सड़कों पर नमाज पर रोकः योगी आदित्यनाथ के फरमान के सियासी मायने

Yogi Adityanath

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिमों को हिदायत दी है कि उन्हें सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उनका कहना है कि सड़कें आम लोगों की सुविधा के लिए हैं। नमाज पढ़ने से यातायात बाधित होता है और लोगों को परेशानी होती है। वह यह भी कहते हैं कि यदि प्यार से बात नहीं मानी गई, तो दूसरा तरीका अपनाएंगे।

सड़कों पर सुचारू यातायात और लोगों की सुविधाओं को लेकर एक मुख्यमंत्री की चिंता पर भला क्या एतराज हो सकता है। मगर बकरीद से करीब दस दिन पहले आए देश के सबसे बड़े सूबे के मुखिया के इस फरमान में अंतरनिहित संकेतों और इसके राजनीतिक निहितार्थ को समझना मुश्किल नहीं है। वह भी तब जब अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं।

योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा है कि लोग ( इसे मुस्लिम पढ़िए ) कहते हैं कि उनकी संख्या ज्यादा है, तो हमने कहा जनसंख्या नियंत्रित कर लो। घर में रहने की जगह नहीं है, तो संख्या नियंत्रित कर लो।

यह उसी तरह की बात है, जैसा कि आरएसएस और भाजपा के लोग बार-बार कहते आए हैं और बढ़ती आबादी के लिए मुस्लिमों को निशाने पर लेते हैं। जबकि यह पूरा सच नहीं है। देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने कुछ बरस पहले आई अपनी शोधपरक किताब द पापुलेशन मिथ, इस्लाम, पॉलिटिक्स ऐंड फैमिली प्लानिंग में उस मिथक की हवा निकाल दी थी कि मुस्लिम जानबूझकर ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। यही नहीं, उन्होंने यह भी बताया था कि उच्च प्रजनन दल का मुख्य कारण धार्मिकता नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण की कमी है।

यह कोई पहली बार नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से ऐसी विवादास्पद टिप्पणी की है। दूसरी ओर वे खुद और उनका पुलिस महकमा सावन के महीने में लाखों कांवड़ियों के काफिलों पर हेलीकॉप्टर से फूल बरसाने से गुरेज नहीं करता। याद नहीं पड़ता कि योगी आदित्यनाथ ने कभी सड़कों और सार्वजनिक जगहों को घेर लेने वाले अन्य धार्मिक आयोजनों को लेकर ऐसी हिदायत दी हो। यह भी देखा जा सकता है कि किस तरह से सड़कों को घेरकर पंडाल लगाए जाते हैं और भंडारे किए जाते हैं।

सड़कों और सार्वजनिक जगहों को धार्मिक आस्था के नाम पर बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन यह नियम सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए। मुख्यमंत्री की इस बात पर कोई एतराज नहीं हो सकता कि सूबे के कानून को सबको मानने पडेगा। मुश्किल यह है कि वह खुद भी निशाने पर सिर्फ एक धर्म को ले रहे हैं। इससे भी अधिक तकलीफ की बात यह है कि जब वह एक समुदाय को निशाने पर ले रहे थे, तो सभागार में बैठे लोग तालियां बजा रहे थे।

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