क्या गाली लोकतंत्र की आखिरी पुकार है?

Democracy

सार्वजनिक जीवन में गाली को आम तौर पर अशिष्टता, असभ्यता और नैतिक पतन का प्रतीक माना जाता है। लेकिन अगर गाली केवल अपशब्द न होकर सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की भाषा हो तो?

जून 2024 में जंतर-मंतर पर एक बैनर दिखाई दिया जिसने भारतीय राजनीति की भाषा से जुड़े लगभग हर स्थापित नियम को तोड़ दिया। उस पर सिर्फ इतना लिखा था—

F*** Fascists**

पुलिस हैरान थी।

सरकार नाराज़ थी।

टेलीविजन बहसों और अखबारों के टिप्पणीकार स्तब्ध थे।

लेकिन लगभग सभी एक बात समझने से चूक गए। यह अश्लीलता का प्रदर्शन नहीं था। यह सत्ता के अस्तित्व को चुनौती देने वाला एक भाषाई विद्रोह था—एक ऐसा विद्रोह जो वर्षों से आकार ले रहा था और जंतर-मंतर पर अपने सबसे तीखे रूप में सामने आया।

हिन्दी की गाली—अपशब्द, अभिशाप या भद्दी भाषा—को लंबे समय से अशिक्षित, असभ्य और गंवार लोगों की भाषा मानकर खारिज किया जाता रहा है।

लेकिन यह दृष्टि गाली के बारे में कम और उसे खारिज करने वालों के बारे में ज़्यादा बताती है।

गाली भाषा का पतन नहीं है।

वह शक्तिहीन लोगों का हथियार है।

वह सत्ता की स्थापित संरचनाओं को भाषा के स्तर पर अस्वीकार करने का तरीका है। और भारत के हालिया आंदोलनों में उसने अपने सबसे प्रभावशाली राजनीतिक रूप में जन्म लिया है।

इसे समझने के लिए हमें दर्शन, भाषा-विज्ञान और राजनीतिक सिद्धांत की यात्रा करनी होगी।

यह यात्रा बर्ट्रेंड रसेल के शिष्टाचार संबंधी विश्लेषण से शुरू होकर दिल्ली की सड़कों तक पहुंचती है, जहां समाज के हाशिए पर खड़े लोगों ने आखिरकार अपनी आवाज़ खोज ली।

I. गाली का अस्तित्व और उसका अर्थ

1938 में प्रकाशित अपनी चर्चित पुस्तक Power: A New Social Analysis में बर्ट्रेंड रसेल ने शिष्टाचार और सत्ता के रिश्ते पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी।

उन्होंने लिखा था कि वंशानुगत सत्ता ने ही जेंटलमैन की हमारी धारणा को जन्म दिया। यह उस लंबी ऐतिहासिक परंपरा का विकसित रूप है जिसमें कभी कबीलाई सरदारों की जादुई शक्तियां थीं, फिर राजाओं की दैवी सत्ता और बाद में कुलीन वर्ग की शूरवीरता तथा नीले ख़ून वाले अभिजातों की श्रेष्ठता।

जहां सत्ता पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है, वहां जिन गुणों की सबसे अधिक प्रशंसा होती है, वे वे गुण होते हैं जो अवकाश, विशेषाधिकार और निर्विवाद श्रेष्ठता से पैदा होते हैं।

रसेल का निष्कर्ष बेहद गहरा है।

शिष्टाचार कोई सार्वभौमिक नैतिक मूल्य नहीं है।

वह वंशानुगत सत्ता की सांस्कृतिक संरचना है।

जेंटलमैन कोई नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि एक वर्गीय पहचान है।

वह इस बात का प्रदर्शन है कि उसे कभी संघर्ष नहीं करना पड़ा, कभी अपनी जगह बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पड़ी।

परिष्कृत भाषा, विनम्र व्यवहार, संबोधन के जटिल नियम और सामाजिक मर्यादाएं—ये सब उसी समाज में जन्म लेते हैं जहां कुछ लोग शासन करने के लिए पैदा माने जाते हैं और कुछ केवल आज्ञापालन करने के लिए।

रसेल आगे लिखते हैं कि जहां सत्ता राजशाही के बजाय अभिजात वर्ग के हाथों में होती है, वहां अच्छे शिष्टाचार का अर्थ अपने बराबरी वालों के प्रति विनम्रता और अपने से नीचे माने जाने वालों के प्रति सहज आत्मविश्वास का प्रदर्शन होता है।

रसेल यह भी जोड़ते हैं कि जेंटलमैन के प्रति यह आदर तभी तक टिकता है जब तक वंशानुगत संपत्ति और सत्ता कायम रहती है। जिस दिन आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पिता से पुत्र को मिलना बंद हो जाएगी, उस दिन यह आदर भी तेज़ी से ख़त्म हो जाएगा। यानी जेंटलमैन कोई शाश्वत आदर्श नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक परिघटना है—जो वंशानुगत सत्ता के टूटते ही बिखर जाती है। यही इस पूरे भाषाई विश्लेषण की भौतिकवादी बुनियाद है।

