प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रवास के दौरान नार्वे की पत्रकार हेले लिंग और भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के बीच प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुई तकरार ने जाने-अनजाने दुनिया के सामने भारत में प्रेस की स्थिति का नजारा पेश कर दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी जब नार्वे के प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त बयान देकर बिना प्रेस से सवाल लिए जा रहे थे, तब हेले ने मोदी को संबोधित करते हुए कहा कि वे दुनिया के सबसे आजाद प्रेस के पत्रकारों से कुछ सवाल क्यों नहीं लेते। यह सबने देखा कि कैसे इस सवाल का जवाब दिए बिना मोदी आगे बढ़ गए। यहां तक कि हेले ने उनसे दोबारा सवाल करने की भी कोशिश की थी।
इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री मोदी की नार्वे यात्रा को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की ओर वहां खासतौर से हेले को भी बुलाया गया था, लेकिन वहां जो कुछ हुआ, उसमें साफ दिखा कि असली सवालों से बचते हुए किस तरह से विदेश मंत्रालय के सचिव भारत के पांच हजार साल के इतिहास तक पहुंच गए!
दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में जो सबसे अहम बात है, वह है प्रेस की आजादी। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर दुनिया भर के देशों में प्रेस की आजादी की स्थिति को देखते हुए एक सूचकांक जारी करता है और इस सूचकांक में जहां नार्वे शीर्ष पर है, वहीं भारत 180 देशों में 157 वें नंबर पर है। वास्तविकता यह है कि मोदी सरकार के आने के बाद से भारत इस सूचकांक में नीचे ही गया है।
यही नहीं, आठ दिन बाद 27 मई को प्रधानमंत्री के रूप में 12 साल पूरे कर रहे नरेंद्र मोदी ने पद संभालने के बाद से आज तक भारत में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। विदेश यात्राओं में भी अपवाद स्वरूप एक दो बार उन्होंने मेजबान नेता के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के इक्का दुक्का सवालों का ही सामना किया है। दुनिया के सबसे बडे संसदीय लोकतंत्र के मुखिया की प्रेस से ऐसी बेरुखी पर जाहिर है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी नजर रहती है।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर मोदी के पूर्ववर्ती डॉ. मनमोहन सिंह तक देश के किसी अन्य प्रधानमंत्री ने प्रेस से खुले तौर पर मिलने और उसके सवालों का जवाब देने में गुरेज नहीं किया। दरअसल यही तो भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है।
बेशक नार्वे के प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त बयान देने के बाद प्रधानमंत्री मोदी अचानक पूछे गए किसी सवाल का जवाब देने को बाध्य नहीं थे। लेकिन उसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने जिस तरह से हेले लिंग के सवालों का जवाब दिया है, उसमें उनकी बौखलाहट साफ नजर आ रही थी।
हेले ने दो टूक पूछा था कि भारत और नार्वे एक दूसरे के साथ मजबूत साझेदारी कर रहे हैं, लेकिन हम आप पर भरोसा क्यों करें? क्या आप वादा करते हैं कि अपने देश में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन को रोकेंगे? आपके प्रधानमंत्री मुश्किल सवालों का जवाब कब देंगे?
इसका जवाब तात्कालिक संदर्भों में देने के बजाय विदेश मंत्रालय के सचिव सीबी जॉर्ज ने जिस तरह से पांच हजार के साल इतिहास और शून्य के अविष्कार तक की बात कर दी, उसकी तो जरूरत ही नहीं थी। राजनय का कौशल तो इसी में था कि जवाब संजीदगी से दिया जाता और बात तात्कालिक संदर्भों तक ही सीमित रखी जाती।
क्या यह याद दिलाने की जरूरत है कि दो- दो विश्व युद्ध का सामना कर चुकी दुनिया जानती है कि भारत गांधी का देश है और संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद पर खड़ा है।
दरअसल मुश्किल यह है कि मोदी सरकार को पांच हजार साल का इतिहास तो याद रहता है, लेकिन वह 2014 और 1947 के बीच के करीब सात दशक को भूल जाती है, जब एक संसदीय लोकतंत्र के रूप में भारत ने अपनी जगह बनाई!
ओस्लो में भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई तकरार के बाद जिस तरह से भारतीय मीडिया हेले लिंग पर हमलावर हो गया है, वह भी कम हैरान नहीं करता।
हेले को विदेशी एजेंट और एजेंडाबाज पत्रकार बताने वाला भारतीय मीडिया शायद यह भूल गया कि हेले ने अपने देश के प्रधानमंत्री को भी इसलिए कठघरे में खड़ा कर दिया, क्योंकि उन्होंने वहां आए भारतीय पत्रकारों को नजरंदाज कर उनके सवालों के जवाब नहीं दिए।
वैसे विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने भारत का समकालीन इतिहास भी पढ़ा ही होगा और उन्हें पता होगा कि आजादी के आंदोलन के नायक महात्मा गांधी से लेकर नेहरू और आंबेडकर तक पत्रकारिता से जुड़े हुए थे, क्योंकि वे इसकी ताकत को जानते थे।











