प्रताप भानु मेहता (विख्यात बुद्धिजीवी तथा अशोका यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति) के तर्क का प्रत्युत्तर
प्रताप भानु मेहता ने हाल में चेतावनी दी कि यदि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा टूट गया, तो उसका असर केवल किसी आंदोलन या राजनीतिक उथल-पुथल तक सीमित नहीं रहेगा; वह भारतीय राज्य की बुनियाद को ही हिला सकता है। इस तर्क पर व्यापक चर्चा हुई है और होना भी चाहिए। उनका कहना है कि ऐसे राज्य में, जो नागरिकों को देने के लिए बहुत कम बचा है, परीक्षा व्यवस्था ही प्रक्रियागत निष्पक्षता का अंतिम स्तंभ है। यदि यह स्तंभ ढह गया, तो राज्य की वैधता भी उसके साथ ढह जाएगी।
यह तर्क सुनने में जितना आकर्षक है, उतना ही भ्रामक भी है। इसकी बुनियाद उसी कमजोरी पर टिकी है, जिसे प्रताप भानु मेहता स्वयं अपने पहले के लेखन में उजागर कर चुके हैं।
विरोधाभास का बोझ
2019 में प्रताप भानु मेहता ने ‘द बर्डन ऑफ मेरिटोक्रेसी’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण लेख लिखा था। उसमें उन्होंने कहा था कि परीक्षा व्यवस्था वास्तव में लोकसेवक नहीं तैयार करती, बल्कि ऐसे नौकरशाह पैदा करती है जो अपने पद को जनता के प्रति उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि अपनी अर्जित उपलब्धि और विशेषाधिकार के रूप में देखते हैं। उन्होंने यह भी लिखा था कि मेरिटोक्रेसी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसकी प्रक्रियागत निष्पक्षता उसे गहरी आलोचना से लगभग बचा लेती है। यह व्यवस्था व्यक्ति को उसके समाज और समुदाय से अलग कर देती है तथा उसकी निष्ठा लोगों के बजाय राज्य के प्रति गढ़ती है।
अब 2024 में उसी परीक्षा व्यवस्था को राज्य की वैधता की आधारशिला बताकर उसकी रक्षा करने का आग्रह किया जा रहा है।
ये दोनों बातें केवल विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि एक गहरी विडंबना भी हैं। लेकिन विडंबना किसी तर्क को सही नहीं बना देती। जिस व्यवस्था को कभी सामाजिक सड़ांध पैदा करने वाली मशीन बताया गया था, आज उसी को बचाने की अपील की जा रही है। यानी समस्या की जड़ से मुकाबला करने के बजाय उस व्यवस्था की रक्षा करने को कहा जा रहा है, जो स्वयं उस समस्या को ढकने का काम करती है।
निष्पक्षता, न्याय नहीं होती
परीक्षा व्यवस्था केवल एक चीज़ देती है—प्रक्रियागत निष्पक्षता। सभी अभ्यर्थियों के लिए एक ही प्रश्नपत्र, एक ही समय और एक ही मूल्यांकन पद्धति। कागज़ पर हर उम्मीदवार बराबर दिखाई देता है।
लेकिन निष्पक्षता और न्याय एक ही बात नहीं हैं।
निष्पक्षता न्याय
सभी के लिए समान नियम सभी के लिए समान गरिमा और न्यायपूर्ण परिणाम
सभी के लिए एक जैसी शुरुआती रेखा यह स्वीकार करना कि सबकी शुरुआती परिस्थितियाँ
समान नहीं हैं
प्रक्रिया की वैधता वास्तविक गरिमा
यूपीएससी की परीक्षा निष्पक्ष हो सकती है, लेकिन वह न्यायपूर्ण नहीं है।
यह व्यवस्था 1.4 अरब की आबादी में से कुछ हजार लोगों का चयन करती है। ऐसा करते हुए वह समाज के बहुसंख्यक लोगों को ऊपर नहीं उठाती, बल्कि उनके बाहर रह जाने को वैधता प्रदान करती है। जो असफल हो जाते हैं, उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनमें ही कमी थी। और जो सफल हो जाते हैं, उन्हें बताया जाता है कि उन्होंने अपना स्थान अपनी योग्यता से अर्जित किया है।
इस प्रकार व्यवस्था, समाज में पहले से मौजूद असमानता को व्यक्ति की व्यक्तिगत असफलता में बदल देती है, और व्यक्तिगत सफलता को नैतिक अधिकार का रूप दे देती है।
यह न्याय नहीं है।
यह उन लोगों को ही उनकी वंचना के लिए दोषी ठहराने का तरीका है, जिन्हें व्यवस्था ने पहले से ही पीछे छोड़ रखा है।
नुकसानदेह समावेशन
