संसदीय समिति ने देश में दवाओं की बढ़ती कीमतों पर चिंता जताते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण सिफारिश की है. रसायन और उर्वरक मंत्रालय से जुड़ी इस स्थायी समिति ने सरकार को दवाओं की कीमत तय करने के पुराने नियम यानी ‘लागत-आधारित मूल्य निर्धारण व्यवस्था’ (कॉस्ट-बेस्ड प्राइसिंग) को फिर से शुरू करने की संभावनाओं पर विचार करने की सलाह दी है. सांसद कीर्ति आजाद झा की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी 33वीं रिपोर्ट में कहा है कि बाजार-आधारित मौजूदा व्यवस्था के कारण कई मामलों में दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और असामान्य रूप से अधिक मुनाफाखोरी देखी जा रही है. ऐसे में कानून में जरूरी संशोधन करके लागत के आधार पर दवाएं सस्ती करने का रास्ता तलाशा जाना चाहिए.
क्या थी दवा मूल्य नियंत्रण आदेश 1995:
दरअसल, देश में वर्ष 2013 के ‘दवा मूल्य नियंत्रण आदेश’ (DPCO) के तहत दवाओं के दाम तय करने का तरीका बदल दिया गया था. पुरानी व्यवस्था में किसी दवा को बनाने में आई कुल लागत में एक तय मुनाफा जोड़कर उसका अधिकतम मूल्य तय किया जाता था. लेकिन 2013 के नियमों में इसे ‘बाजार-आधारित व्यवस्था’ कर दिया गया. इसके तहत बाजार में कम से कम 1 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली सभी प्रमुख ब्रांड्स की दवाओं के औसत खुदरा मूल्य में 16 प्रतिशत का मार्जिन जोड़कर दाम तय किए जाते हैं.
इसे गहराई से समझने के लिये दवाओं पर जिस मूल्य नियंत्रण को लागू किया गया है उसे संक्षिप्त में समझने का प्रयास करते हैं. साल 1995 में बना दवा मूल्य नियंत्रण आदेश साल 2012 के अंत तक चला. Drugs (Prices Control) Order, 1995 को भारत सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत 1995 में लागू किया था.
इसके तहत हमारें देश में दवाओं पर जो मूल्य नियंत्रण प्रणाली लागू थी उसके तहत मूल्य नियंत्रण दवाओं के लागत पर लागू होती होती थी. जिसके तहत MAPE या मैक्सिम अलाउलेबल पोस्ट मैनुफैक्चरिंग एक्सपेंस के अनुसार दवाओं के दाम निर्धारित किये जाते थे. इसमें देशज दवाओं को बनाने की लागत तथा पैकिंग के खर्च की गणना करके उसमें 100 फीसदी दाम और जोड़कर दवाओं के खुदरा मूल्य तक किये जाते थे. इस तरह से इसी 100 फीसदी में से ही खुदरा दुकान, थोक दुकान, वितरक, कंपनी तथा परिवहन का खर्च निकालना पड़ता था. विदेशों के आयात होने वाली दवाओं पर उनके लैंडिंग कास्ट के आधार पर मूल्य नियंत्रण लागू किये जाते थे.
यह है दवा मूल्य नियंत्रण आदेश 2013:
बाद में साल 2013 के मई माह में जो दवा मूल्य नियंत्रण लाया गया उसमें दवाओं के मूल्य नियंत्रण की धारणा को ही बदल दिया गया. साल 2013 के दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य बाजार के आधार नियंत्रण किया जाने लगा. जिसके तहत ऐसी दवायें जिनका विक्रय कुल दवा विक्रय के 1 फीसदी के बराबर या ज्यादा होता है वह दवा मूल्य नियंत्रण के दायरे में आ गई. लेकिन दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने के तरीकों को पूरी तरह से बदल दिया गया. दवा मूल्य नियंत्रण आदेश 2013 के तहत इन दवाओं के बाजार में उपलब्ध सभी ब्रांडों के दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य के औसत के आधार पर मूल्यों का निर्धारण होगा. इस तरह से जहां दवाओं के लागत के आधार पर मूल्य नियंत्रण लागू होता था उसे बाजार के हवाले कर दिया गया. दवा मूल्य नियंत्रण आदेश 2013 के अनुसार, अनुसूचित दवाएँ जो फार्मा बाज़ार का लगभग 15% हैं, थोक मूल्य सूचकांक के अनुसार सरकार द्वारा इनमें वृद्धि की अनुमति है, जबकि शेष 85% के मामले में 10% प्रत्येक वर्ष की स्वचालित वृद्धि की अनुमति है.
