संघ के सौ साल, कितनी बदली चाल

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना के सौ साल इत्तफाक से उस दिन हो रहे हैं, जिस जिन महात्मा गांधी का जन्म हुआ था और यह दिन विजयादशमी का भी दिन है, जिसे देश के बड़े हिस्से में भगवान राम की रावण पर विजय के दिवस के रूप में मनाया जाता है, साथ ही यह दिन नवरात्र की समाप्ति की वजह से देवी पूजा का भी दिन है।

यों संघ की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के दिन हुई थी। इस बार विजयादशमी दो अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन पड़ी है, सो संघ के लिए यह अवसर महात्मा गांधी को याद करने का भी दिन है, जैसा कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में हुए शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए कहा।

संघ की स्थापना तब हुई थी, जब देश महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजी राज के खिलाफ संघर्ष कर रहा था। गांधी तब कांग्रेस के सर्वमान्य नेता थे और उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा का रास्ता चुना था और छुआछूत तथा सांप्रदायिक दुराग्रह जैसी बुराई को खत्म करने के लिए भी लोगों को जागरूक कर रहे थे।

दूसरी ओर अपनी स्थापना के समय से ही हिन्दुत्व की उस विचारधारा को अपनाया, जो आगे चलकर देश के विभाजन का एक बड़ा कारण बन गई। यानी स्वतंत्रता आंदोलन और गांधी की विचारधारा और आरएसएस की विचारधारा में कोई साम्य नहीं था, बल्कि यह इतिहास में दर्ज है कि संघ ने गांधी का विरोध ही किया था।

यहां तक कि 30 जनवरी, 1948 को नाथुराम गोडसे द्वारा गांधी की हत्या कर दिए जाने के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध तक लगा दिया था। वास्तव में देश की स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास एक खुली किताब है, ऐसे में संघ प्रमुख मोहन भागवत ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी यदि बार-बार याद दिलाना पड़ रहा है कि इस किताब में एक सफ्हा संघ के लोगों के योगदान का भी था, तो समझा जा सकता है कि वे किस तरह की मान्यता चाहते हैं!

संघ की इस कश्मकश के बावजदू यह तथ्य है कि बीते सौ सालों में आरएसएस ने पूरे देश में विस्तार किया है और उसने खुद को देश की राजनीति के केंद्र में खड़ा कर दिया है, भले ही वह खुद को सांस्कृतिक संगठन ही क्यों न बताता हो। वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने इसी पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ बताया था।

दरअसल यही समझने की जरूरत है कि एक ऐसा संगठन जिसका पंजीयन भी नहीं है, किस तरह देश की सत्ता के केंद्र में है और आज उसके प्रमुख जो कुछ कहते हैं, तो उसका प्रभाव सरकार की नीतियों में भी दिखता है। ऐसे में कुछ सवाल तो बनते ही हैं, जिन्हें पूछा जाना चाहिए, इसलिए भी क्योंकि इससे संघ के अंतरविरोधों को समझने में मदद मिलेगी।

मसलन, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में दोहराया है कि उनके लिए यानी आरएसएस के लिए भारतीयता का अर्थ हिन्दू राष्ट्रीयता से है और भारत हिन्दू राष्ट्र है, क्या यह संविधान की मूल भावना के उलट नहीं है, जो भारत को एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र मानता है?

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