बांग्लादेश में बीएनपी की जीत का मतलब

February 13, 2026 8:48 PM
Landslide victory for BNP

बांग्लादेश के बहुप्रतीक्षित आम चुनाव में तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को मिली भारी जीत अप्रत्याशित नहीं है। उसके मुकाबले चुनाव मैदान में उतरे जमायते इस्लामी की अगुआई वाले 11 इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों को बांग्लादेश के मतदाताओं ने खारिज कर दिया है। दरअसल इन चुनावों में लंबे समय तक सत्ता में रही और बीते डेढ़ साल से भारत में शरण ले ऱखीं, शेख हसीना की अवामी लीग मैदान से बाहर थी, क्योंकि चुनाव आयोग ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया है।

ये चुनाव बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता के लिहाज से राहत देने वाले हैं। जनवरी, 2024 में हुए आम चुनाव में शेख हसीना की अगुआई में अवामी लीग ने लगातार चौथी बार भारी जीत दर्ज की थी, लेकिन उनकी सरकार बनने के महज छह महीने बाद ही भड़के हिंसक आंदोलन के कारण हसीना को देश छोड़कर भारत आना पड़ा था।

वैसे बांग्लादेश के इतिहास में अवामी लीग और बीएनपी का यह झगड़ा नया नहीं है। शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान 2014 और 2024 में हुए आम चुनावों का बीएनपी ने बहिष्कार कर दिया था, क्योंकि उसे निष्पक्ष चुनाव होने की कोई उम्मीद ही नहीं थी। बताने की जरूरत नहीं कि शेख हसीना ने ताजा चुनाव में बीएनपी की जीत को खारिज कर दिया है।

इसके बावजूद ये चुनाव न केवल बांग्लादेश, बल्कि भारत सहित दक्षिण एशिया में राजनीतिक स्थिरता के लिहाज से अहम हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने बीएनपी की जीत पर तारिक रहमान से फोन पर बात की और दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तों को याद करते हुए दोनों देशों के लोगों की शांति, तरक्की और खुशहाली के लिए भारत की प्रतिबद्धता जताई।

बेशक यह एक अच्छा कदम है और बांग्लादेश से भारत के रिश्ते के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। यह भी दोहराने की जरूरत नहीं है कि शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान भारत के बांग्लादेश से रिश्ते जितने सहज रहे हैं, उतने सहज तारिक रहमान की मां खालिदा जिया की अगुआई वाली पिछली बीएनपी सरकार में नहीं थे। बल्कि 2001 से 2006 के दौरान जब बीएनपी सरकार में जमायते इस्लामी भी गठबंधन के रूप में शामिल थी, बांग्लादेश सीमा से पूर्वोत्तर में अलगाववादी गतिविधियां एक चुनौती बनी हुई थीं।

इधर बीते डेढ़ दो सालों में बदलती भू-राजनीति में बांग्लादेश भारत से दूर होता जाता दिखा है, तो इसमें भारत की विदेश नीति के लिए भी चुनौती भी छिपी हुई है।

गौर किया जाना चाहिए कि 17 साल तक लंदन में निर्वासित जीवन बिता कर बांग्लादेश लौटे भावी प्रधानमंत्री तारिक रहमान की अगुआई वाली बीएनपी ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह भारत की सीमा से बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के लोगों को उनकी सीमा पर भेजने की कोशिशों को रोकने के लिए कदम उठाएगी।

जाहिर है, यह एक संवेदनशील मुद्दा है और अब जबकि बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार बन रही है, तो इसमें भारत के लिए भी संदेश है। दरअसल राजनय का तकाजा है कि अपनी विदेश नीति के साथ घरेलू राजनीति का घालमेल नहीं किया जाए। मगर खुद प्रधानमंत्री मोदी के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा जैसे बड़े नेता अपने राजनीतिक भाषणों में कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उठाकर अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला करते हैं। इसका असर बांग्लादेश से हमारे रिश्ते पर भी पड़ता है।

हाल के दिनों में ऐसे कई मामले भी सामने आए जब अपने ही देश के कई लोगों को बांग्लादेश की सीमा के पार भेज दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही उनकी वापसी हो सकी। बहरहाल यह अच्छी बात है कि बांग्लादेश फिर से राजनीतिक स्थिरता की राह पर है और वहां एक चुनी हुई नई सरकार सत्ता में आ रही है।

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