जब से दवा मूल्य नियंत्रण 2013 को लागू किया गया है तब से ही मरीजों को राहत दिलाने के लिये मांग की जा रही है कि दवाओं पर मूल्य नियंत्रण उसके लागत के आधार पर तय होना चाहिये तथा मूल्य मूल्य नियंत्रण को बाजार के हाथ से छुटकारा दिलाया जाये.
संसदीय समिति तथा उसकी सिफारिश:
अब, संसदीय समिति का मानना है कि केवल बाजार के आंकड़ों और खुदरा बिक्री मूल्य पर निर्भर रहने से उस मुनाफाखोरी को नहीं पकड़ा जा सकता जो दवा कंपनियों के एकाधिकार या सप्लाई चेन के अलग-अलग स्तरों पर बहुत ज्यादा मार्जिन की वजह से होती है. समिति का कहना है कि जब दवा बनाने की असली लागत को देखा ही नहीं जाएगा, तो कंपनियां मनमाने दाम वसूलती रहेंगी और आम जनता को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा.
रिपोर्ट तैयार करते समय जब समिति ने रसायन और उर्वरक विभाग से पूछा कि क्या मौजूदा बाजार-आधारित नीति में कोई कमियां हैं जिनका फायदा कंपनियां उठा रही हैं, तो विभाग का कहना था कि यह व्यवस्था सोच-समझकर बनाई गई थी और कोई कमी दिखने पर निर्देश जारी किए जाते हैं. वहीं, दवा की कीमतों पर नजर रखने वाली संस्था ‘राष्ट्रीय औषधीय मूल्य निर्धारण प्राधिकरण’ (NPPA) के प्रतिनिधि ने बताया कि उनके पास दवाओं की निर्माण लागत की ऑडिट करने का कानूनी अधिकार नहीं है. NPPA केवल मौजूदा बाजार कीमतों के हिसाब से ही दाम तय कर सकता है. अगर सरकार नियमों में बदलाव कर उन्हें लागत जांचने का अधिकार देती है, तभी वे इस दिशा में कदम उठा सकते हैं.
इन तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि जिन मामलों में दवाओं की कीमतों में भारी अंतर या अत्यधिक मुनाफाखोरी पाई जाती है, वहां सरकार को तुरंत वैधानिक संशोधन करने चाहिए. समिति ने मंत्रालय से इस दिशा में उठाए गए कदमों की जानकारी देने की भी मांग की है. यदि सरकार इस सिफारिश को मान लेती है, तो आने वाले समय में आम लोगों को जीवन रक्षक और जरूरी दवाएं काफी सस्ती और किफायती दरों पर मिल सकती हैं.
मरीज कोई वोट बैंक नहीं:
गौरतलब है कि एक तरह सारी दुनिया में चिकित्सा तथा दवाओं के खर्च को कम करने के लिये मुहिम चल रही है जबकि हमारे यहां 85 फीसदी दवाओँ के दाम हर साल 10 फीसदी बढ़ाने की अनुमति (पढ़े- लूट की अनुमति) है. दरअसल, हमारे देश में मरीज कोई वोट बैंक नहीं होता है. इसलिये उसकी बात नहीं सुनी जाती है. लोग भी मतदान करते समय नीतियों के आधार पर नहीं नेता के आधार पर वोट देते हैं. जब तक नीतियों के आधार पर वोट देने की परंपरा शुरू नहीं हो जाती है दवा के दाम कम करने जैसी मांग नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती रहेगी. हालांकि संसदीय समिति की सिफारिशें से कुछ उम्मीद जगी है लेकिन क्या कॉर्पोरेट को खुली छूट देने का आरोप जिस सरकार पर लगता है वह इसे मान लेगी? अमेरिका जैसे देश में राष्ट्रपति चुनाव के समय जन स्वास्थय एक मुद्दा बन जाता है लेकिन हर मामलें में अमेरिका की नकल करने वाली सरकार क्यों नहीं इसे अपने देश में भी मुद्दा बनाती है?











