खाड़ी युद्ध ने खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए पैदा कर दिया संकट

Gulf War

भारत के संदर्भ में दशकों से ‘पश्चिम एशिया’ का मतलब ऊर्जा सुरक्षा से है। हम लंबे समय से तेल और गैस के लिए खाड़ी की ओर देखते आए हैं, जिनसे हमारे शहरों को बिजली मिलती है और हमारे वाहन चलते हैं। हालांकि इजराइल, अमेरिका और ईरान तथा उनके सहयोगियों के बीच चल रहा टकराव जिस लगातार बढ़ता ही जा रहा है, ऊर्जा सुरक्षा को लेकर मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं औऱ इसका असर हमारी गाडियों की पेट्रोल टंकी ही नहीं, बल्कि भोजन की हमारी थाली तक पड़ रहा है। 

पश्चिम एशिया का संकट अब कोई सुदूर राजनयिक चुनौती भर नहीं रहा; यह अब भारत में फर्टीलाइजर और चावल से जुड़ी हमारी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन गया है।

28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के ईरान पर शुरू किए गए हमले और ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या और ईरान की जवाबी कार्रवाई से शुरू हुए इस युद्ध के वैश्विक आर्थिक दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। ईरान ने संकेर समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगभग बंद ही कर दिया, जहां से दुनिया के बीस फीसदी तेल और गैस की आवाजाही होती है। हालांकि होर्मुज को आंशिक तौर पर खोला गया है, लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक स्थिति के सामान्य होने के दूर दूर तक आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

यह तनाव ग्रामीण भारत में किसानों पर गंभीर असर डाल सकता है। दुनिया में खाद की खपत के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है और फिर भी यह अपनी मिट्टी को दी जाने वाली खाद के लिए लंबे समय से आयात पर निर्भर है। खाद की सप्लाई चेन के मामले में पश्चिम एशिया सबसे अहम केंद्र है। अभी भारत के कुल खाद आयात का 26 फीसदी इसी नाजुक क्षेत्र से आता है।

जब बात भारतीय किसानों द्वारा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाली खाद यूरिया की आती है, तो पता चलता है कि हम खाड़ी पर कितने निर्भर हैं। हमारे यहां आने वाला अधिकांश यूरिया ओमान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और कतर से आयात किया जाता है।

मौजूदा संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को व्यापारिक धमनी से बदलकर ‘चोक पाइंट’ में बदल दिया है। जंग से जुड़े जोखिम के बीमा प्रीमियम आसमान छू रहे हैं, मध्य पूर्व से गुजरने वाले जहाजों का भाडे में 40 फीसदी से डेढ़ सौ फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। नतीजतन भारतीय मिट्टी को मिलने वाले पोषक तत्वों की लागत भी बढ़ गई है।

पोटाश को लेकर विरोधाभास भी देख सकते हैः वैश्विक बाजार में इसकी आपूर्ति सामान्य हो सकती है, लेकिन युद्ध क्षेत्र से इसके परिवहन ने इसकी बढ़ती भौतिक और वित्तीय लागत ने इसकी कृत्रिम कमी पैदा कर दी है। औसत भारतीय किसान के लिए डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की कीमत 1400 रुपये प्रति बोरा से बढ़कर 1900 रुपये प्रति बोरा हो गई है। कीमत में यह बढ़ोतरी छोटी जोत की खेती की रीढ़ तोड़ सकती है।

संकट सिर्फ तैयार उत्पादों को लेकर नहीं है। इसका असर अपने यहां तैयार की जाने वाली खाद के लिए जरूरी कच्चे माल से भी जुड़ा है। भारत के घरेलू यूरिया संयंत्र व्यापक रूप  से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) और अमोनिया पर निर्भर हैं। इस कच्चे माल का 80-86 फीसदी आयात किया जाता है, जो खासतौर से खाड़ी क्षेत्र से ही आता है।

खाड़ी में तनाव के कारण जैसे ही ऊर्जा के प्रवाह में रुकावट आई है, तुरंत ही इसका असर घरेलू उत्पादन पर पड़ा है। ऐसे देश में जहां खेत में खाद डालने और मॉनसून के आगमन के बीच के समय में तालमेल तय रहता है, इसमें किसी भी तरह से दो हफ्ते की देर भी पैदावर में भारी कमी ला सकती है। 

सरकार ने खाद संयंत्रों को गैस की आपूर्ति को प्राथमिकता देने का फैसला किया है, ताकि उन्हें उनकी औसत खपत के 70 फीसदी की आपूर्ति हो सके। यह कदम युद्ध स्तर पर तैयारी को तो दिखाता है, लेकिन यह हालात से उपजी हताशा को भी दिखाता है। 

खाद संकट जहां खेती के लिए जरूरी लागत को बढ़ा रहा है, वहीं यह चावल की पैदावार के लिए भी संकट पैदा कर रहा है। भारत दुनिया में चावल का शीर्ष निर्यातक देश है और पश्चिम एशिया इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता है, चावल के कुल निर्यात का 36 फीसदी यहीं जाता है। इसकी कीमत करीब 4.43 अरब डॉलर के बराबर होती है।

इस संघर्ष ने भारत से बाहर जाने वाले बासमती के लिए संकट पैदा कर दिया है। अभी हजारों टन बासमती चावल बंदरगाहों में अटका हुआ है या रास्ते में फंसा हुआ है। यह सिर्फ लॉजिस्टिक समस्या भर नहीं है।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार बंद होते हैं, तो घरेलू बाजारों में सरप्लस की बाढ़ आ जाती है। सरप्लस के कारण चावल के दाम गिर सकते हैं और इससे ऐसा लग सकता है कि यह शहरी उपभोक्ताओं के हक में है। हालांकि सच्चाई चिंताजनक है। बासमती के थोक के दाम अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे होते हैं। इससे किसानों का मुनाफा कम हो जाता है और वे भविष्य में इसकी कम बुआई के लिए मजबूर हो जाते हैं। नतीजतन दीर्घकाल में उच्च गुणवत्ता वाले अनाज की उपलब्धता घट जाती है। 

