असम के होजई जिले में शनिवार तड़के एक राजधानी एक्सप्रेस की चपेट में आने से सात हाथियों की मौत हो जाने की दर्दनाक घटना वन्यजीवों के प्रति बढ़ती असंवेदनशीलता और उन्हें उनके प्राकृतिक आवास से लगातार बेदखल करने का ही नतीजा है।
यह हादसा उस समय हुआ, जब हाथियों का एक झुंड सैरांग से नई दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस की चपेट में आ गया। पता चला है कि ट्रेन के ड्राइवर ने हाथियों के झुंड को देख कर दूर से इमरजेंसी ब्रेक लगाए थे, लेकिन इस हादसे को टाला नहीं जा सका और हाथियों से टकराने के कारण ट्रेन के इंजन और कुछ डिब्बे भी पटरी से उतर गए।
हाथियों के साथ इस तरह का यह पहला हादसा नहीं है। इसी साल जुलाई में पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में एक जनशताब्दी ट्रेन से कटकर तीन हाथियों की मौत हो गई थी जिनमें दो शिशु हाथी थे। आंकड़ों में जाएं, तो बीते कुछ वर्षों की बेहद चिंताजनक तस्वीर उभरती है और पता चलता है कि हाथियों के गलियारों से गुजरने वाली रेल लाइनों में हाथी और ट्रेन के संपर्क को रोकने की पर्याप्त एहतियातन सुविधाएं नहीं हैं। तमिलनाडु के मदुक्करई में एआई एलिफेंट सेंटर के जरिये एक निगरानी तंत्र स्थापित किया गया है, जिसकी वजह से इस वहां रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौत पर अंकुश लग सका है। सवाल यह है कि इस प्रणाली का विस्तार देश में हाथियों के सौ के करीब गलियारों तक क्यों नहीं किया जा सकता?
हालांकि यह सिर्फ एक उपाय है, वास्तव में हाथियों ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों पर आसन्न खतरों को समग्रता में देखने की जरूरत है। इसे सिर्फ मानव-वन्यजीव टकराव की परिभाषा में सीमित कर नहीं रखा जा सकता। दरअसल मामला वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में बढ़ती मानवीय दखल से जुड़ा है। सवाल नियंताओं की प्राथमिकताओं और संवेदनशीलता का भी है।
वन्यजीवों के प्रति नीति-नियंताओं का नजरिया किस तरह बदल चुका है इसका एक उदाहरण तो हाल ही में तब सामने आया था, जब भारत आए महानतम फुटबॉल खिलाड़ियों में शुमार लियोनेल मेसी को अनंत अंबानी के गुजरात के जामनगर स्थित निजी वन्यजीव बचाव पुनर्वसा और संरक्षण केंद्र वंतारा भी ले जाया गया था!
अंधाधुंध निजीकरण के दौर में सरकार ने वन्यजीवों के संरक्षण का काम भी एक निजी फाउंडेशन के हवाले कर दिया गया है, तो समझा जा सकता है कि वह अपनी जिम्मेदारी से किस तरह से पल्ला झाड़ रही है। दूसरी तरफ नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को उनके प्राकृतिक आवास से हटाकर भारत में बसाने के प्रयास भी हो रहे हैं।
बात हाथियों तक सीमित नहीं, वास्तव में तेंदुओं और यहां तक कि बाघों तक के गांव ही नहीं, बल्कि शहरों के नजदीक तक पहुंच कर हमले करने की भी कई घटनाएं सामने आई हैं। शुक्रवार को मुंबई के मीराभंयदर इलाके में एक तेंदुआ आवासीय परिसर में घुस आया था। ऐसी घटनाएं वन्यजीवों के सिकुड़ते आवास और उनके भोजन के क्षेत्र के सिकुड़ते जाने का नतीजा है।
अभी तो सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस तेजी से विकास की पटरी पर गाड़ियां दौड़ रही हैं, उसमें यह टकराव और कितना बढ़ेगा? इस टकराव पर अंकुश लग सकता है, लेकिन क्या हम इस विकास की रफ्तार को धीमा कर वन्यजीवों के साथ सहअस्तित्व के लिए तैयार हैं?










