यूपी में हिंसा और तोड़ फोड़ करने वालों को नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी, नई भर्ती नीति का ऐलान


नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरी पाने वाले उम्मीदवारों के पुराने रिकॉर्ड और चरित्र की जांच के नियम सख्त कर दिए हैं। राज्य सरकार ने नए नियम निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती से चुने गए उम्मीदवारों पर लागू होंगे। इसके तहत हिंसा के जरिए व्यवस्था बदलने वाले संगठनों के सक्रिय सदस्यों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा के आधार पर उसे नौकरी के लिए अयोग्य नहीं माना जाएगा। लखनऊ में प्रमुख सचिव एम. देवराज ने नई भर्ती नीति के इस फैसले की घोषणा की। इसका मुख्य उद्देश्य चयन प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करना है।

उम्मीदवारों के पुराने रिकॉर्ड और चरित्र की जांच

कार्मिक अनुभाग-4 की ओर से जारी शासनादेश में नियुक्ति से पहले चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया, पुलिस जांच, रिपोर्ट भेजने की समयसीमा और आपराधिक मामलों में अभ्यर्थियों की पात्रता को लेकर कई प्रावधान स्पष्ट किए गए हैं। सरकार का उद्देश्य वेरिफिकेशन प्रक्रिया को ज्यादा आसान बनाना और गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल लोगों की नियुक्ति पर रोक लगाना है।

हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों पर सख्ती

नई नीति के मुताबिक, ऐसे संगठनों से सक्रिय रूप से जुड़े लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है जिनका उद्देश्य हिंसा के जरिए मौजूदा व्यवस्था को बदलना है। इसके अलावा हत्या, डकैती, बलात्कार, महिलाओं की गरिमा भंग करने, भ्रष्टाचार, आतंकवादी गतिविधियों, पेपर लीक और सॉल्वर गैंग जैसे मामलों में शामिल अभ्यर्थियों के संबंध में भी सख्त प्रावधान किए गए हैं।

शासनादेश में कहा गया है कि 21 वर्ष की उम्र के बाद दर्ज मामलों की जांच की तारीख से तीन साल के भीतर यदि कोई व्यक्ति हिंसक तरीके से व्यवस्था बदलने वाली गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो इसे उसकी ऐसी गतिविधियों में सक्रियता का संकेत माना जा सकता है।

हालांकि, केवल एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित रहने से किसी अभ्यर्थी को अपने आप अयोग्य नहीं माना जाएगा। अलग-अलग मामलों में आरोप तय होने, दोषसिद्धि और अन्य कानूनी स्थितियों के आधार पर पात्रता का फैसला किया जाएगा।

पहले नियुक्ति पत्र बाद में कैरक्टर की जांच

नई व्यवस्था के तहत चरित्र का जांच की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करते हुए नियुक्ति पत्र जारी करने में देरी नहीं की जाएगी। चुने हुए अभ्यर्थी से निर्धारित वेरिफिकेशन फॉर्म और सेल्फ-एफिडेविट लेटर लेने के बाद औपबंधिक नियुक्ति पत्र जारी किया जा सकेगा। वेरिफिकेशन में सब कुछ सही पाए जाने पर नियुक्ति की पुष्टि कर दी जाएगी।

पुलिस जांच के लिए तय हुई समय-सीमा

चरित्र सत्यापन के लिए जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (LIU) को सामान्य तौर पर अभ्यर्थी के घर जाकर पूछताछ करने की जरूरत नहीं होगी। रिपोर्ट उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर तैयार की जाएगी। विशेष परिस्थितियों में नियुक्ति प्राधिकारी के अनुरोध पर मौके पर जांच की जा सकती है।

सरकार ने वेरिफिकेशन रिपोर्ट भेजने के लिए 30 दिन की समय-सीमा भी तय की है। अगर इस अवधि में रिपोर्ट नहीं मिलती है तो मामला गृह विभाग को भेजा जाएगा। अगर पुलिस या एलआईयू की रिपोर्ट उम्मीदवार के खिलाफ आती है तो जिलाधिकारी को रिपोर्ट भेजने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का मौका देना होगा। इसके लिए उम्मीदवार की सुनवाई आमने-सामने या ऑनलाइन की जा सकती है।

संगठित अपराध पेपर लीक बनेगा नौकरी न मिलने की वजह

आदेश में गंभीर अपराधों और विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। हत्या, बलात्कार, दहेज मृत्यु, अपहरण, पॉक्सो, संगठित अपराध, पेपर लीक और नकल माफिया से जुड़े मामलों में आरोप तय होने या दोषसिद्धि जैसी स्थितियों को अयोग्यता के आधार के रूप में शामिल किया गया है।

इसी तरह एनडीपीएस अधिनियम, आर्म्स एक्ट, भ्रष्टाचार निवारण कानून, यूपी गैंगस्टर एक्ट और धर्म परिवर्तन से संबंधित कानूनों के तहत मामलों में भी निर्धारित कानूनी स्थिति के आधार पर अभ्यर्थी की पात्रता प्रभावित हो सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) और अन्य संबंधित कानूनों के तहत निरुद्धि के कुछ मामलों के लिए भी प्रावधान किए गए हैं।

कुछ श्रेणियों में अयोग्यता केवल दोषसिद्धि होने पर लागू होगी, जबकि बार-बार आपराधिक मामलों में आरोपपत्र दाखिल होने की स्थिति को भी निर्धारित शर्तों के तहत देखा जाएगा। इसलिए हर मामले में संबंधित श्रेणी और शासनादेश में दी गई शर्तें लागू होंगी।

FIR दर्ज होने भर से नहीं जाएगी नौकरी की पात्रता

सरकार ने साफ किया है कि सिर्फ एफआईआर दर्ज होने या जांच चलने से किसी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं माना जाएगा। अगर अदालत उसे बरी कर देती है, मामला समझौते से खत्म हो जाता है या सरकार केस वापस ले लेती है तो नियमों के अनुसार उसके मामले पर विचार किया जाएगा।एक साल से कम सजा वाले छोटे अपराधों, केवल जुर्माने वाले मामलों और ट्रैफिक नियम तोड़ने जैसे मामलों में भी छूट का प्रावधान है।

गलत जानकारी देने पर रद्द हो सकती है नियुक्ति

आदेश के अनुसार, अगर कोई अभ्यर्थी आवेदन या स्व-घोषणा पत्र में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले या गिरफ्तारी से जुड़ी जानकारी छिपाता है और बाद में इसका पता चलता है तो उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है। ऐसे मामले में संबंधित कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।सरकार ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी अभ्यर्थी को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। हालांकि हिंसक गतिविधियों में शामिल संगठनों की सक्रिय सदस्यता और गंभीर आपराधिक मामलों को लेकर तय नियम लागू होंगे।

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