ओडिशा के केओंझार जिले में हुई घटना ने पूरे देश की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की नंगी सच्चाई को उजागर कर दिया है। जीतू मुंडा नामक एक आदिवासी को अपनी मृत बहन का पैसा बैंक से निकालने के लिए बहन का कंकाल ही बैंक की शाखा तक ले जाना पड़ा।
कागजी दस्तावेज, मृत्यु प्रमाण-पत्र, उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र ये सब कुछ जुटा पाना उसके लिए इतना असंभव हो गया कि अंततः उसे अपनी बहन की हड्डियों को सबूत के रूप में पेश करना पड़ा।
यह घटना मात्र एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि उस गहरी खाई का प्रतीक है जो आधुनिक भारत में दो वर्गों के बीच बन गई है। एक तरफ वह मुट्ठी भर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग जिनके लिए कानून और व्यवस्था लचीली और सुविधाजनक है।सिस्टम जिनकी चौखट पर चाकरी के लिए हाथ बांधे खड़ा है। दूसरी तरफ हाशिए पर खड़ा वो विशाल तबका जिसमें आदिवासी, दलित और गरीब शामिल हैं,जिनके लिए बुनियादी अधिकार हासिल करना भी एक लंबा और लगभग असंभव संघर्ष बन जाता है।ये वो तबका है जो सिस्टम की चौखट पर एड़ियां रगड़ता खड़ा रह जाता है लेकिन इसके हिस्से ना न्याय है, ना सिस्टम की करुणा !
यह घटना उसी ओडिशा में हुई है, जो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का गृह राज्य है। वहीं छत्तीसगढ़ में जहां राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में छह आदिवासी जनजातियों को विशेष पहचान दी गई है, पड़ोसी राज्य में यह घटना यह सवाल खड़ा करती है कि प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व और वास्तविक सशक्तिकरण में कितना बड़ा अंतर है।
शीर्ष पदों पर आदिवासी चेहरे देखकर हम यह भ्रम नहीं पाल सकते कि धरातल पर उनकी स्थिति बदली है।
सिस्टम की इस क्रूरता पर गंभीर सवाल उठता है। क्या बैंकिंग प्रक्रियाएं सिर्फ गरीब के लिए ही इतनी जटिल हों कि एक गरीब आदिवासी को अपनी मृत बहन का कंकाल उठाकर बैंक जाना पड़े? क्या बैंकों और सरकारी तंत्र में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का पूरी तरह से क्षरण हो चुका है?
नीरव मोदी, विजय माल्या, मेहुल चोकसी जैसे बड़े उद्योगपति इन्हीं बैंकों का हजारों करोड़ रुपये के कर्ज लेकर देश छोड़कर फरार हो जाते हैं और ये बैंक केवल केवल हाथ मलते रह जाते हैं !
जनता की कमाई का ही पैसा लेकर फरार ये उद्योगपति इस देश के ही सिस्टम के कंकाल को कांधे पर लादे विदेशों में मौज कर रहे हैं।क्या इस देश में कागज सिर्फ गरीब से ही मांगे जायेंगे ?
यह दोहरी व्यवस्था देश के संवैधानिक मूल्यों समानता, न्याय और गरिमा का सीधा अपमान है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कानून और प्रक्रियाएं अमीरों के लिए लचीली और गरीबों के लिए कठोर हो गई हैं।
एक सवाल उन ट्रेड यूनियंस से भी है जो इन कर्मचारियों के वेतन भत्तों के लिए तो लड़ाई करते हैं लेकिन क्या कभी अपने सदस्यों को जन संवेदनाओं का पाठ भी पढ़ाते हैं ?
जीतू मुंडा की बहन का कंकाल दरअसल हमारी सामूहिक संवेदनाओं का कंकाल है!
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