अमानवीयता के कारागार

February 14, 2026 8:37 PM
The plight of Indian prisons

हाल के दिनों की दो खबरें देश की जेलों के हाल बयां कर रही हैं कि किस तरह से वह अमानवीयता के कारागार में तब्दील हो गई हैं। जेलें सामूहिक त्रासदी के केंद्र बन जाएं यह सोचकर तो जेलों की परिकल्पना नहीं ही की गई होगी।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल ने रायपुर सेंट्रल जेल की अमानवीय स्थितियों पर जो गंभीर दावे किए हैं, वे न केवल एक व्यक्तिगत अनुभव का दर्दनाक बयान हैं, बल्कि पूरे भारतीय जेल तंत्र की सड़ांध को उजागर करने वाले एक आईना हैं। हालांकि वह शराब घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तारी के बाद 170 दिनों तक जेल में बिताकर फिलहाल जमानत पर हैं।

चैतन्य ने देश के जाने माने वकील कपिल सिब्बल के साथ एक पॉडकास्ट में बताया कि जेल में पीने के पानी की गुणवत्ता खराब थी, बीमारी पर इलाज की कोई ठोस व्यवस्था नहीं और यहां तक कि इंजेक्शन लगाने या ड्रेसिंग का काम भी अप्रशिक्षित कैदियों के हाथों ही सौंप दिया जाता था।

इसी तरह राजस्थान के जोधपुर सेंट्रल जेल में एनएसए के तहत बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने भी उनके हवाले से ऐसा ही दावा किया है। गीतांजलि ने बताया कि जोधपुर जेल में अंटार्कटिका से भी ज्यादा बेरहम सर्दी का सामना करना पड़ा। कंक्रीट की बर्फ-सी ठंडी फर्श पर दो-तीन कंबल डालकर किसी तरह रात कैदियों की रात कटती पड़ती है।

दशकों से सरकारी समितियां और मानवाधिकार आयोग जेलों की बदहाली पर चेतावनी देते आ रहे हैं, लेकिन सुधारों का दौरा तो दूर स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। 1980-83 में गठित ऑल इंडिया कमिटी ऑन जेल रिफॉर्म्स (मुल्ला कमेटी) ने जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं और कैदियों के पुनर्वास की कमी पर विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। इसी क्रम में 1987 में जस्टिस कृष्णा अय्यर कमिटी ने महिलाओं सहित सभी कैदियों की स्थिति पर गहन अध्ययन किया और सिफारिश की कि जेलें सुधारगृह हों, न कि यातना केंद्र।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्टें तो और भी भयावह हैं। 2024 में एनएचआरसी ने 2,170 कस्टोडियल मौतों की सूचना दर्ज की, जो 2023 के लगभग 2,400 मामलों से थोड़ी कम तो है, लेकिन सुविधाओं की कमी से जुड़ी स्वास्थ्य लापरवाही इनकी प्रमुख वजह बनी हुई है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, 2021 में जेलों में 2,116 कैदियों की मौत हुई, जिनमें 90 प्रतिशत को ‘प्राकृतिक’ बताया गया लेकिन यह ‘प्राकृतिक’ मौतें वास्तव में कुपोषण, दूषित पानी, चिकित्सा असुविधा के कारण हैं। 2023 में महाराष्ट्र में ही 17 कस्टोडियल मौतें दर्ज हुईं, जो देश में सबसे अधिक हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ‘इनह्यूमन कंडीशंस इन 1382 प्रिजन्स’ मामले में ओवरक्राउडिंग को मानवाधिकार हनन करार दिया और सुधारों के निर्देश दिए। 2016 में कोर्ट ने जेल स्टाफ की ट्रेनिंग और मौतों की जांच पर जोर दिया, जबकि 2025 के दिसंबर में एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि ‘कानूनी कैद भी मानव गरिमा के अधिकार को निलंबित नहीं करती।’

जेलों का क्षमता से अधिक भारा होना तो और भी अमानवीय है। इसे समग्रता से देने जाने की जरूरत भी है। क्‍योंकि कई विचाराधीन कैदियों का कोई पुरसाहाल नहीं है। यह न्‍यायिक व्‍यवस्‍था पर भी सवाल है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है, ‘देरी से मिले न्‍याय का कोई मतलब नहीं।’

तो सवाल तो सबसे बड़ा यही है कि जेलों की दुर्दशा बयां करती दर्दनाक रिपोर्टें जब सरकार की नजरों के सामने हैं, तो ढाक के तीन पात क्यों है? क्या जेलों में प्रयागराज कुंभ के दौरान त्रिवेणी संगम का जल छिड़क देने भर से ‘सारे पाप’ धुल जाएंगे? जैसा कि छत्तीसगढ़ समेत यूपी की कई जेलों में किया गया था।

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