यहीं से भारतीय समाज की भाषाई संरचना को समझने की कुंजी मिलती है।

II. भारतीय समाज का भाषाई पदानुक्रम

रसेल का विश्लेषण भारतीय समाज को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी देता है।

जाति व्यवस्था, ज़मींदारी, रियासती परंपराएं और औपनिवेशिक नौकरशाही—इन सबने मिलकर ऐसा सामाजिक ढांचा बनाया, जिसमें सत्ता केवल संस्थाओं के सहारे नहीं, बल्कि भाषा के सहारे भी कायम रही।

भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल होने वाले सर्वनाम कभी निष्पक्ष नहीं रहे।

‘आप’ सम्मान का सूचक है। इसका प्रयोग बड़ों, अधिकारियों, अपरिचित लोगों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए किया जाता है। यह सामने वाले की श्रेष्ठता को स्वीकार करने का संकेत देता है।

‘तुम’ बराबरी या आत्मीयता का संबोधन है। मित्रों, समकक्ष लोगों या छोटे समझे जाने वालों के लिए इसका इस्तेमाल होता है। यह अपेक्षाकृत समान संबंध का संकेत देता है।

‘तू’ सबसे जटिल संबोधन है। इसका प्रयोग ईश्वर, प्रेमी-प्रेमिका, छोटे बच्चों या बेहद घनिष्ठ लोगों के लिए भी हो सकता है, लेकिन अपमानित करने के लिए भी यही शब्द इस्तेमाल किया जाता है। यानी यह निकटता और तिरस्कार—दोनों का वाहक हो सकता है।

भारत का हर बच्चा इस व्यवस्था को समझने से पहले सीख लेता है।

उसे बताया जाता है कि किसे ‘आप’ कहना है, किसे ‘तुम’ और किसे ‘तू’।

गलत संबोधन पर उसे टोका जाता है।

डांटा जाता है।

शर्मिंदा किया जाता है।

धीरे-धीरे वह बिना सोचे-समझे यह मान लेता है कि समाज में कौन ऊपर है, कौन बराबर है और कौन नीचे।

इस तरह केवल बोलने भर से सत्ता का ढांचा हर दिन दोहराया जाता रहता है।

इसके लिए पुलिस की जरूरत नहीं पड़ती।

फौज की जरूरत नहीं पड़ती।

भाषा ही व्यवस्था को कायम रखने का काम करती रहती है।

यहीं गाली इस पूरी भाषाई व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह बनकर उभरती है।

गाली केवल अपशब्द नहीं है।

वह उस पदानुक्रम को अस्वीकार करने की घोषणा है, जिसे सम्मानसूचक संबोधन बनाए रखते हैं।

जब कोई दलित मजदूर अपने सवर्ण मालिक के लिए मन ही मन बेहनचोद कहता है, तो वह केवल अपना गुस्सा नहीं निकाल रहा होता।

वह प्रतीकात्मक रूप से उस पूरी सामाजिक व्यवस्था को नकार रहा होता है, जो मालिक को स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ मानती है।

मानो वह कह रहा हो—

मैं तुम्हारी सत्ता को वैध नहीं मानता।

मैं तुम्हारे लिए सम्मान का अभिनय नहीं करूंगा।

तुमने मुझे जिस भाषा और जिस सामाजिक हैसियत में धकेला है, मैं उसी भाषा में तुम्हें जवाब दूंगा।

यहीं गाली पहली बार एक राजनीतिक अर्थ ग्रहण करती है।

वह भाषा का पतन नहीं, बल्कि सत्ता की वैधता को चुनौती देने का माध्यम बन जाती है।

III. राजनीतिक शुचिता के विरुद्ध भाषाई विरासत: नरेंद्र मोदी का उदाहरण

जंतर-मंतर के सीजेपी आंदोलन को समझने से पहले उस भाषाई विरासत को समझना जरूरी है, जिसने भारतीय राजनीति में गैर-पारंपरिक, तीखी और राजनीतिक शुचिता को चुनौती देने वाली भाषा को वैधता दी। यह विरासत पिछले एक दशक में सबसे स्पष्ट रूप से नरेंद्र मोदी की राजनीति में दिखाई देती है।

दीदी ओ दीदी

यह केवल एक संबोधन नहीं था, बल्कि सम्मान के स्थापित नियमों को सार्वजनिक रूप से चुनौती देने का प्रदर्शन था।

राज्यसभा जैसे सदन में, जहां संबोधन के स्पष्ट संसदीय नियम और परंपराएं हैं, नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी के लिए बार-बार दीदी ओ दीदी कहा।

यह महज़ अनौपचारिकता नहीं थी।

यह बराबरी का प्रदर्शन भी नहीं था।

दरअसल, यह अनौपचारिकता के आवरण में श्रेष्ठता का प्रदर्शन था।

इसका संदेश साफ था—सामने वाले का पद इतना महत्वपूर्ण नहीं कि उसके लिए औपचारिक सम्मान दिखाया जाए।

