस्तर में जहां नक्सलवाद के खात्मे की बातें हो रही हैं, वहीं जमीन पर हालात यह हैं कि पीड़ित जनता आज भी डर, विस्थापन और बेबसी के बीच पिस रही है।

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