कोई और व्यक्ति यह बात कहता तो शायद उतनी चिंता नहीं होती, लेकिन अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कही है, तो समझ लीजिए कि हालात कितने नाजुक हैं! प्रधानमंत्री ने हाल ही में नीदरलैण्ड में कहा है कि यह दुनिया के लिए आपदाओं का दशक है। पहले कोरोना, फिर युद्ध, अब ऊर्जा संकट। हालात नहीं बदले तो दुनिया गरीबी के दलदल में फंस सकती है। भारत में इन आपदाओं का ट्रेलर आप सरकार के फैसलों में देख ही रहे हैं।
भारत सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है देश की अर्थव्यवस्था को संभालने की। डॉलर की कीमत और ज्यादा न बढ़े, रुपये पर दबाव कम हो, भारत का फॉरेक्स रिजर्व बचा रहे और महंगाई कंट्रोल में रहे। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है और 96 के स्तर पर पहुंच गया है। यही हाल रहा तो जल्दी ही डॉलर 100 रुपये के बराबर हो जाएगा।
डॉलर अगर एक रूपया भी महंगा हो जाये तो इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे आयात पर पड़ता है। आम आदमी का बोझ बढ़ने लगता है, क्योंकि हर चीज महंगी हो जाती है। सामग्री के अलावा सर्विस सेक्टर भी इसके प्रभाव में आता है। सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ता है। जो कंपनियां फायदे में हैं, उनका मुनाफा कम होने लगता है। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ता है।
आशंका यह है कि जिस गति से डॉलर बढ़ रहा है, जल्दी ही 100 रुपये का 1 डॉलर हो जाएगा। अगर ऐसा हुआ, तो हमारा करंट अकाउंट डेफिसिट दो से ढाई प्रतिशत तक बढ़ सकता है। डॉलर 100 रुपये का हुआ तो भारत का तेल बिल 20 से 30 अरब डॉलर तक बढ़ जाएगा। भारत का आईटी और फार्मा सेक्टर दबाव में आ जाएगा। शेयर मार्केट पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। विदेश यात्रा महंगी हो जाएगी। आयातित सामान महंगे हो जाएंगे। ईएमआई की दरें बढ़ जाएंगी। यानी सब तरफ त्राहि-त्राहि मच जाएगी!
व्यक्तिगत रूप से हर नागरिक को तो और ज्यादा महंगाई का सामना करना ही पड़ेगा और सरकार के लिए नई आर्थिक चुनौतियां तैयार हो जाएंगी। भारत की विकास दर पर इसका असर पड़ेगा और दीर्घकालिक रूप से भारत को आर्थिक मजबूती प्रदान करने की दिशा में संकट पैदा होगा।
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत में सरकार ने लगभग 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ाने की छूट दे दी है। इससे पेट्रोलियम कंपनियों को आंशिक राहत ही मिली है। यह तय मानिए कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें अभी और बढ़ेंगी। भारत सरकार देश के लोगों को जोर का झटका नहीं देना चाहती, इसलिए धीरे-धीरे कदम उठा रही है। पेट्रोल और डीजल की कीमतें अगर और बढ़ती हैं, तो सरकार भी बहुत समय तक उन्हें रोक नहीं सकती। जिस तरह 3 रुपये प्रति लीटर के दाम बढ़ाए गए हैं, जल्दी ही इस तरह के दाम और बढ़ाए जाएंगे।
अगर प्रधानमंत्री ने कहा है कि तेल बचाइए, तो उसके बहुत गंभीर मायने हैं। सरकार नहीं चाहती कि ऑयल इंपोर्ट पर उसका बोझ बढ़े, क्योंकि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ रहा है। सरकार चाहती है कि देश में पेट्रोल, डीजल और गैस की खपत कम हो। इसके साथ ही देश के लोग एक-दो साल तक सोने के नए गहने न खरीदें और विदेश यात्राएं टालें, क्योंकि इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ता है। एक अनुमान है कि अगर भारत में 20 फ़ीसदी ईंधन बचा लिया जाए और सोना व अन्य धातुओं की खरीद कम की जाए, तो लगभग 6 लाख करोड़ रुपये तक की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है।
अगर कोई यह कहे कि इसके लिए भारत सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है, तो वह गलत होगा। भारत सरकार हर संभव कोशिश कर रही है कि डॉलर की कीमत और न बढ़ पाए। यह भी कोशिश है कि ऑयल इंपोर्ट नियंत्रित रहे। जैसे ही आयात बिल बढ़ता है, हमारा रुपया कमजोर हो जाता है और भारत के फॉरेक्स रिजर्व पर इसका असर पड़ता है।
अब दिक्कत यह है कि भारतीय इकोनॉमी आटे के दीये के समान हो गई है। जिसे घर में रखो, तो चूहों से खतरा है और बाहर रखो, तो कौव्वों से। हाल यह है कि अगर सरकार अर्थव्यवस्था को झटके से बचाने के लिए पेट्रोल-डीजल महंगा करे, तो महंगाई बढ़ जाए और आम आदमी पर बुरा असर पड़े।
100 रुपये का एक डॉलर केवल एक आंकड़ा नहीं होगा, बल्कि भारत के लिए वास्तविक और मनोवैज्ञानिक चुनौती दोनों होगी। इससे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ जाएंगी, जिससे पेट्रोल की कीमत 120 से 140 रुपये के आसपास पहुंच सकती है। माल भाड़ा बढ़ जाएगा, जिससे हर सामान महंगा हो जाएगा। खेती करना महंगा हो जाएगा। खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाएंगी। छोटे व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा। गैस, बिजली, प्लास्टिक, सीमेंट और स्टील , इन सबकी लागत बढ़ जाएगी। होम लोन महंगे हो जाएंगे। ईएमआई बढ़ जाएगी। निवेश कम हो जाएगा। विदेशी निवेशक डॉलर मजबूत होते ही अपना पैसा निकालने लगेंगे। इससे शेयर बाजार नीचे आ जाएगा, रुपया और कमजोर हो जाएगा और स्टार्टअप फंडिंग कम हो जाएगी। भारत का व्यापार घाटा बढ़ जाएगा और सब्सिडी पर दबाव भी बढ़ने लगेगा। सरकारी खर्चों को सीमित करना होगा। सरकार फिर टैक्स बढ़ा सकती है, अपना खर्च घटा सकती है और निजीकरण को तेज कर सकती है। नतीजा निकलेगा , मुश्किलें ही मुश्किलें।
जरा अंदाज लगाइए कि देश में कैसा माहौल होगा, जब लोगों को लगेगा कि उनकी बचत सुरक्षित नहीं है, उनकी नौकरी कभी भी जा सकती है और महंगाई पर सरकार का कोई कंट्रोल नहीं है। ऐसे में लोग खर्च कम करते हैं और जब लोग कम खर्च करते हैं, तब अर्थव्यवस्था की रफ्तार और धीमी हो जाती है। यानी यह संकट केवल रुपये और डॉलर का नहीं होगा, बल्कि सरकार के प्रति विश्वास का भी संकट होगा।
इसके लिए तैयार होना ही पड़ेगा, क्योंकि हम नागरिकों के हाथ में करने के लिए बहुत कुछ नहीं है! इसलिए अपनी कमर की पेटी बाँध लीजिए क्योंकि उड़ान आसान नहीं है।
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