50 करोड़ की गर्लफ्रेंड

यह राजनीतिक शुचिता को चुनौती देने वाली भाषा का एक और उदाहरण था।

किसी महिला को सार्वजनिक रूप से 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड कहना केवल राजनीतिक आरोप नहीं था।

यह उसके चरित्र, प्रतिष्ठा और निजी जीवन पर सीधा हमला था।

यह निजी और पारिवारिक जीवन को राजनीतिक हथियार में बदल देने की रणनीति थी।

कांग्रेस के दौर की अपेक्षाकृत संयमित राजनीतिक भाषा में ऐसे शब्दों की कल्पना भी कठिन थी।

नरेंद्र मोदी ने ऐसी भाषा को चुनावी राजनीति का हिस्सा बना दिया।

यहीं गाली और अपमान का लोकतंत्रीकरण दिखाई देता है।

जिसे अभिजात वर्ग अशिष्ट या भद्दी भाषा कहता था, वही राजनीतिक हथियार बन गई।

कपड़ों से पहचानिए

कपड़ों से पहचानिए वाला बयान रसेल के भाषाई पदानुक्रम के विचार को पहचान की राजनीति तक विस्तार देता है।

इसका सीधा अर्थ था—

किसी व्यक्ति की पहचान उसके पहनावे से की जा सकती है।

यह राजनीतिक शुचिता की उस अवधारणा के ठीक विपरीत था, जो नागरिकों को उनकी जाति, धर्म, नस्ल या पहनावे से परे समान गरिमा के साथ देखने की बात करती है।

इतनी विविधताओं वाले समाज में किसी की पहचान उसके कपड़ों से तय करना, साझा नागरिकता की अवधारणा से दूरी बनाने जैसा था।

घुसपैठिया

घुसपैठिया केवल एक राजनीतिक विशेषण नहीं है।

यह किसी व्यक्ति के अस्तित्व को ही नकार देने वाला शब्द है।

यह कहता है कि सामने वाले का इस भूमि, इस समाज और इस राष्ट्र पर वैध अधिकार नहीं है।

उसे उसके अपने घर में भी बाहरी घोषित कर दिया जाता है।

यही सत्ता की ओर से दी गई गाली है।

ऊपर से नीचे की ओर फेंकी गई ऐसी भाषाई चोट, जो किसी समुदाय की बराबरी के दावे को ही अस्वीकार कर देती है।

भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग उनके सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को नकारने का भी प्रयास बन जाता है।

दानवी उपमाएं

राजनीतिक विरोधियों के लिए दानव, राक्षस या अमानवीय उपमाओं का इस्तेमाल केवल असहमति नहीं है।

यह उन्हें मनुष्य के समान नैतिक दर्जे से नीचे धकेलने का प्रयास है।

यह गाली का सबसे तीखा रूप है।

यह केवल विरोध नहीं करता, बल्कि सामने वाले के मानवीय अस्तित्व को ही चुनौती देता है।

IV. तू-तड़ाक की राजनीति: बराबरी या विरोधाभास?

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ तू-तड़ाक में बातचीत करने का नरेंद्र मोदी का दावा राजनीतिक शुचिता के विरुद्ध उनकी शैली का शायद सबसे प्रभावशाली उदाहरण है।

यह दावा तथ्यात्मक रूप से कितना सही था, यह यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है।

अधिक महत्वपूर्ण उसका राजनीतिक अर्थ है।

गुजरात के एक साधारण परिवार से निकला, बिना किसी राजनीतिक वंश, अभिजात शिक्षा या विरासत के आगे बढ़ा व्यक्ति अपने समर्थकों से मानो यह कह रहा था—

देखिए, मैं आज दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक से भी बराबरी के स्तर पर बात करता हूं।

वर्ग, शिक्षा, अंग्रेज़ी, पारिवारिक विरासत और सत्ता—जिन दीवारों ने सदियों तक आम लोगों को अभिजात वर्ग से अलग रखा—वे अब टूट चुकी हैं।

और अगर मैं उन्हें पार कर सकता हूं, तो आप भी कर सकते हैं।

रसेल इस दावे को तुरंत पहचान लेते।

यह वंशानुगत विशेषाधिकार को नकारने का सार्वजनिक प्रदर्शन था।

यह घोषणा थी कि अब किसी के सामने आप कहकर झुकने की आवश्यकता नहीं रही।

लेकिन इसी दावे में एक गहरा विरोधाभास भी छिपा था।

यदि वास्तव में सभी दीवारें टूट चुकी होतीं, तो इसकी घोषणा करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

इस दावे का असली श्रोता बराक ओबामा नहीं थे।

वे करोड़ों भारतीय थे, जिन्होंने बचपन से आप, तुम और तू के जरिए सामाजिक हैसियत का बोझ महसूस किया था।

यह संदेश उन्हीं के लिए था।

और इसी कारण तू-तड़ाक का यह दावा भारतीय अभिजात वर्ग के खिलाफ एक सार्वजनिक भाषाई विद्रोह बन गया।

V. राजनीतिक शुचिता: समावेशन से नियंत्रण तक

आज की राजनीति को समझने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि राजनीतिक शुचिता (Political Correctness) के साथ आखिर हुआ क्या।

