बर्बरता का महिमामंडन, सच की मॉब लिंचिंग

April 30, 2026 11:36 PM
Odisha

देश में मॉब लिंचिंग की प्रवृति बढ़ी है। मीडिया और सोशल मीडिया को टीआरपी और व्यूज चाहिए। एक वीडियो हिट हो जाए तो मिलियन्स में व्यूज और उसी अनुपात में डॉलर आ सकते हैं। इसके लिए सच की हत्या जरूरी है। सच को व्यूज नहीं मिलते। झूठ को मिल जाते हैं। सच की हत्या अकेले कर दें, तो व्यूज नहीं आएंगे। इसके लिए सच की मॉब लिंचिंग करनी पड़ती है। व्यापक लोगों को इस अपराध में शामिल करना पड़ता है। संवेदनशील, जागरूक लोग भी सच की मॉब लिंचिंग में जुट जाते हैं। प्रगतिशील लोग ऐसा करने लगें, तो सच बोलने वाले इक्का-दुक्का लोगों को सत्तामुखी बताना आसान होता है।

ओड़िशा के क्योंझर का मामला ऐसा ही है। ओड़िशा ग्रामीण बैंक की माल्लीपोसी शाखा में 27 अप्रैल को जीतू मुंडा आया। उसकी बहन कालरा मुंडा की मृत्यु होने के कारण उसके खाते के 19402 रूपए देने की मांग की। बैंक ने नियमानुसार मृत्यु प्रमाणपत्र और वारिस होने का प्रमाण लाने कहा। इसके बाद जीतू मुंडा कब्र खोदकर मृत बहन का कंकाल कंधे पर लेकर बैंक आ गया। पुलिस के हस्तक्षेप से कानूनी प्रक्रिया पूरी करके पूरी रकम तीन वारिसों को दे दी गई। जीतू मुंडा के अलावा उसके एक भाई शंकर मुंडा और एक भाभी गुरूवारी मुंडा में रकम बांटी गई।

किसी ने कंधे पर नरकंकाल लेकर अकेले पैदल जाते जीतू मुंडा का वीडियो वायरल कर दिया। शानदार विजुअल कंटेंट था। मिनटों में पूरे सोशल मीडिया में छा गया। कुछ लोगों को मिलियन्स में व्यू भी मिल गए। इस आधार पर बड़ी संख्या में जागरूक लोगों ने देश की व्यवस्था और गरीब आदिवासी की बेबसी पर आंसुओं का सैलाब ला दिया। इसे नीरव मोदी और विजय माल्या के साथ नरम रवैये से जोड़कर कविताएं भी लिख दी गईं। शायद ही किसी के मन में ख्याल आया कि बैंक वाले भी आम इंसान ही हैं। कर्तव्य पालन के लिए उनकी भी मॉब लिंचिंग कर दी गई। यह झूठ इतना हिंसक था कि बैंक यूनियन चलाने वाले प्रगतिशील संगठनों की हिम्मत नहीं हुई सच बोलने की।

ध्यान रहे, यह कोई सीसीटीवी का फुटेज नहीं था। यह  नजदीक से देर तक लिया गया वीडियो है। जीतू मुंडा इतना सक्षम नहीं, जो किसी पत्रकार से ऐसा वीडियो बनवा ले। इसे किसने बनाया? उसे सूचना कैसे मिली? उसने इसे कैसे वायरल किया। इसका सबसे ज्यादा लाभ किसे मिला? क्या इसमें किसी यूट्यूबर की भूमिका है? ऐसे प्रश्न गौण रह गए। शायद आप नहीं जानते कि आज दुनिया भर में ‘कंटेट क्रिएटर्स’ की बड़ी तादाद है, जो किसी एक वीडियो के वायरल होने की कोशिया में जुटे रहते हैं। इनसे सच को कितना बड़ा खतरा है, यह इसका उदाहरण है।

अब बुनियादी तथ्यों की बात करें। खबर के साथ यहां प्रस्तुत कुर्सीनामा देख लें। जीतू मुंडा अकेला वारिस नहीं। यह कुल छह भाई बहन का परिवार है। मृत बहन के पति और पुत्र की मौत के बाद ससुराल पक्ष से कोई वारिस नहीं बचा था। मृत बहन ने जिस भाई को नॉमिनी बनाया था, उसकी भी मौत हो चुकी है। यानी कोई नॉमिनी नहीं। जिस भाई को नॉमिनी बनाया था, उसके बच्चों का भी कोई हक बनता है, अथवा नहीं, यह देखना भी बैंक का कानूनी दायित्व है। किसी नॉमिनी के अभाव में बैंक का दायित्व है कि मृतक की रकम उसके समस्त वारिसों की सहमति से मिले। पांच भाई बहनों में अकेले जीतू मुंडा का नहीं, सबका हक बनता है। बैंक ने अगर सिर्फ जीतू मुंडा को पूरी रकम दे दी होती तो अन्य दो वारिस केस करके बैंक वाले को जेल भेज सकते थे।

