आभासी दुनिया में इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी की चर्चा है, महज हफ्ते भर के दौरान जिसके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मस पर कई मिलियन फालोवर्स हो गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली पोस्ट की तरह इस आभासी पार्टी की लोकप्रियता का यह हाल है कि जब इसके एक्स हैंडल पर भारत में रोक लगा दी गई, तो कुछ घंटे के भीतर ही इसके नए हैंडल से हजारों लोग जुड़ चुके थे। मजाक के रूप में शुरू हुई यह पार्टी कितनी गंभीर है और व्यावहारिक जमीन पर कहां खड़ी है, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी भले हो, लेकिन इसे समकालीन भारत के संदर्भ में समझना जरूरी है।
चूंकि सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर फालोवर्स और फ्रेंड्स के जरिये ही किसी हैंडल की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जाता है, तो कॉकरोच जनता पार्टी ने देश में सत्तारूढ़ भाजपा और सबसे बड़े विपक्षी दल को इस मामले में पीछे छोड़ दिया है! दरअसल इस आभासी पार्टी ने जिस तरह से अपना ध्यान देश और दुनिया की ओर खींचा है, उस पर गौर करना जरूरी लगता है, क्योंकि इसमें मौजूदा दौर के बहुत से सवाल अंतर्निहित हैं। इस पार्टी का गठन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की एक मामले के दौरान देश के बेरोजगार युवाओं को कथित रूप से ‘कॉकरोच’ और सामाजिक कार्यकर्ताओं, आरटीआई कार्यकर्ताओँ और मीडिया को ‘परजीवी’ बताने वाली टिप्पणी के बाद हुआ है।
अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे तीस साल के युवक अभिजीत दीपके के एक्स हैंडल से सामने आई कॉकरोच जनता पार्टी ने अचानक देश की सियासत में हलचल मचा दी है। बावजूद इसके कि इसकी चर्चा अभी सोशल मीडिया और मीडिया तक ही सीमित है। वैसे खुद अभिजीत दीपके अपने कई इंटरव्यू में कह चुके हैं कि उन्होंने जोक के रूप में इसे शुरू किया था, लेकिन अब वे इसे लेकर गंभीर हैं। वह जिस तरह से गंभीर राजनीतिक विकल्प की बात कर रहे हैं और दावा कर रहे यह डेमोक्रेसी को बचाने की लड़ाई है और वे इसे संवैधानिक प्रावधानों के जरिये ही लड़ना चाहते हैं और सवाल कर रहे हैं कि भारत सांप्रदायिक राजनीति में और कितने साल गंवाएगे। उससे यह तो साफ है कि देश के युवा को अंडरस्टीमेट नहीं किया जा सकता।
यही नहीं, उनकी पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर जो पांच घोषणाएं की हैं, वे भी गौर करने लायक हैं, जिनमें कहा गया है कि यदि वह सत्ता में आई तो एक भी वैध वोटर का नाम कटने पर मुख्य चुनाव आयुक्त को यूएपीए में गिरफ्तार किया जाएगा, अडानी और अंबानी जैसे समूहों के मीडिया हाउस के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएंगे, एक भी एमएलए या एमपी पार्टी बदलता है, तो 20 साल तक उसके चुनाव लड़ने पर रोक लग जाएगी। मगर ये दावे अभी आभासी ही ज्यादा लगते हैं, इन्हें जमीन पर परखने की जरूरत है।
मोदी सरकार के खिलाफ लोगों में आक्रोश तो है, और वे विकल्प भी चाहते होंगे, लेकिन तात्कालिक आक्रोश के आधार पर इस पार्टी के भविष्य को लेकर कोई घोषणा नहीं की जा सकती। वैसे भी जब तक इस पार्टी की राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती, इसका राजनीतिक ढांचा जमीन पर खड़ा दिखाई नहीं देता, इसकी दशा और दिशा के बारे में राय नहीं बनाई जा सकती।
जिस देश ने आंदोलन के जरिये आजादी हासिल की है, जिस देश को आजादी के बाद समय-समय पर हुए आंदोलनों ने दिशा दिखाई है, उसमें आंदोलन के महत्व को समझा जा सकता है। दूसरी ओर हाल का अन्ना आंदोलन भी है, जिससे निकली आम आदमी पार्टी अपनी वैचारिक कमजोरियों के साथ हमारे सामने है।
खुद अभिजीत दीपके अन्ना आंदोलन से जुड़े रहे हैं और वे जानते ही हैं कि आम आदमी पार्टी को खड़ा करने में सोशल मीडिया ने किस तरह की भूमिका निभाई थी। वह यह भी जानते ही होंगे और उन्हें जानना भी चाहिए कि सोशल मीडिया और जमीनी राजनीति में फर्क है।
दरअसल चिंता इस बात की की जानी चाहिए कि कॉकरोच जनता पार्टी के शोर-शराबे में कहीं देश के संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने की कोशिशों और संगठित तरीके से हो रहे संस्थागत क्षरण की ओर से ध्यान न हट जाए।
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