देश के आज जैसे हालात हैं उसमें समाज के कमजोर तबकों के सशक्तिकरण के लिए आर्थिक स्वतंत्रता जरूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन जब यह सशक्तिकरण लोकलुभावन कैश ट्रांसफर स्कीमों के जरिए हासिल करने की कोशिश की जाती है, तो यह जरूरी है कि इसके महत्व को दर्ज करने के साथ साथ आगे की भी बात की जाए।
देश ने नोटबंदी से लेकर कोरोनाकाल में जो आर्थिक तबाही देखी है, उसमें इस बात की बेहद जरूरत महसूस की गई कि गरीब परिवारों को सरकार आर्थिक सहारा दे। यानी लोक कल्याणकारी योजनाओं के अलावा सीधे उनकी जेब में नगदी पहुंचे। इस देश के समाजशास्त्र से लेकर अर्थशास्त्र तक तस्वीर यह कहती है कि हां गरीब को नकद चाहिए लेकिन आज हिंदुस्तान में जो तस्वीर सामने है उसे गरीब की जेब में नगदी पहुंचाने का राजनीतिकशास्त्र कहा जा सकता है।
हाल ही में संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई है, जहां बिना शर्त कैश ट्रांसफर योजनाओं को राज्यों की वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा बताया गया है। यह सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि ऐसी योजनाएं महिलाओं को तत्काल आय सहायता प्रदान कर सकती हैं, लेकिन उनके दीर्घकालिक और बिना शर्त स्वरूप से वित्तीय जोखिम बढ़ते हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में महिलाओं के लिए ऐसी योजनाओं पर अनुमानित खर्च 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। 2022-23 से 2025-26 के बीच ऐसी योजनाएं लागू करने वाले राज्यों की संख्या पांच गुना बढ़ गई है और इनमें से आधे राज्य राजस्व घाटे में हैं।
यह बोझ केवल वित्तीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है। राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा 2021-22 में जीडीपी का 2.6% से बढ़कर 2024-25 में 3.2% हो गया है, जबकि राजस्व घाटा 0.4% से 0.7% तक पहुंच गया। इससे बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर खर्च कम हो रहा है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इसका जीता-जागता उदाहरण हैं, जहां महतारी वंदन योजना पर 5,500 करोड़ रुपये (कुल राजस्व का 3.9%) खर्च हो रहा है, लेकिन आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं के लिए भुगतान नहीं हो पा रहा। अस्पतालों में दवाइयां नहीं, सड़कें टूटी हुईं और शिक्षा की गुणवत्ता गिर रही है।
देश की यह तस्वीर ऐसे समय में सामने आई है जब भारत हाल के वैश्विक सूचकांकों में कई महत्वपूर्ण सामाजिक और मानव विकास पैरामीटर्स में काफी पिछड़ा हुआ दिखता है। हयूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में हम 130वें स्थान पर वैश्विक भुखमरी में 102वें लैंगिक असमानता में 131वें और प्रेस की आजादी 151वें स्थान पर है।
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