1970 के दशक में अमेरिका में राजनीतिक शुचिता की शुरुआत एक सकारात्मक विचार के रूप में हुई थी। इसका उद्देश्य ऐसी भाषा को बढ़ावा देना था जो समाज के हर वर्ग के प्रति सम्मानजनक, समावेशी और समानता पर आधारित हो।

यह केवल शब्द बदलने का अभियान नहीं था।

इसका उद्देश्य समाज को देखने का नज़रिया बदलना था, ताकि भाषा के जरिए किसी समुदाय को अदृश्य, अपमानित या हाशिए पर न धकेला जाए।

अपने मूल स्वरूप में राजनीतिक शुचिता ज्ञान और समाज—दोनों में हस्तक्षेप का एक प्रयास थी।

इसका विश्वास था कि भाषा केवल वास्तविकता का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसे आकार भी देती है।

इसलिए अधिक समावेशी भाषा एक अधिक समावेशी समाज के निर्माण में मदद कर सकती है।

लेकिन समय के साथ इस विचार का स्वरूप बदलने लगा।

उत्तर-सत्य की राजनीति और लोकलुभावन राजनीति के उभार के बीच राजनीतिक शुचिता का अर्थ भी बदल गया।

धीरे-धीरे उसे एक ऐसे औज़ार के रूप में देखा जाने लगा, जिसके ज़रिए अभिजात वर्ग यह तय करने लगा कि आम लोग कैसे बोलेंगे, क्या बोलेंगे और किन शब्दों का इस्तेमाल करेंगे।

अब उसका उद्देश्य केवल सम्मानजनक भाषा नहीं रह गया था।

वह भाषाई निगरानी का माध्यम बनती दिखाई देने लगी।

इस बदलाव के साथ राजनीतिक शुचिता पर तीन बड़े आरोप लगाए जाने लगे।

पहला—वह लोगों को शामिल करने के बजाय उनकी भाषा को नियंत्रित करने लगी।

दूसरा—उसने कुछ विषयों और शब्दों पर ऐसी सीमाएँ खड़ी कर दीं, जिनके कारण खुली बहस कठिन होती गई।

तीसरा—उसने विचारों के बजाय व्यक्तियों का मूल्यांकन करना शुरू कर दिया। किसी तर्क पर बहस करने के बजाय व्यक्ति के अतीत, उसकी पहचान या उसके राजनीतिक रुख के आधार पर उसे अस्वीकार किया जाने लगा।

राजनीतिक विश्लेषण में राजनीतिक शुचिता के दो रूपों की चर्चा की जाती है।

पहला, विषयगत राजनीतिक शुचिता, जो यह तय करती है कि किन विषयों पर बात की जा सकती है और किन पर नहीं।

दूसरा, व्यक्तिकेंद्रित राजनीतिक शुचिता, जो किसी विचार को केवल इसलिए खारिज कर देती है क्योंकि वह किसी विशेष व्यक्ति से आया है।

दोनों ही स्थितियाँ लोकतांत्रिक संवाद के लिए चुनौती बनती हैं।

पहली खुली बहस को सीमित करती है।

दूसरी संवाद की संभावना ही समाप्त कर देती है।

यहीं से राजनीतिक शुचिता, समावेशन की परियोजना से आगे बढ़कर नियंत्रण के औज़ार के रूप में देखी जाने लगी।

VI. उत्तर-सत्य: जब भावनाएँ तथ्यों पर भारी पड़ने लगीं

राजनीतिक शुचिता के इसी संकट ने उत्तर-सत्य (Post-truth) की राजनीति के लिए ज़मीन तैयार की।

क्रम धीरे-धीरे कुछ इस तरह बना।

राजनीतिक शुचिता ने आम लोगों से कहना शुरू किया कि वे गलत भाषा बोलते हैं, गलत शब्द इस्तेमाल करते हैं और उनकी अभिव्यक्ति स्वीकार्य नहीं है।

इससे समाज के एक बड़े वर्ग में असंतोष पैदा हुआ।

उन्हें लगा कि अभिजात वर्ग केवल शासन ही नहीं कर रहा, बल्कि यह भी तय करना चाहता है कि लोग कैसे सोचें और कैसे बोलें।

यहीं लोकलुभावन नेताओं ने इस असंतोष को राजनीतिक शक्ति में बदल दिया।

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का यह कथन कि अब राजनीतिक शुचिता के लिए समय नहीं बचा है, इसी भावना का प्रतिनिधित्व करता था।

भारत में नरेंद्र मोदी की राजनीति ने भी इसी असंतोष को व्यापक राजनीतिक समर्थन में बदल दिया।

धीरे-धीरे राजनीतिक शुचिता का विरोध केवल भाषा तक सीमित नहीं रहा।

उसके साथ अभिजात ज्ञान, स्थापित संस्थाओं और विशेषज्ञता पर भी अविश्वास जुड़ता गया।

तर्क कुछ ऐसा बन गया—

यदि अभिजात वर्ग भाषा के बारे में गलत है, तो संभव है कि वह इतिहास, विज्ञान और तथ्यों के बारे में भी गलत हो।