अमर्त्य सेन ने बहिष्कार और नुकसानदेह समावेशन के बीच अंतर करने की बात कही थी। परीक्षा व्यवस्था दूसरे प्रकार का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
आपको प्रतियोगिता में शामिल होने की अनुमति तो मिलती है, लेकिन केवल एक याचक की तरह। प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, पर उन्हीं शर्तों पर जो राज्य तय करता है। जीत सकते हैं, लेकिन तभी जब यह स्वीकार कर लें कि जीत का अर्थ अपने समुदाय की सेवा नहीं, बल्कि राज्य की सेवा करना है। आपको स्थान तो मिलता है, लेकिन वह स्थान आपको अपनी जड़ों, अपने लोगों और उनके प्रति अपनी जवाबदेही से अलग कर देता है।
यह मुक्ति नहीं है।
यह अवसर का रूप देकर अपने पक्ष में मिला लेने की प्रक्रिया है।
आरक्षण व्यवस्था भी, प्रताप भानु मेहता की पहले की आलोचना के बावजूद, लंबे समय तक इसी तर्क पर चलती रही है। लगभग आठ दशकों से उसने वंचित समुदायों को समावेशन का अवसर तो दिया, लेकिन ऐसी शर्तों पर, जिनमें चयनित व्यक्ति अपने ही समुदाय से कट जाता है।
जो दलित या आदिवासी अभ्यर्थी यूपीएससी में सफल होता है, वह अपने समुदाय का प्रतिनिधि नहीं, राज्य का सेवक बन जाता है। उसकी व्यक्तिगत सफलता को इस बात का प्रमाण बना दिया जाता है कि व्यवस्था काम कर रही है, जबकि उसका समुदाय अब भी वंचित, गरीब और लगभग आवाज़हीन बना रहता है।
यह परीक्षा व्यवस्था प्रतिनिधि तैयार नहीं करती।
यह केवल ऐसे उदाहरण तैयार करती है, जिनके सहारे व्यवस्था अपनी विफलताओं पर पर्दा डाल सके।
राज्य के पास देने के लिए कुछ नहीं
यहीं इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है।
यह कहा जाता है कि परीक्षा व्यवस्था राज्य की वैधता का अंतिम स्तंभ इसलिए है क्योंकि राज्य के पास नागरिकों को देने के लिए अब कुछ और बचा नहीं है।
लेकिन यह परीक्षा व्यवस्था के पक्ष में दिया गया तर्क नहीं है।
यह स्वयं राज्य के खिलाफ आरोप-पत्र है।
राज्य के पास देने के लिए कुछ नहीं
आख़िर राज्य के पास देने के लिए कुछ बचा ही क्यों नहीं?
क्योंकि उसने अपने अस्तित्व की वास्तविक सामग्री स्वयं खो दी है। वह न नागरिकों को कल्याण दे पा रहा है, न वास्तविक गरिमा, न न्याय, न सुरक्षा और न ही भविष्य की कोई आशा। उसके पास जो एकमात्र साधन बचा है, वह परीक्षा व्यवस्था है। राज्य मानो अपने नागरिकों से कहता है—
‘हम तुम्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ, अच्छी शिक्षा, रोजगार या सम्मान नहीं दे सकते। लेकिन हम तुम्हें इस व्यवस्था से बाहर निकलने का एक निष्पक्ष अवसर ज़रूर दे सकते हैं।’
यह वैधता नहीं है।
यह अभाव को हथियार बनाकर लोगों को विवश करने का तरीका है। परीक्षा व्यवस्था राज्य की ताकत नहीं है।यह तो इस बात की स्वीकारोक्ति है कि राज्य अपने मूल दायित्वों को निभाने में दिवालिया हो चुका है।
चुनावों का व्याकरण
यही तर्क चुनावी व्यवस्था पर भी समान रूप से लागू होता है।
‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली भी परीक्षा व्यवस्था की तरह एक प्रक्रियागत तंत्र है, जो जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना वैधता प्रदान कर देता है।
निर्वाचित प्रतिनिधियों का चयन पहले राजनीतिक दल करते हैं, फिर चुनाव के माध्यम से उन्हें वैधता मिल जाती है। व्यवहार में उनकी जवाबदेही न दल के प्रति होती है और न ही जनता के प्रति। उनकी प्राथमिक निष्ठा उस राजनीतिक दल के प्रति होती है जिसने उन्हें टिकट दिया, न कि उस निर्वाचन क्षेत्र के प्रति जिसने उन्हें चुना।
जिस प्रकार नौकरशाह राज्य का सेवक बन जाता है, उसी प्रकार राजनेता भी अंततः राज्य का सेवक बन जाता है, जनता का नहीं।
जनता का प्रतिनिधित्व नहीं किया जाता।उसका केवल प्रबंधन किया जाता है।
एक वैकल्पिक व्यवस्था
यदि परीक्षा व्यवस्था केवल एक बहाना है, तो विकल्प क्या हो सकता है?
