राजधानी दिल्ली में चल रहे एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में एक चाइनीज रोबोटिक डॉग को अपना आविष्कार बताकर देश और दुनिया में खासी फजीहत कराने के बाद भले ही गलगोटिया यूनिवर्सिटी को अपना तंबू उखाड़ना पड़ गया है, लेकिन इस घटनाक्रम ने देश में उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक शोध की दशा को उजागर करके रख दिया है।
जाहिर है, इस पूरे घटनाक्रम को समग्रता में देखने की जरूरत है। इसलिए भी, क्योंकि कई तरह के विवादों में रही गलगोटिया यूनिवर्सिटी के कार्यक्रमों में मोदी सरकार के अनेक मंत्री न केवल जाते रहे हैं, बल्कि उसकी तारीफ में कशीदे भी पढ़ते आए हैं।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह तो उस यूनिवर्सिटी की एक प्रतिनिधि भर थीं और उन्होंने कैमरे के सामने आमतौर पर वही कहा होगा, जैसा कि उन्हें बताया गया होगा। यह भी साफ दिख रहा है कि चोरी पकड़े जाने के बाद यूनिवर्सिटी ने काफी लीपा-पोती करने की कोशिश की। और यह मान भी लिया जाए कि अपने बड़बोलेपन में वह कुछ ज्यादा बोल गईं, तब भी यह तो साफ देखा जा सकता है कि इस वृहत आयोजन के एक प्रमुख कर्ताधर्ता केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्वनी वैष्णव ने खुद अपने एक्स हैंडल से गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा पेश किए गए चीनी रोबोटिक डॉग की तस्वीर साझा करते हुए उसे भारत का मॉडल बता दिया था!
भले ही अफसोस कर लिया जाए कि अश्वनी वैष्णव ने आईआईटी जैसे संस्थान में पढ़ाई करने के बावजूद दो-ढाई हजार डॉलर में बिकने वाले एक चाइनीज रोबोटिक डॉग को देश की एक बड़ी उपलब्धि बता दिया। इसमें आईआईटी का दोष नहीं है, दरअसल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से जिस तरह से बड़ी-बड़ी बातें कर अपनी कमजोरियों को छिपाने और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर अवैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की कवायद चल रही है, यह उसका नतीजा है।
यह अचानक नहीं हुआ है कि बीते कुछ बरसों में अचानक आरएसएस जैसा खुद को एनजीओ बताने वाला संगठन देश की शिक्षा नीति और वैज्ञानिक सोच को प्रभावित कर रहा है।
क्या यह बताने की जरूरत है कि जब सारी दुनिया कोरोना की महामारी से जूझ रही थी, तब उसी दौरान प्रधानमंत्री मोदी तक ने लोगों से थाली चम्मच बजाने की अपील कर दी थी। यही नहीं, महामारी की भीषण लहर के दौर में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन आरएसएस के पसंदीदा रामदेव की बनाई तथाकथित दवा कोरोनिल को लांच करते नजर आए थे, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार भी नहीं था।
इसी तरह 2015 में विज्ञान कांग्रेस में पेश किए गए एक पेपर में यह दावा कर दिया गया कि भारत में वैदिक काल में विमानों की खोज हो चुकी थी। खुद प्रधानमंत्री मोदी नाली की गैस से चूल्हा जलाने की बात कर ही चुके हैं।
एआई के युग में जब सारी दुनिया में होड़ मची है, उच्च शिक्षा के विकास पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के बनाए आईआईटी, एम्स और आईआईएम जैसे संस्थानों के कारण ही दुनिया में भारत की उच्च शिक्षा के क्षेत्र में थोड़ी बहुत साख है, वरना तो वैश्विक रैंकिंग में हमारे संस्थान शीर्ष सौ में कहीं नजर ही नहीं आते हैं।
दरअसल वैज्ञानिक दृष्टिकोण सरकार के नजरिये में भी होना चाहिए तभी नई खोज, नए शोध और अविष्कारों की संभावनाएं बनती हैं। हम तो अनुसंधान पर होने वाले खर्च की बात ही नहीं कह रहे हैं, जिसमें चीन की तुलना में हमारा हाल बहुत बुरा है। हमारा देश अनुसंधान पर अपनी जीडीपी का आधा फीसदी ही खर्च करता है, वहीं ढाई हजार डॉलर में आनलाइन रोबोटिक डॉग बेचने वाला चीन ढाई फीसदी के करीब।