यहीं उत्तर-सत्य की राजनीति जन्म लेती है।

यह वह स्थिति है, जहाँ तथ्य पीछे छूटने लगते हैं और भावनाएँ, पहचान तथा व्यक्तिगत अनुभव अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। एक विश्लेषण में इसे तर्क पर भावना की जीत के रूप में परिभाषित किया गया है।

इसी दौर में सार्वजनिक जीवन में एक नया विरोध खड़ा किया गया—

राजनीतिक शुचिता, राजनीतिक अशुचिता

मानक और मर्यादा, विद्रोह

नरम भाषा, कठोर भाषा

सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

अभिजात विचारधारा, स्वतंत्र चिंतन

झूठ, सच

यही ढाँचा उत्तर-सत्य की राजनीति की बुनियाद बन गया।

अब राजनीतिक शुचिता का विरोध करने वाला व्यक्ति असभ्य नहीं, बल्कि सच बोलने वाला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर माना जाने लगा।

और राजनीतिक शुचिता का समर्थन करने वाला व्यक्ति समावेशी नहीं, बल्कि सेंसरशिप लागू करने वाला अभिजात माना जाने लगा।

यहीं से सार्वजनिक बहस में एक निर्णायक बदलाव आया।

अब किसी कथन का मूल्य इस आधार पर कम तय होने लगा कि वह तथ्यात्मक रूप से सही है या नहीं।

उसका मूल्य इस आधार पर तय होने लगा कि वह किसके पक्ष में बोला गया है और किसके खिलाफ।

VII. जंतर-मंतर का सीजेपी आंदोलन: जब गाली राजनीति का व्याकरण बन गई

यहीं से बात जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी (Cockroach Janta Party) आंदोलन तक पहुंचती है। यहीं वह क्षण आता है, जब वर्षों से पनपता भाषाई विद्रोह अपने सबसे स्पष्ट और परिपक्व रूप में सामने दिखाई देता है।

यह आंदोलन किसान आंदोलन या नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी आंदोलन से अलग था।

यह किसी एक जाति, धर्म, समुदाय या पहचान के इर्द-गिर्द संगठित नहीं था।

यह उस युवा तबके का विस्फोट था, जिसे व्यवस्था ने निराश किया था।

वे पढ़े-लिखे थे।

वे बेहतर भविष्य चाहते थे।

उन्होंने शिक्षा हासिल की थी, लेकिन उन्हें अपनी योग्यता के अनुरूप अवसर नहीं मिले।

वे किसी एक पहचान के प्रतिनिधि नहीं थे; वे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिसे व्यवस्था ने हाशिए पर धकेल दिया था।

एक विश्लेषण में कहा गया कि जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारी केवल न्याय की मांग नहीं कर रहे थे।

वे उस पूरी व्यवस्था को अस्वीकार कर रहे थे, जिसमें नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह सत्ता के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करे।

उन्होंने सड़क की भाषा अपनाई।

वह भाषा, जिसे सभ्य समाज अक्सर हाशिए के लोगों की भाषा कहकर खारिज कर देता है।

वह भाषा, जिसे उन लोगों की भाषा माना जाता है जिन्हें जीवन भर यह बताया गया कि वे गंदगी हैं।

लेकिन इस बार उन्होंने उसी भाषा को अपने सम्मान और प्रतिरोध का प्रतीक बना लिया।

यहीं गाली का अर्थ बदल जाता है।

वह केवल क्रोध की अभिव्यक्ति नहीं रहती।

वह राजनीतिक व्याकरण बन जाती है।

VIII. साझा भाषाई संसार का निर्माण

इस आंदोलन में गालियों की भूमिका केवल भावनात्मक नहीं थी।

उन्होंने अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए लोगों के बीच एक नई एकजुटता पैदा की।

छात्र, नौकरीपेशा लोग, पेशेवर, परिवार और विभिन्न वर्गों से आए नागरिक—सभी एक साझा भाषाई दुनिया का हिस्सा बन गए।

यह साझा दुनिया किसी जातीय, धार्मिक या वैचारिक पहचान पर नहीं बनी थी।

उसकी नींव साझा अवज्ञा पर थी।

एक पर्यवेक्षक ने लिखा—

गालियों ने दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू से आए युवाओं के साथ एक साझा जगह बनाना संभव किया। उन्होंने एक साझा भाषाई संसार रचा। महिला प्रदर्शनकारियों की गालियां दक्षिणपंथी हिंदुत्व की सामाजिक कल्पना की सीमाओं से भी आगे निकल जाने वाला विद्रोह थीं।

यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता थी।

प्रदर्शनकारी मानो कह रहे थे—

हम अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आते हैं।

लेकिन तुम्हारे भाषाई नियमों को मानने से इनकार करने में हम सब एक हैं।

हम उसी भाषा में बोलेंगे, जिसे तुम गली-मोहल्ले की भाषा कहते हो।

उसी भाषा में, जिसे तुमने हाशिए के लोगों की भाषा घोषित कर रखा है।

और उसी भाषा में, जिसे बोलने वालों से हमेशा कहा गया कि उनके पास सच कहने के लिए कुछ नहीं है।

