गौतम अडानी अब केवल ‘गौतम अडानी’ नहीं हैं! वे अब एक व्यक्ति, कारोबारी और धनपति से ऊपर उठकर भारत की बदलती भू-आर्थिक रणनीति के सबसे प्रभावशाली निजी चेहरे और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के सबसे चर्चित प्रतीक हैं। भारत की राजनीति और काजनीति के केन्द्र में वे रहते हैं। कई बाहरी देशों में वे प्रधानमंत्री के साथ यात्रा भी करते हैं और प्रमुख सहयोगी भी हैं। वे भारतीय कॉरपोरेट इतिहास में अभूतपूर्व व्यक्तित्व हैं। क्या यह सब केवल संयोग है? या भारत एक नए आर्थिक मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जिसमें कुछ बड़े कॉरपोरेट समूह देश की भू-आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के वाहक बन रहे हैं?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 6 जुलाई से 11 जुलाई 2026 तक इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की यात्रा की थी। इंडोनेशिया केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति का केंद्रीय बिंदु है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है मलक्का स्ट्रेट (जलडमरूमध्य)! मलक्का स्ट्रेट के समुद्री मार्ग से ही विश्व व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा गुजरता है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा भाग इसी मार्ग पर निर्भर है। यदि कभी यह समुद्री मार्ग बाधित हो जाए, तो एशियाई अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो सकता है।
भारत ने इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी सिरे पर वेह (Weh) द्वीप पर स्थित सबांग पोर्ट के विकास में रुचि लेनी शुरू की है। यह बंदरगाह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है और भारत के ग्रेट निकोबार से केवल 160 किलोमीटर दूर स्थित है। हालांकि अभी तक अडानी समूह को किसी इंडोनेशियाई बंदरगाह का औपचारिक ठेका मिलने की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि भविष्य में ऐसा होता है तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इंडोनेशिया के साथ इस दिशा में काम आगे बढ़ रहा है।
सबांग पोर्ट भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के करीब ही है और अगर वहां अडानी को जगह मिलती है तो भारत की समुद्री उपस्थिति मजबूत होगी, साथ ही भारतीय व्यापार को नया लॉजिस्टिक्स नेटवर्क मिलेगा। इसके अलावा अडानी पोर्ट्स का वैश्विक विस्तार और तेज होगा। आज अडानी पोर्ट्स केवल भारतीय कंपनी नहीं रह गई है। इस समूह की उपस्थिति कई देशों तक फैल चुकी है। इजराइल का हाइफा पोर्ट—यह केवल व्यापारिक सौदा नहीं था। हाइफा यूरोप, भूमध्यसागर और पश्चिम एशिया को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण बंदरगाह है। इस अधिग्रहण ने संकेत दिया कि अडानी समूह वैश्विक समुद्री नेटवर्क बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि भविष्य में इंडोनेशिया या अफ्रीका में भी उसकी उपस्थिति बढ़ती है, तो वह एशिया की सबसे प्रभावशाली पोर्ट कंपनियों में शामिल हो सकता है।
अडानी पोर्ट्स पहले ही भारत के सबसे बड़े निजी बंदरगाह संचालक हैं। समूह के पास भारत में कई प्रमुख बंदरगाहों का संचालन है और वह श्रीलंका, इजराइल तथा अफ्रीका में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। इंडोनेशिया में प्रवेश इस नेटवर्क को और अधिक मजबूत कर सकता है। बंदरगाह, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स को एक साथ जोड़कर अडानी समूह वह मॉडल बना रहा है जिसे चीन की कई बड़ी कंपनियों ने अपनाया था। इंडोनेशिया में अडानी समूह की मौजूदगी के तथ्य अभी पूरी तरह सामने आने बाकी हैं।