आप कह सकते हैं कि एक गरीब, अशिक्षित आदिवासी के लिए इतनी कानूनी प्रक्रिया पूरी करना आसान नहीं था। इसमें बैंक को खुद आगे बढ़कर मदद करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा सुशासन अब तक नहीं आया है। ऐसे कामों के लिए ही पंचायती राज व्यवस्था बनाई गई है। अधूरी खबर फैलाने वालों ने यह जांच करने की जरूरत नहीं समझी कि जीतू मुंडा ने इस कानूनी प्रक्रिया को पूरी करने में पंचायत अथवा किसी अन्य की मदद मांगी, अथवा नहीं। अगर वह किसी आदिवासी टोले में रहता हो, तो उसके गांव-समाज के लोगों से कोई मदद क्यों नहीं मिली। स्थानीय पंचायत से उसने कोई मदद क्यों नहीं ली? ऐसा क्या हुआ, जिसने उसे अकेले कब्र जाकर खोदने को मजबूर किया? आदिवासी समाज में कब्र को पवित्र स्थल समझा जाता है। कब्र खोदना और मृत देह से छेड़छाड़ करना महापाप समझा जाता है। बीएनएस की धारा 301 के तहत यह अपराध भी है। क्या इस तथाकथित क्रांतिकारी कदम के बाद आदिवासी समाज ने कब्र के अपमान को एक सहज और वाजिब मान लिया? अगर वह किसी परंपरागत टोले में रहता हो, तो मुंडा-पाहन ने इस पर नाराजगी नहीं जताई? क्या यह तरीका भविष्य के लिए भी आदर्श उदाहरण बन गया? मजार पर तो फूल चढ़ाकर सिर झुकाया जाता है। एक कब्र और शव की इस दुर्गति के लिए बैंक कैसे जिम्मेवार है?

बहन के रुपयों की खातिर कोई आदिवासी भाई उसके शव का ऐसा अपमान नहीं करेगा। इसका महिमामंडन उचित नहीं। यह बर्बरता और हिंसक प्रकृति है। इसे आदिवासी स्वभाव कहना आदिवासी समाज का अपमान है। आदिवासी समाज को सामूहिकता के लिए जाना जाता है। ऐसे सामाजिक कार्यों में सामूहिक निर्णय और पारंपरिक स्वशासन की व्यवस्था है। कोई आदिवासी इस तरह स्वप्रेरणा से कब्र को अपमानित करके मृतक की देह को हथियार नहीं बनाएगा। इतना बड़ा काम उसने अकेले क्यों किया? छह भाई-बहन के परिवार में उसने कब्र खोदने और बैंक ले जाने में अन्य वारिसों अथवा परिजनों को साथ क्यों नहीं लिया? उसने यह बात क्यों छुपाई कि कुल तीन वारिस हैं? क्या उन्हें दो तिहाई देना पड़ता इस आदिवासी भोले मन को।

कानूनी बारीकियों को ध्यान में रखकर बैंक वाले ने कर्तव्य का पालन किया। उनकी मॉब लिंचिंग हो रही हैं। आज बैंक वाले के साथ हुआ। कल किसी अन्य के साथ होगा। आप किसी अखबार में किसी लापता की सूचना का विज्ञापन देने जाते हैं। अखबार आपसे पुलिस में दर्ज शिकायत की कॉपी के बगैर नहीं छापेगा। ऐसे नियम कायदों से ही कोई सभ्य समाज चलता है। तमाम नियम व्यापक हितों को ध्यान में रखकर बनते हैं। जरूरत पड़ने पर बदले जाते हैं।

यह भावना में बहने का नहीं, वैज्ञानिक और तर्कशील समाज बनाने का मामला है। जीतू मुंडा ने सामूहिकता और सामाजिक कायदों का पालन करने के बजाय आस्था के प्रतीक कब्र को खोदकर सामाजिक और कानूनी दोनों तरह से गुनाह किया। उसका महिमामंडन समाज को बर्बरता और अतार्किकता की ओर ले जाना है। लेकिन यह सब हमारी आंखों के सामने हो रहा है। सिर्फ इसलिए, ताकि कुछ यूट्यूबरों और चैनलों को दस मिलियन व्यूज़ चाहिए। घर बैठे मोटी रकम आती रहे।

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