गाली की यह साझेदारी दरअसल एक तरह का साझा अपराध-बोध रचती है। जब दो अजनबी पहली बार एक-दूसरे के सामने बेझिझक गाली बोलते हैं, तो वे केवल संवाद नहीं कर रहे होते—वे एक साथ मिलकर एक सामाजिक नियम तोड़ रहे होते हैं। यह साझा उल्लंघन ही उन्हें आपस में जोड़ता है। इसका संदेश यही होता है कि हमने अभी-अभी नियम तोड़ा, और आसमान नहीं टूटा, पुलिस नहीं आई। यानी वह नियम शुरू से एक झूठ था। जंतर-मंतर पर जाति, वर्ग और संस्था की सीमाएं लांघकर बना यह भाईचारा इसी साझा उल्लंघन की देन था।

IX. वंशानुगत सत्ता का निषेध

इस आंदोलन का सबसे गहरा अर्थ यहीं छिपा है।

प्रदर्शनकारी केवल सरकार का विरोध नहीं कर रहे थे।

वे उस पूरी भाषाई व्यवस्था को चुनौती दे रहे थे, जो सत्ता को स्वाभाविक सम्मान दिलाती है।

मानो वे कह रहे हों—

हम तुम्हें आप कहने के लिए बाध्य नहीं हैं।

हम वह सम्मान नहीं दिखाएंगे जिसकी तुम्हारी सत्ता अपेक्षा करती है।

हम तुमसे बराबरी के स्तर पर बात करेंगे।

या फिर उस व्यक्ति की तरह, जो अपने लिए तय कर दी गई हीनता की भूमिका निभाने से इनकार करता है।

राज्य की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।

आंदोलन की शिकायतों को समझने के बजाय उसे राष्ट्रविरोधी साज़िश के रूप में पेश करने की कोशिश हुई।

सोशल मीडिया खातों पर कार्रवाई की गई।

पुलिस बल का इस्तेमाल किया गया।

लेकिन प्रदर्शनकारियों की वास्तविक शिकायतों पर गंभीर संवाद नहीं हुआ।

क्योंकि सत्ता के पास ऐसे आंदोलन को समझने का ढांचा ही नहीं था, जो किसी एक पहचान पर आधारित न हो।

उसकी पूरी राजनीतिक कार्यप्रणाली पहचान-आधारित राजनीति के प्रबंधन पर टिकी हुई थी। मुस्लिम आंदोलन को वह राष्ट्रविरोधी करार देकर निपटा सकती है। दलित आंदोलन को टोकन मुआवज़े या प्रतीकात्मक घोषणाओं से शांत किया जा सकता है। किसान आंदोलन में नेताओं से बातचीत कर समझौते की गुंजाइश बनाई जा सकती है। लेकिन जाति, वर्ग और धर्म की सीमाओं को पार कर खड़ा हुआ ऐसा आंदोलन, जिसके प्रदर्शनकारी न मुसलमान थे, न दलित, न किसान—सिर्फ नागरिक थे—उसकी स्थापित राजनीतिक समझ से पूरी तरह बाहर था। सत्ता के पास नागरिकों को केवल नागरिक के रूप में संबोधित करने का कोई तरीका ही नहीं बचा था।

X. महिलाओं की गालियां: दोहरे विद्रोह की भाषा

जंतर-मंतर के आंदोलन में महिला प्रदर्शनकारियों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय थी।

एक विवरण में उल्लेख है कि मना नाम की साड़ी पहने एक महिला सुरक्षा बलों के सामने खड़ी होकर तीखी गालियां दे रही थी और भीड़ को आगे बढ़ने के लिए उकसा रही थी।

दक्षिणपंथी हलकों में इस दृश्य पर तत्काल आक्रोश फैल गया।

एक महिला…

एक मां…

मां काली की भक्त…

वह ऐसी भाषा कैसे बोल सकती है?

लेकिन यही प्रतिक्रिया बताती है कि उन महिलाओं की गालियां इतनी असहज क्यों कर रही थीं।

उन्होंने एक साथ दो तरह की सामाजिक संरचनाओं को चुनौती दी।

पहली, जाति और वर्ग पर आधारित पदानुक्रम।

दूसरी, स्त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित पदानुक्रम।

हिंदुत्व की सामाजिक कल्पना स्त्री की एक विशेष छवि गढ़ती है—देवी, मां, पवित्र और संरक्षण पाने वाली स्त्री।

लेकिन जब वही स्त्री पुलिस, राज्य और प्रधानमंत्री तक के खिलाफ खुलकर गालियां देती है, तो वह इस पूरी कल्पना को ध्वस्त कर देती है।

यह ऐसा विद्रोह है जिसकी कल्पना दक्षिणपंथी हिंदुत्व की सामाजिक संरचना आसानी से नहीं कर सकती।