प्रधानमंत्री की यात्रा का दूसरा पड़ाव ऑस्ट्रेलिया था। यदि अडानी साम्राज्य की सबसे विवादास्पद कहानी खोजी जाए, तो वह ऑस्ट्रेलिया के कारमाइकल कोयला प्रोजेक्ट की है। ऑस्ट्रेलिया में अडानी समूह को पर्यावरण कार्यकर्ताओं, स्थानीय संगठनों और कई राजनीतिक दलों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। उन पर आरोप लगाया गया कि उनका प्रोजेक्ट ग्रेट बैरियर रीफ को नुकसान पहुँचा सकता है और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देगा। विरोध इतना व्यापक था कि कई अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने परियोजना को वित्तपोषित करने से इनकार कर दिया, लेकिन अडानी पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने संसाधनों से परियोजना को आगे बढ़ाया और अंततः ऑस्ट्रेलिया में एक बड़ी उपस्थिति स्थापित कर ली। आज अडानी का ऑस्ट्रेलिया में ऊर्जा और खनन क्षेत्र में प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
ऑस्ट्रेलिया और भारत ने हाल की यात्रा के दौरान ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम के भारत को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा उपयोग के लिए निर्यात पर नया समझौता आगे बढ़ाया है। यह भारत के 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा लक्ष्य से जुड़ा है। अडानी समूह का कोई सार्वजनिक रूप से घोषित यूरेनियम माइनिंग प्रोजेक्ट नहीं है। हाँ, समूह ऊर्जा, खनन, बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स में सक्रिय होने के कारण भविष्य में यूरेनियम सप्लाई-चेन में भूमिका निभा सकता है, यह अनुमान स्वाभाविक ही है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों देश क्वाड समूह के सदस्य हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर समान चिंताएँ रखते हैं। भारत की ऊर्जा आवश्यकताएँ तेजी से बढ़ रही हैं। यदि भारत को कार्बन उत्सर्जन कम करते हुए आर्थिक विकास बनाए रखना है, तो परमाणु ऊर्जा एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है। ऑस्ट्रेलिया विश्व के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में से एक है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के बाद ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम आपूर्ति का रास्ता खुला। यह समझौता केवल ऊर्जा व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का भी प्रतीक है। भारत का परमाणु ऊर्जा क्षेत्र सरकारी नियंत्रण में है, लेकिन वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में निजी कंपनियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। यदि भविष्य में भारत परमाणु ऊर्जा उत्पादन में तेजी लाता है, तो यूरेनियम लॉजिस्टिक्स, खनन अवसंरचना और संबंधित सेवाओं में निजी क्षेत्र के लिए बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडारों वाले देशों में से एक है। भारत के घरेलू भंडार सीमित हैं। इसलिए भारत को ऑस्ट्रेलिया, कजाखस्तान, कनाडा और नामीबिया जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा। भारत-ऑस्ट्रेलिया परमाणु सहयोग समझौते ने इसी दिशा में नई संभावनाएँ खोली हैं। गौर करने वाली बात यह है कि अडानी समूह ने ऑस्ट्रेलिया में ऊर्जा एवं खनन परियोजनाओं में भारी निवेश किया है। समय-समय पर यह चर्चा भी होती रही है कि भविष्य में समूह यूरेनियम खनन या उससे संबंधित सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभा सकता है। यदि भारत भविष्य में परमाणु ऊर्जा में भारी विस्तार करता है, तो यूरेनियम सप्लाई चेन में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में अडानी समूह एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन सकता है। अभी इस बारे में दावे से कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
अडानी समूह अब भारत में रियल एस्टेट का नंबर वन खिलाड़ी बन चुका है। समूह ने पिछले कुछ वर्षों में मुंबई, नवी मुंबई, अहमदाबाद, गुरुग्राम और अन्य महानगरों में बड़े पैमाने पर भूमि और इंफ्रास्ट्रक्चर परिसंपत्तियों का अधिग्रहण किया है। नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट परियोजना के आसपास विशाल भूमि विकास योजनाएँ, धारावी पुनर्विकास परियोजना और बड़े पैमाने पर टाउनशिप निर्माण किया है। मुंबई की धारावी पुनर्विकास परियोजना को भारत की सबसे बड़ी शहरी पुनर्विकास योजनाओं में गिना जा रहा है। लगभग 600 एकड़ क्षेत्र में फैली इस परियोजना का आर्थिक मूल्य अरबों डॉलर में आँका जा रहा है।