मोदी सरकार लगातार जोर दे रही है कि खाद का पर्याप्त स्टाक है और यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं कि किसानों को खरीफ के मौसम (जून से अक्टूबर) में खाद की पर्याप्त आपूर्ति हो। 

अभी 23 और 24 मार्च को संसद के दोनों सदनों के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सरकार आगामी बुआई के मौसम में किसानों को खाद की पर्याप्त आपूर्ति के लिए सक्रियता से काम कर रही है। इसके साथ ही उन्होंने मौजूदा संकट से उपजे खतरों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, ‘इस युद्ध को तीन हफ्ते हो चुके हैं। इसने सारी दुनियाभर में गंभीर ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है। भारत के लिए भी स्थिति चिंताजनक है।’

उन्होंने आगे कहा, हमारे व्यापारिक रास्तों पर भी प्रभाव पड़ा है। पेट्रोल, डीजल, गैस और खाद जैसी आवश्यक चीजों की नियमित आपूर्ति बाधित हुई है। कई जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अटके हुए हैं। सरकार ने खाद क्षेत्र को गैस आवंटन की प्राथमिकता सूची में शामिल कर लिया है। इसमें कहा गया है कि संयंत्रों को पिछले छह महीनों के औसत प्राकृतिक गैस खपत का कम से कम 70 फीसदी प्राप्त होगा।

लेकिन इस आश्वासन के बावजूद पूरी व्यवस्था में तनाव के संकेत देखे जा सकते हैं। किसानों को वैश्विक स्तर पर बढ़ते दाम से सुरक्षित रखने के लिए राज्य को सब्सिडी के जरिये अतिरिक्त लागत वहन कर सकता है। यह धन ग्रामीण ढांचागत परियोजनाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा से लिया जा सकता है। ये पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव की गोपनीय लागत है, जो भारतीय गांवों को आने वाले कई बरसों तक वहन करनी पड़ेगी।  

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों तक संभव है कि इन उपायों को रोके रखा जाए। लेकिन उसके बाद क्या होता है, यह देखना होगा। 

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का आकलन है, मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष से उत्पन्न आपूर्ति शृंखला में आई बाधा का उर्वरकों और यूरिया दोनों के सालाना घरेलू उत्पादन पर 10-15 फीसदी तक का संभावित प्रभाव पड़ सकता है। कच्चे माल की आपूर्ति में बाधाओं के कारण क्षमता के इस्तेमाल में कमी आने से खाद कंपनियों का मुनाफा घट सकता है। इसके अलावा, कच्चे माल और आयातित खादों की कीमतों में बढ़ोतरी से इस क्षेत्र के खिलाड़ियों की कार्यशील पूंजी का भार बढ़ सकता है और सरकार का सब्सिडी बिल भी 20,000-25,000 करोड़ रुपये बढ़ सकता है।

मौजूद संकट ने इस कड़वी सच्चाई की याद दिला दी है कि भारत की खाद्य सुरक्षा उथल-पुथल से भरे एक अस्थिर भौगोलिक क्षेत्र से बहुत ज्यादा जुड़ी हुई है। यदि हमें भविष्य के झटकों से खुद को बचाना है, तो हमारी रणनीति में एक क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है। हमें एक स्रोत पर निर्भर नहीं होना चाहिए और इसमें विविधता होनी चाहिए। खाद के लिए रूस और मोरक्को से हाल ही में सरकार का संपर्क सही दिशा में एक कदम है। हमें खनिज सुरक्षा के लिए “ग्लोबल साउथ” गठबंधन की ओर बढ़ना चाहिए, जिससे किसी भी एक क्षेत्र पर हमारी अत्यधिक निर्भरता कम हो। हमें जैविक विकल्पों की ओर  तेजी से रूपांतरण करना चाहिए। आयातित एलएनजी पर निर्भर रासायनिक खादों पर अपनी निर्भरता कम करके, हम अपनी मिट्टी पर संप्रभुता वापस हासिल कर सकते हैं। जिस तरह भारत स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाए रखता है, उसी तरह अब एक ठोस ‘स्ट्रैटेजिक फर्टिलाइजर रिजर्व’ बनाने पर विचार करने का समय आ गया है।

पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष मानवीय और राजनीतिक नजरिये से एक त्रासदी है, लेकिन इसमें भारत के लिए एक संदेश भी है। हमारी खाद्य सुरक्षा एक जटिल तंत्र है, जिसमें मध्य पूर्व में एक छोटी सी चिंगारी पंजाब या तेलंगाना के खेतों में आग का रूप ले सकती है।

हम अब दीर्घकालीन ‘कृषि’ और ‘विदेश नीति’ को अलग-अलग खांचे में डाल कर नहीं देख सकते। खाड़ी क्षेत्र में हर कूटनीतिक कदम को अब यूरिया की बोरी की कीमत और चावल के एक-एक दाने की निर्यात क्षमता के हिसाब से आंकना होगा। भारत को वैश्विक शक्ति बनाने का रास्ता उसकी खाद्य आपूर्ति की स्थिरता पर टिका है; यह पक्का करना कि यह रास्ता सुदूर हो रहे युद्धों के धुएँ से मुक्त रहे, हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है।

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लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे Thelens.in के संपादकीय नजरिए से मेल खाते हों।

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