यह उस संरक्षणवादी सोच का भी निषेध है, जो महिलाओं को सुरक्षा देने के बदले उनसे आज्ञाकारिता और चुप्पी की अपेक्षा करती है।

इसका संदेश साफ है—

हम तुम्हारी मां, बहन या बेटी बनकर संरक्षण पाने नहीं आई हैं।

हम शिकायतों और अधिकारों वाली नागरिक हैं।

और अपनी शिकायतें उसी भाषा में व्यक्त करेंगी जो उन्हें सबसे सटीक ढंग से व्यक्त कर सके—चाहे वह कितनी ही असुविधाजनक या चौंकाने वाली क्यों न लगे।

XI. सबसे बड़ा विरोधाभास: वही भाषा, अब अस्वीकार्य क्यों?

यहीं इस पूरे विश्लेषण का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है।

नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक शुचिता का विरोध करते हुए, तीखी और गैर-पारंपरिक भाषा का इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक पहचान बनाई।

लेकिन आज वही भाषाई शैली, जब युवा प्रदर्शनकारी उनके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं, तो उसे अस्वीकार्य बताया जाता है।

विपक्ष में रहते हुए मोदी ने राजनीतिक शुचिता और अभिजात राजनीतिक संस्कृति को चुनौती दी।

उन्होंने स्वयं को उस व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जो अंग्रेज़ी बोलने वाले, दिल्ली-केंद्रित और राजनीतिक शुचिता से बंधे अभिजात वर्ग के मुकाबले आम लोगों की भाषा बोलता है।

लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद वही व्यवस्था उनका अपना प्रतिष्ठान बन गई।

अब वही राजनीतिक अशुचिता, जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचने में मदद की थी, उनके खिलाफ इस्तेमाल होने लगी।

सीजेपी आंदोलन के प्रदर्शनकारी भी वही कर रहे थे जो कभी नरेंद्र मोदी ने किया था।

वे भी स्थापित भाषाई मर्यादाओं को अस्वीकार कर रहे थे।

वे भी सम्मान के औपचारिक प्रदर्शन को नकार रहे थे।

लेकिन अब, जब सत्ता का केंद्र बदल चुका है, वही व्यवहार अस्वीकार्य घोषित कर दिया गया।

सत्य के इस उलटफेर को ठीक-ठीक देखा जा सकता है। जब मोदी ने घुसपैठिया कहा, तो उसे राजनीतिक ज़रूरत बताया गया। जब कोई युवा प्रदर्शनकारी फासीवाद विरोधी गाली देता है, तो उसे अपराध घोषित कर दिया जाता है। जब राज्यसभा में दीदी ओ दीदी कहा गया, तो उसे साहसिक सच बोलना कहा गया। लेकिन जब कोई प्रदर्शनकारी सत्ता के खिलाफ वही तीखापन दिखाता है, तो उसे राष्ट्रविरोधी अश्लीलता करार दिया जाता है। एक ही भाषाई विद्रोह, जब ऊपर की ओर उठता है, देशद्रोह में बदल दिया जाता है।

XII. इस अस्वीकार के प्रमाण

सीजेपी आंदोलन के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया इस विरोधाभास को और स्पष्ट करती है।

आंदोलन को पाकिस्तान प्रायोजित या राष्ट्रविरोधी साजिश बताने की कोशिश की गई।

दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया मंचों को कथित आपत्तिजनक या अवैध पोस्ट हटाने के लिए नोटिस भेजे।

पुलिस बल का इस्तेमाल किया गया।

लेकिन प्रदर्शनकारियों की शिकायतों से संवाद करने के बजाय आंदोलन को दबाने पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया।

जो नेता कभी स्वयं को राजनीतिक शुचिता के विरुद्ध सच बोलने वाला बताते थे, वही अब अपने खिलाफ इस्तेमाल हुई उसी भाषा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखे।

जो कभी कांग्रेस के खिलाफ तीखे व्यंग्य, कटाक्ष और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते थे, अब वही अपने लिए सम्मानजनक संबोधन और मर्यादित भाषा की अपेक्षा करने लगे।

यहीं तू-तड़ाक का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है।

बराक ओबामा के साथ तू-तड़ाक में बातचीत का दावा सत्ता की दीवारों को तोड़ने का प्रतीक था।

लेकिन सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद वही व्यक्ति दूसरों से सम्मान और औपचारिक संबोधन की अपेक्षा करने लगा।

जो तू कभी उसके विद्रोह का प्रतीक था, वही अब नीचे खड़े लोगों से आप सुनने की अपेक्षा में बदल गया।

यहीं रसेल का विश्लेषण फिर प्रासंगिक हो उठता है।

उन्होंने लिखा था कि वंशानुगत सत्ता अपने साथ ऐसे शिष्टाचार भी पैदा करती है, जो श्रेष्ठता के प्रतीक बन जाते हैं।

सत्ता भले ही तकनीकी रूप से वंशानुगत न हो, लेकिन यदि वह अपने लिए वही भाषाई सम्मान मांगने लगे जो कभी पुराना अभिजात वर्ग मांगता था, तो उसका व्यवहार उससे बहुत अलग नहीं रह जाता।