2019 में प्रताप भानु मेहता द्वारा उठाए गए प्रश्न स्वयं एक दूसरी दिशा की ओर संकेत करते हैं, भले ही बाद के तर्क उस दिशा से अलग हो जाते हों।
ऐसी स्वीकारोक्तिपरक व्यवस्था, जिसमें समुदाय स्वयं सार्वजनिक नामांकन करे, उम्मीदवारों की सार्वजनिक पड़ताल करे और जिन लोगों को अपनी ओर से सार्वजनिक दायित्व सौंपना चाहता है उन्हें जवाबदेह बनाए, वैधता का स्रोत राज्य से हटाकर जनता के पास ले आएगी।
वर्तमान व्यवस्था बनाम वैकल्पिक स्वीकारोक्तिपरक व्यवस्था
गुमनाम परीक्षा सार्वजनिक नामांकन
चयन राज्य करता है समुदाय अधिकार देता है
राज्य के प्रति निष्ठा समुदाय के प्रति जवाबदेही
अर्जित विशेषाधिकार सौंपा गया दायित्व
व्यक्तिगत उपलब्धि सामूहिक विश्वास
यह न तो भाई-भतीजावाद की वापसी है और न ही संकीर्ण स्थानीयता की।
यह इस मूल सिद्धांत को स्वीकार करना है कि वैधता राज्य से नहीं, जनता से आती है।
यह उस हेगेलीय नौकरशाही की अस्वीकृति भी है जो स्वयं को सार्वभौमिक बताती है, जबकि लोगों को उनसे दूर करती है; स्वयं को तर्कसंगत बताती है, जबकि मानवीय संवेदना से रिक्त रहती है; और स्वयं को निष्पक्ष बताती है, जबकि लोगों की वास्तविक परिस्थितियों के प्रति उदासीन बनी रहती है।
वास्तविक संकट
यदि परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा टूटता है तो राज्य संकट में पड़ सकता है।
लेकिन वास्तविक संकट भरोसे के टूटने में नहीं है। वास्तविक संकट उस भरोसे में है जो हमने दशकों तक ऐसी व्यवस्था पर किया, जो उसकी पात्र ही नहीं थी। परीक्षा व्यवस्था दशकों से राज्य के लिए एक सुविधाजनक बहाना बनी हुई है। उसने राज्य को कल्याण, न्याय और जवाबदेही जैसे अपने मूल दायित्वों से बचने का अवसर दिया है। उसने नागरिकों को याचक बना दिया, समुदायों को हाशिए पर पहुँचा दिया और सार्वजनिक पदों को सार्वजनिक उत्तरदायित्व के बजाय निजी विशेषाधिकार में बदल दिया।
यदि यह बहाना अब टूटता है, तो राज्य निश्चित रूप से संकट में पड़ेगा।
लेकिन वह कोई त्रासदी नहीं होगी।
वह जवाबदेही का क्षण होगा।
और जवाबदेही का वही क्षण, चाहे जितना भी पीड़ादायक हो, पुनर्निर्माण का एकमात्र रास्ता है।
निष्कर्ष
प्रताप भानु मेहता भारत के सार्वजनिक जीवन के सबसे प्रखर चिंतकों में से एक हैं। लेकिन इस प्रश्न पर उनकी चिंता उनकी अंतर्दृष्टि पर भारी पड़ती दिखाई देती है।
यह सही है कि परीक्षा व्यवस्था पर उसकी क्षमता से कहीं अधिक बोझ डाल दिया गया है।
लेकिन यह निष्कर्ष सही नहीं है कि इसलिए उसकी हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए।
परीक्षा व्यवस्था राज्य को संभालकर नहीं रखती।
वह राज्य को आगे बढ़ने से रोकती है।
भारत को किसी बेहतर परीक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि एक बेहतर राज्य की आवश्यकता है—ऐसे राज्य की जो सेवा करे, जवाबदेह हो और अपनी वैधता उन लोगों से प्राप्त करे जिनकी रक्षा और सेवा के लिए उसका अस्तित्व है।
ऐसा राज्य उस व्यवस्था का बचाव करके नहीं बनेगा जो उसकी विफलताओं पर पर्दा डालती रही है।
वह तभी बनेगा जब सड़ांध पैदा करने वाली संरचना का सामना किया जाएगा, विशेषाधिकार की मशीनरी को तोड़ा जाएगा और समाज का पुनर्निर्माण बिल्कुल नीचे से किया जाएगा, जहाँ समुदाय स्वयं अपने भविष्य के निर्माता बनें।
परीक्षा व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र का अंतिम स्तंभ नहीं है।
वह उसकी विफलताओं का अंतिम बहाना है।