XIII. भारतीय लोकतंत्र के लिए इसका अर्थ

इस पूरे प्रसंग का महत्व केवल एक आंदोलन या कुछ आपत्तिजनक नारों तक सीमित नहीं है।

यह भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति के बारे में एक गहरा प्रश्न खड़ा करता है।

जब नागरिक यह महसूस करने लगते हैं कि सम्मानजनक भाषा में कही गई उनकी बातों को लगातार अनसुना किया जा रहा है, तो वे अंततः ऐसी भाषा का सहारा लेते हैं जिसे सत्ता अनसुना नहीं कर सकती।

गाली उस समय जन्म लेती है, जब संवाद की सामान्य भाषा अपनी प्रभावशीलता खो देती है।

इस अर्थ में गाली लोकतंत्र की विफलता का कारण नहीं, बल्कि उसका लक्षण है।

वह बताती है कि नागरिकों और सत्ता के बीच संवाद की सामान्य संरचनाएं टूट चुकी हैं।

जब लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कम होने लगता है, जब न्याय मिलने की संभावना धुंधली दिखाई देने लगती है और जब लोगों को लगता है कि विनम्र भाषा केवल उपेक्षा पैदा करती है, तब गाली आख़िरी राजनीतिक भाषा बन जाती है।

इसीलिए किसी आंदोलन में गालियों की मौजूदगी को केवल नैतिक पतन कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं है।

उससे पहले यह पूछना होगा कि लोगों को इस भाषा तक पहुंचने के लिए किन अनुभवों से गुजरना पड़ा।

लोकतंत्र में भाषा केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं होती।

वह सत्ता के वितरण का भी प्रश्न होती है।

जो लोग सम्मानसूचक भाषा की अपेक्षा करते हैं, वे अक्सर उस सामाजिक स्थान पर बैठे होते हैं जहां सम्मान पहले से उपलब्ध है।

लेकिन जिन लोगों को जीवन भर सम्मान नहीं मिला, उनके लिए भाषा का अर्थ अलग होता है।

वे सम्मान की भाषा नहीं, बराबरी की भाषा खोजते हैं।

और कई बार बराबरी की पहली भाषा गाली बन जाती है।

XIV. निष्कर्ष: गाली को सुनना

जंतर-मंतर के आंदोलन का ठोस राजनीतिक नतीजा भी सामने आया—शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी दबाव की देन था, हालांकि भारत की राजनीतिक भाषा को लेकर बड़ी लड़ाई अभी बाकी है।

इस विश्लेषण का उद्देश्य गालियों का समर्थन करना नहीं है।

गाली किसी आदर्श लोकतांत्रिक भाषा का विकल्प नहीं हो सकती।

लोकतंत्र का लक्ष्य हमेशा ऐसी सार्वजनिक संस्कृति होना चाहिए, जिसमें असहमति को सम्मानजनक भाषा में व्यक्त किया जा सके और उसे गंभीरता से सुना भी जाए।

लेकिन यदि हम केवल गालियों की अशिष्टता पर ध्यान दें और उस पीड़ा, अपमान, असमानता तथा राजनीतिक बहिष्कार को न देखें जिसने उन्हें जन्म दिया, तो हम समस्या के केवल लक्षण से लड़ रहे होंगे, उसके कारण से नहीं।

जंतर-मंतर का सीजेपी आंदोलन हमें यही याद दिलाता है कि भाषा कभी तटस्थ नहीं होती।

सम्मानसूचक संबोधन भी राजनीति है।

मौन भी राजनीति है।

और गाली भी राजनीति है।

बर्ट्रेंड रसेल ने दिखाया था कि भाषा के भीतर सत्ता कैसे छिपी रहती है।

जंतर-मंतर के युवाओं ने दिखाया कि उसी भाषा के भीतर विद्रोह भी छिपा होता है।

सत्ता पुलिस भेज सकती है, सोशल मीडिया खाते बंद करवा सकती है, आंदोलन को साज़िश बता सकती है। लेकिन वह प्रदर्शनकारियों से आप कहलवा नहीं सकती। वह सम्मान के प्रदर्शन को ज़बरदस्ती वापस नहीं ला सकती। वह उस भाषाई व्यवस्था को दोबारा खड़ा नहीं कर सकती, जो एक बार टूट चुकी है।

भारतीय लोकतंत्र के सामने असली प्रश्न यह नहीं है कि गालियां दी जानी चाहिए या नहीं।

असली प्रश्न यह है कि क्या हमारी राजनीतिक व्यवस्था उन गालियों के पीछे छिपी पुकार को सुनने की क्षमता रखती है।

क्या वह उन्हें केवल अशिष्टता मानकर खारिज कर देगी, या उन्हें उन नागरिकों की आख़िरी ईमानदार भाषा के रूप में सुनेगी, जिन्हें लंबे समय से लोकतांत्रिक संवाद से बाहर महसूस कराया गया है?

Read More: The Unspeakable Rebellion: How Gaalis Became the Grammar of a New Politics

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now